आजकल के कुछ स्थानों , शहरों व नगरों के महाभारत कालीन नाम

‘महाभारत’ नाम का ग्रंथ हमें इतिहास संबंधी जानकारी देने वाला ग्रंथ तो है ही , साथ ही वह जीवन को आध्यात्मिक , नैतिक , राजनैतिक और सामाजिक मूल्यों से भरने वाला ग्रंथ भी है। इस ग्रंथ के अध्ययन से हमें अपने वर्तमान के अनेकों स्थानों , नगरों ,कस्बों के प्राचीन नामों की जानकारी होती है । आज के इस आलेख में हम किसी पर विचार करेंगे।

ब्रज प्रदेश

आजकल का ब्रज प्रदेश महाभारत काल में शूरसेन जनपद कहा जाता था । सातवीं सदी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग आया तो उसने लिखा कि मथुरा राज्य का विस्तार 5000 मील था । दक्षिण पूर्व में ब्रज की सीमा जेजाकभुक्ति अर्थात जीझौती या जुझौती की पश्चिमी सीमा से दक्षिण पश्चिम में मालव राज्य की उत्तरी सीमा से मिलती रही होगी। वर्तमान में ब्रज का तात्पर्य केवल मथुरा व उसके आसपास का इलाका माना जाता है। ब्रज शब्द अधिक प्राचीन नहीं है। शूरसेन जनपद की सीमाएं समय-समय पर बदलती रही हैं ।इसकी राजधानी मथुरा या मथोरा या मधोरा नगरी थी , मधोरा मधु शब्द से बना है इसी मधोरा से बिगड़ कर मथुरा शब्द प्रचलित हुआ। वैदिक साहित्य में इसका प्रयोग पशुओं के चरने के स्थान के रूप में मिलता है। बृज बछड़े को भी कहते हैं , गोधन से भी इसका अर्थ है । उसके लिए छोड़े गए एक ऐसे क्षेत्र से भी इसका अर्थ है जो उसका चरागाह हो । इसी शब्द ब्रज से बाड़ा शब्द बन गया , बाड़ शब्द भी इसी से बना है। यहीं कृष्ण जी ने भी गाय चराई हैं । रामायण, महाभारत तथा परवर्ती संस्कृत साहित्य में भी प्राय: यही शब्द प्रयोग किए गए हैं।

मथुरा यमुना नदी के किनारे पर है । यहीं पर कंस की कारागार में श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। बाद में कंस का वध भी यहीं पर हुआ । गुर्जर सम्राट कनिष्क ने भी मथुरा को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया था। इसे विश्व प्रसिद्ध भारत की धार्मिक व सांस्कृतिक राजधानी होने का गौरव प्राप्त है।

गांधार

कंधार ( कंदाहार) गांधार था। कंद पेड़ पौधों से मिले हुए फलों को कहा जाता है और उनको खाने को ही कन्द आहार कहते हैं ।आज जिनको हम सूखे मेवे कहते हैं वह उस देश में अधिक पाए जाते थे और इसलिए अधिक खाए जाते थे । वहां पर उनके अधिक खाए जाने के कारण उनको बाद में अपभ्रंश करके कंधार कहने लगे । यह क्षेत्र रावलपिंडी से लेकर सुदूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ था ।धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी वही की थी ।वहां के राजा सुबल की पुत्री थी। सुबल का पुत्र शकुनि भी यहीं का था । जो दुर्योधन का मामा महाभारत युद्ध के कराने में अहम भूमिका निभाने वाला व्यक्ति था। प्राचीन काल में गांधार नाम का एक प्रांत हुआ करता था । कालांतर में गांधार प्रान्त समाप्त होकर अब एक नगर विशेष रह गया है।

तक्षशिला

तक्षशिला गांधार देश की राजधानी थी ज्ञान व शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था। यहीं पर प्राचीन तक्षशिला विश्वविद्यालय स्थापित किया गया था। जिसमें पाणिनी और आचार्य चाणक्य जैसे महापुरुषों का निर्माण हुआ था । यहां पर दूर-दूर देशों के लोग आकर शिक्षा ग्रहण किया करते थे । अनेकों आचार्यों ने यहां पर वैदिक ज्ञान दे देकर लोगों का कल्याण किया था।

कैकेय प्रदेश_

वर्तमान जम्मू-कश्मीर के उत्तर के क्षेत्र को केकैय प्रदेश कहते थे। राजा जयसेन का विवाह वसुदेव की बहन राधा देवी के साथ हुआ था। जय सेन और राधा देवी से एक पुत्र जरासंध उत्पन्न हुआ जो दुर्योधन का मित्र था। जिसने कौरवों की तरफ से महाभारत में भाग लिया था। रामायण काल में केकई इसी देश की थी। इस प्रकार इस क्षेत्र का भी हमारे इतिहास में महत्वपूर्ण थान रहा है।

मद्र देश

मद्र देश कैकेय देश से सटा हुआ होता था । इसे आज का जम्मू कश्मीर माना जा सकता है। जहां की माद्री थी। जो कुरु देश के पास स्थित होने के कारण उत्तर कुरु भी कहा जाता था । राजा शल्य यहीं के थे । जिसकी बहन माद्री का विवाह पांडु के साथ हुआ था ।नकुल और सहदेव माद्री के ही पुत्र थे।

उज्जैनिक

उज्जैनिक आज के नैनीताल का जिक्र महाभारत में उज्जैनिक के रूप में आता है । गुरु द्रोणाचार्य ने यहां कौरवों एवं पांडवों को शिक्षा दी थी। स्पष्ट है कि पांडवों और कौरवों की शिक्षा के लिए इस शांत और एकांत स्थान को बहुत सावधानी के साथ चयनित किया गया था । जहां यह उस समय सुरक्षित क्षेत्र था वहीं जलवायु के दृष्टिकोण से भी बहुत अच्छा प्रांत था।

पलवल

पलवल के बारे में पता चलता है कि यह प्लंबर सुर नामक राक्षस के नाम पर पलंबासुर कहा जाता था । जिसका वध दाऊ बलराम जी ने किया था। पलंबरपुर नाम हुआ। बाद में पलवल हुआ।

कुरुक्षेत्र__

हरियाणा के अंबाला,( वर्तमान में करनाल, कुरुक्षेत्र यमुनानगर आदि को मिलाकर जो चित्र बनता है)के इलाके को कुरुक्षेत्र कहा जाता था। यमुना नदी के पश्चिम से लेकर अंबाला तक फैला हुआ था। इसी महाभारत का युद्ध हुआ ब्रह्मा जी ने यहीं पर यज्ञ किया था। जिसका ब्रह्मसरोवर, ब्रह्मकुंड आज भी विद्यमान है। कर्ण झील वह स्थान है जहां करण का रथ कीचड़ में धंसा था । कर्ण का वध अर्जुन द्वारा यहीं पर किया गया था । उसी के नाम पर कर्ण झील और करनाल शहर है।

बाणगंगा__

कुरुक्षेत्र से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर बाणगंगा है । महाभारत के युद्ध में गंभीर रूप से घायल होने के उपरांत युद्ध के दसवें दिन यहीं पर भीष्म पितामह को लिटाया गया था । यहीं पर अर्जुन ने तीर मारकर पितामह भीष्म को पानी पिलाया था। इसलिए इसका नाम बाण से निकली हुई धारा को बाणगंगा कहा गया था।

हस्तिनापुर___

यह स्थान चंद्रवंशी राजाओं की राजधानी रहा था । राजा हस्तिन के द्वारा बसाया जाने के कारण इतिहास में इसको हस्तिनापुर के नाम से जाना गया ।यहीं पर धृतराष्ट्र ने राज किया था और युद्ध के उपरांत यहीं से युधिष्ठिर ने भी शासन किया था। जो जग प्रसिद्ध है।

इंद्रप्रस्थ__

दक्षिण दिल्ली का वर्णन महाभारत में इंद्रप्रस्थ के रूप में है ।खांडव वन काटकर इंद्रप्रस्थ विश्वकर्मा की मदद से पांडवों ने बसाया था ।जहां आजकल पुराना किला है ।और जिसमें चिड़ियाघर स्थित है।मय नाम के एक कुशल अभियंता ने यहीं पर ऐसा महल बनाया था जिसमें सूखे में गीला और गीले में सूखा होने की भ्रांति दुर्योधन को हुई थी । इसी मय नाम के कुशल अभियंता को युधिष्ठिर के द्वारा ऐसे महल को देखकर प्रसन्नतावश मयराष्ट्र नाम का प्रदेश दे दिया गया था। उसी से आज का मेरठ नाम का शहर अस्तित्व में आया।

पांचाल प्रदेश___

हिमाचल व चंबा नदी के बीच का क्षेत्र पांचाल प्रदेश के रूप में था। यहां के द्रुपद राजा थे। जिनकी पुत्री कृष्णा (द्रोपदी) की शादी युधिष्ठिर के साथ हुई थी ,।जी हां युधिष्ठिर के साथ हुई थी, अर्जुन के साथ नहीं और जिनके पांच पति भी नहीं थे। पांचाल नरेश की पुत्री होने के कारण उसे पांचाली कहा जाता था ।कुछ अज्ञानी लोग हैं जो उसके पांच पति बता करके उसको पांचाली कहते हैं।

दूसरे मत के अनुसार आज के आगरा के दक्षिण भाग से धौलपुर तक का तथा फर्रुखाबाद ,कन्नौज, मैनपुरी शाहजहांपुर ,बरेली और नेपाल के कुछ क्षेत्र को मिलाकर पांचाल देश कहा जाता है। जिसकी राजधानी काम्पिल्य थी जो अब कंपिल कही जाती है। जिसके अवशेष गंगा जी के किनारे।पर फर्रुखाबाद जिले में पड़े हैं।

