भारत में अत्यंत प्राचीन काल से ‘इदन्नमम्’ की सार्थक जीवन परंपरा रही है और हमारे पूर्वजों ने इसी सार्थक जीवन परंपरा के माध्यम से विश्व व्यवस्था का विकास किया है। इस परंपरा का प्रारंभ देखिये कहां से होता है? निश्चय ही उस पल से जब ईश्वर ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम के ऋषियों के हृदय में वेद का प्रकाश किया। यह वेद प्रकाश उन ऋषियों के हृदय में ही क्यों किया गया? कारण यही था कि उनका जीवन पूर्णत: परकल्याण के लिए समर्पित था। परमार्थ उनका जीवन व्रत था और स्वार्थ उन्हें छू भी नहीं गया था। उधर ईश्वर भी सृष्टि की रचना जीवों के कल्याण के लिए करने जा रहे थे, अब जहां दाता की इच्छा केवल परमार्थ हो वहां ग्रहीता को भी परमार्थी ही होना चाहिए। इसलिए ईश्वर ने इन चारों ऋषियों की साधना से प्रभावित होकर वेद प्रकाश उनके भीतर प्रकट किया। कहने का अभिप्राय है कि ईश्वर ने अपना वेदज्ञान देने में इन ऋषियों की पात्रता की परीक्षा ली, और उसके लिए उन्हें ईश्वर ने जिस कसौटी पर कसा वह उनकी पारमार्थिक जीवन शैली ही थी। ज्ञान जिस भावना से लिया जाता है वह उसी भावना से प्रेरित होकर जगत का कल्याण या अकल्याण करता है। अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने ईश्वर का वेद ज्ञान परमार्थ के लिए लिया तो उसे इसी भावना से आगे बढ़ाया। इस प्रकार विश्व में मानवजाति का आदि संविधान परमार्थ की भावना से अर्थात ‘इदन्नमम्’ की भावना से लागू किया गया।

सारे वैदिक सिद्घांतों, मान्यताओं और आदर्शों का एक ही निष्कर्ष है -परमार्थ। इसी सार्थक जीवन व्यवहार को आगे लेकर हमारे ऋषि लोग चल पड़े। जिस देश या जाति के संविधान की मूल भावना परमार्थ हो उसके सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों या मूल्यों की मूल भावना भी परमार्थ ही होती है। ‘मूल भावना’ को यहां हम थोड़ी देर के लिए देश की ‘सामान्य इच्छा’ मान सकते हैं। जिसका अभिप्राय है कि देश के लोग सामान्यत: क्या चाहते हैं-वे किस आदर्श के प्रति समर्पित हैं? इस पर चिंतन करने से ज्ञात होता है कि हमारे ऋषियों की श्रंखला हो चाहे, विज्ञान के क्षेत्र में आविष्कार करने वाले लोगों की श्रंखला हो, चाहे कवियों की श्रंखला हो, चाहे साहित्यकारों की श्रंखला हो, राजाओं और सम्राटों की श्रंखला हो, चाहे राजनीतिक शास्त्र के मनीषियों की महान श्रंखला हो, सबका जीवन व्रत एक है।

यह एक लक्ष्य विचारबीज की समरूपता का परिणाम था। भारत के प्राचीन इतिहास से आप एक भी ऐसा ऋषि चिंतक, आविष्कारक, कवि, साहित्यकार, राजा, सम्राट या कोई अन्य मनीषी ढूंढक़र नहीं ला सकते-जिसका चिंतन आविष्कार, रचना या कोई कार्य परमार्थ से भिन्न था। इस देश ने उस चिंतन को मान्यता दी जिसमें परमार्थ हो, और स्वार्थ होवे ही नहीं। यही कारण रहा कि यदि कोई स्वार्थी ‘कंस’ कहीं उत्पन्न हो भी गया तो उसे सारे समाज ने अपना शत्रु माना-क्यों माना? क्योंकि वह देश की ‘सामान्य इच्छा’ के विरूद्घ कार्य कर रहा था। इसलिए ऐसे आततायी के वध को भी परमार्थ के लिए हमारे देश में उचित माना गया है।

भारतवर्ष में आजकल एक मूर्खता देखने को मिलती है कि जिसके मन में जो आ जाए वह वही बोल देता है, और जब उसके अनाप-शनाप बोलने का कहीं से विरोध किया जाता है, तो कहा जाता है कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस देश में सबके लिए समान रूप से उपलब्ध है, इसलिए यदि हम कुछ ऐसा बोल रहे हैं-जो कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता है-तो हम अपनी बोलने की स्वतंत्रता का ही सदुपयोग कर रहे हैं, अत: आप चुप रहो, और हम जो कुछ कह रहे हैं-उसे हमें कहने दो।

वास्तव में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर दिया जाने वाला यह तर्क तर्क न होकर कुतर्क है-जिसे लोग अपनी स्वार्थपूत्ति के लिए दे दिया करते हैं। इस तर्क को देने वाले लोग अपने लिए संविधान प्रदत्त भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग करते हैं। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग करने की हमारी इस प्रवृत्ति के पीछे हर व्यक्ति का अपना स्वार्थ छिपा है, सब अपनी-अपनी पहचान (भाषा, संप्रदाय, क्षेत्र, जाति, गोत्र, कुल इत्यादि) के लिए लड़ रहे हैं। फलस्वरूप आज देश में भाषण और अभिव्यक्ति का दुरूपयोग करते-करते लोगों ने देश का और विश्व का परिवेश ही स्वार्थपूर्ण बना दिया है।

जब हमारी एक पहचान थी तो हम सबके लिए समर्पित थे। सबका सुख दु:ख हम सबका अपना-अपना सुख-दु:ख होता था, जिसे हम मिल बांटकर सहन कर लिया करते थे। पर आज हमारी यह भावना लुप्तप्राय हो गयी है। आज हमारी अनेक पहचानें हैं। हम अनेक स्वार्थों के लिए ही परस्पर लड़ रहे हैं। हमारे ये अनेक स्वार्थ हमें एक साथ न बैठने देते हैं और न कोई बात करने देते हैं। क्या चमत्कार है-परमार्थ का,- वह सदा ‘एक’ ही रहता है। स्वार्थ अनेक हो सकते हैं, पर परमार्थ ‘एक’ ही होता है, सब सामूहिक रूप से सबके भले के लिए कार्य करते हैं। व्यष्टि समष्टि के लिए समर्पित हो उठता है।

राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
jojobet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
restbet giriş
safirbet giriş
betnano giriş
restbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş