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संतों की मॉब लिंचिंग पर कोई बुद्धिजीवी बोलता क्यों नहीं? कोई अवार्ड लौटाता क्यों नहीं?

लोकेन्द्र सिंह

हिंदुओं की मॉब लिंचिंग पहली बार थोड़े हुई है। पहले भी कई बार हो चुकी है। लेकिन, आपने तब भी चुप्पी साधे रखी और आज भी। इसलिए हम भरोसे के साथ कह रहे हैं कि आप खुलकर भीड़ द्वारा हिंदुओं की हत्या को मॉब लिंचिंग कह ही नहीं सकते।

साधुओं की पीट-पीट कर हत्या को आप मॉब लिंचिंग मानते हैं या नहीं? अवार्ड वापसी गैंग का कोई आदमी दिखे तो उससे पूछिएगा कि उसने साधुओं की मॉब लिंचिंग पर कुछ लिखा क्या? बॉलीवुड के कलाकारों ने प्ले कार्ड दिखाए क्या? तथाकथित बुद्धिजीवियों ने चिट्ठियां लिखीं क्या? साधुओं की हत्या के विरोध में किसी ने कोई ट्वीट किया क्या? सदी के रहनुमा पत्रकार ने अपनी टेलीविजन स्क्रीन काली की है क्या?

मुंबई से सटे पालघर में दो साधुओं की मॉब लिंचिंग पर छद्म सेकुलरों और कम्युनिस्टों से इस तरह के कुछ सवाल क्या पूछ लिए, उन्हें बहुत बुरा लग गया है। लगेगा क्यों नहीं बुरा, सवाल पूछने पर तो सिर्फ उनका ही अधिकार है, और किसी का थोड़े है।

हमें मालूम है कि आपने कुछ भी नहीं लिखा होगा। हमें आपकी नेक नीयत पर पूरा भरोसा है। लिखोगे तो उसमें भी दाएं-बाएं कुछ करोगे। क्योंकि आप तो अपनी ही अवधारणा को स्थापित करने निकले हैं कि मॉब लिंचिंग तो सिर्फ मुस्लिमों के साथ होती है, हिंदुओं की मॉब लिंचिंग थोड़े होती है?

वे तुनक कर कह रहे हैं कि आप थोड़े हमें बताओ कि हमें किस घटना पर लिखना है और किस पर नहीं? हमें किस घटना का विरोध करना है और किसका नहीं?

नि:संदेह हम आपको बता नहीं रहे, बल्कि आपको आईना दिखा रहे हैं ताकि आप हमारे सवालों के आईने में अपना चेहरा देख लें।

हिंदुओं की मॉब लिंचिंग पहली बार थोड़े हुई है। पहले भी कई बार हो चुकी है। लेकिन, आपने तब भी चुप्पी साधे रखी और आज भी। इसलिए हम भरोसे के साथ कह रहे हैं कि आप खुलकर भीड़ द्वारा हिंदुओं की हत्या को मॉब लिंचिंग कह ही नहीं सकते। आप तो बंटवारे के समय लाशों से भर कर आई ट्रेनों को आज तक जस्टीफाई कर रहे हो। कश्मीर से निकाले गए हिंदुओं और उनके साथ हुई मॉब लिंचिंग को आप आज भी छिपाने के यथासंभव प्रयास करते हो। ‘कश्मीर में हिंदुओं के साथ कुछ हुआ ही नहीं’, इस झूठ को सही ठहराने के लिए मोटी-मोटी किताबें लिख दीं हैं आपने। आपको पता ही नहीं कि आपकी इन किताबों के बोझ से कश्मीरी हिंदू कराह रहे हैं। 1984 में सिख बंधुओं के साथ जो हुआ, उसको भी जस्टीफाई करने के बहाने आपने ढूंढ़ ही लिए। देवतुल्य महात्मा गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में चितपावन ब्राह्मणों की जो मॉब लिंचिंग हुई, उसकी तो आपने चर्चा ही नहीं होने दी। यह अध्याय तो जैसे इतिहास की पुस्तक से फाड़ कर फेंक दिया गया है।

ज्यादा पीछे क्यों जाना, इसी दौर की हत्याओं पर भी आपने कब मुंह खोला? स्वामी लक्ष्मणानंद की नृशंस हत्या हुई, आपने चुप्पी साधे रखी। पश्चिम बंगाल के वर्धमान में हिंदू महिला को बच्चा चोर होने के आरोप में पीट-पीट कर मार दिया गया, लेकिन आपने उसकी मॉब लिंचिंग पर भी कुछ नहीं बोला। वर्धमान जिले के ही इंद्रजीत दत्ता को भीड़ ने इसलिए पीट-पीट कर मार दिया, क्योंकि उसने धर्म विशेष के आयोजन के लिए चंदा देने से मना कर दिया। पश्चिम बंगाल के ही 24 परगना जिले में आईआईटी के छात्र कौशिक पुरोहित को भैंस चोर बता कर मार डारा गया। महाराष्ट्र के पंढरपुर में युवक सावन राठौड़ को सरेआम जला दिया गया, लेकिन उस आग की लपटों से आप जरा भी नहीं झुलसे। दिल्ली में डॉ. पंकज नारंग की हत्या उसके बच्चे और पत्नी के सामने कर दी जाती है, लेकिन दादरी से हैदराबाद तक चक्कर लगा आने वाले लोग नारंग के घर नहीं जाते हैं। केरल के कन्नूर में आरएसएस कार्यकर्ता पीवी सुजीत की कम्युनिस्टों ने घर में घुस कर हत्या कर दी। भला अपने ही लोगों के विरुद्ध कैसे मुंह खोलते, सो सब चुप ही रहे। उत्तर प्रदेश के आगरा में हिंदू दलित नेता अरुण कुमार की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है। आप क्यों बोलते भला, जो आरएसएस या संघ से जुड़ जाता है, आप तो उसको दलित मानते ही नहीं हो। कर्नाटक के प्रशांत पुजारी, उत्तर प्रदेश के कपूरचंद ठाकरे, तमिलनाडु के वी. रमेश, बाड़मेर के 22 साल के खेतराम भील, उत्तर प्रदेश के नवयुवक चंदन, इन सबकी हत्या पर भी तो आपके मुंह में दही जमा रहा। और जब बोले भी तो मुंह से हत्याओं को जस्टीफाई करने वाले कुतर्क निकले। दिल्ली के ध्रुव त्यागी के मामले में तो आपको बेटियों की सुरक्षा का मुद्दा भी नजर नहीं आया। उस अभागे बाप ने अपनी बेटी को छेड़ने का ही तो विरोध किया था, जिसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

जम्मू-कश्मीर में जिस पुलिस अधिकारी मोहम्मद अयूब पंडित की मॉब लिंचिंग हुई थी, उसे भी कहाँ आपने माना। देश के किस कोने में मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुई हैं, उन्हें बताने के लिए आपने एक नक्शा बनाया था, जिसे ‘नॉट इन माय नेम’ से आयोजित प्रदर्शनों में दिखाया गया। उस नक्शे पर अयूब पंडित का नामो-निशान नहीं था। उसकी हत्या को, आपने मॉब लिंचिंग क्यों नहीं माना, वह तो हिंदू न था…???

महाराष्ट्र के पालघर में जूना अखाड़े के दो साधुओं संत कल्पवृक्ष गिरी, सुशील गिरी और उनके वाहन चालक निलेश तेलगड़े की पीट-पीट कर हत्या कर देना, हिंदुओं की मॉब लिंचिंग का पहला मामला नहीं है। ऐसी और भी अनेक घटनाएं हैं। परंतु, छद्म सेकुलरों और अवार्ड वापसी गैंग से जुड़े लोगों को वे सब ध्यान में नहीं होंगी। हो सकता है कि उनके आकाओं ने उन्हें वे सब घटनाएं बताई न हों। आखिर उन्हें तो उन्हीं घटनाओं की जानकारी दी जाती है, जिन पर उन्हें हिंदू समुदाय को निशाने पर लेना है। इसलिए हिंदुओं की मॉब लिंचिंग से आक्रोशित लोग आपको पूछ रहे हैं कि आपने कुछ लिखा क्या, बॉलीवुड के पेड हीरोज ने कार्ड दिखाए क्या, खान मार्केट के पत्रकारों ने प्राइम टाइम किया क्या, तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ज्ञापन दिए क्या, चिट्ठियां लिखीं क्या, विमर्श आयोजित किए क्या? इसमें आपको बुरा लगता है तो क्या किया जाए? खैर, आपसे क्या तर्क करना…

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