वृंदावन_

महाभारत काल में 12 वनों का उल्लेख आता है। उनमें से एक वृंदावन भी है । यह मथुरा के पास है भगवान श्री कृष्ण की बाल क्रीड़ा उनके लिए जग प्रसिद्ध है।

वार्णाव्रत ___

मेरठ में वर्तमान में बागपत जिले में स्थित है । जिसमें पांडवों को मारने के लिए एक लाख का घर अर्थात लाक्षागृह बनाया गया था जो एक षड्यंत्र था । आज इसे बरनावा कहते हैं । जो एक बहुत ऊंचा टीला आज भी कृष्णा नदी व हिंडन नदी के संगम पर पड़ा हुआ है। जिसमें लाख के घर की राख नदी की तरफ से देखने पर स्पष्ट दिखाई पड़ती है। यहीं पर कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी ने गुरुकुल की स्थापना आर्य समाज के अनुपम सहयोग से की है।

कौशांबी___

कौशांबी इलाहाबाद के पास यमुना नदी के पास स्थित है। जब हस्तिनापुर को गंगा नदी ने बाढ़ से तबाह कर दिया तो राजा जनमेजय ने यही अपनी राजधानी बनाई थी। इसलिए कौशांबी का इतिहास भी बहुत प्राचीन और गौरवपूर्ण है.।

मुरैना__

इसका प्राचीन नाम मयूर्वन महाभारत काल में था ।यहां का राजा कुंती भोज था। जिसकी राजधानी कुन्ती भोजपुरम्म के अवशेष व आसन नदी के किनारे मंदिर आदि सब उपलब्ध हैं। प्राचीन काल में कुंती भोजपुर कहा जाता था । बाद में इसका नाम कुंतलपुर हुआ ।यहीं पर वह आसन नदी है जिस के किनारे एक ऋषि का आश्रम था जो सूर्य मंदिर था ।इसी के लिए यहां पर कुंती आया करती थी । यहीं उसको कर्ण पैदा हुआ। और इसी नदी में कुंती ने कर्ण को बहाया था , गंगा में नहीं ।( यह कथा गलत है) कुंती के पिता का नाम शूरसेन था। शूरसेन व कुंती भोज मामा बुआ के लड़के थे ।शूरसेन ने अपने फुफेरे भाई कुंती भोज को बचपन में प्रथा नाम की पुत्री को गोद दे दिया था ।कुंती का लालन-पालन कुंती भोज द्वारा करने के कारण उसको कुंती कहा गया । वैसे उसका बचपन का वास्तविक नाम प्रथा था।

नकुड___

पांडवों के चौथे भाई नकुल के नाम पर यह शहर है। जिसको अब नकुड कहते हैं ।जो वर्तमान में सहारनपुर जिला की तहसील है।

गंगोह ___

यह कस्बा भीष्म पितामह से संबंधित है जो गंगा पुत्र था अर्थात उनकी माता श्रीमती गंगा थी गंगापुर से बिगड़ कर गंगोह हुआ है।

पर्णप्रस्थ___वर्तमान में पानीपत कहते हैं.।

स्वर्णप्रस्थ ___वर्तमान में इसे सोनीपत कहते हैं।

व्याघ्रप्रस्थ__वर्तमान में इसको बागपत कहते हैं।

गुरुग्राम__दिल्ली के पास हरियाणा में स्थित है, जो गुरु द्रोणाचार्य का जन्म स्थान है, इसीलिए गुरुग्राम कहते हैं। बीच में बिगड़ कर गुड़गांव हो गया था।

द्रोणगढ़, द्रोणपुर

यमुना नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित होता था जो हस्तिनापुर नरेश ने गुरु द्रोणाचार्य को जागीर के रूप में रियासत दी थी । जिसको वर्तमान में दनकौर कहते हैं। जिसके राजस्व की प्राप्ति से गुरु के परिवार का पालन पोषण होता था।

राजा कनिष्क के संबंध में संक्षिप्त विवरण

जम्मू कश्मीर के उत्तर में जिस क्षेत्र को त्रेता युग में केकई देश कहते थे । वर्तमान में चीन के आधिपत्य में हैं। कनिष्क यहीं से चीन से ही भारत की तरफ आया था ।दूसरी ईसा पूर्व के मध्य में सीमांत चीन में युइती जाति, यूची कबीला कहा जाता था । जिसको जुकी कबीला भी कहा गया । मौर्य साम्राज्य के बाद उत्तर पश्चिम की ओर चला आया था यह कबीला ।उत्तर तथा मध्य एशिया ईरान और अफगानिस्तान तक अपना प्रभाव फैलाने में सफल रहा था यह कबीला । कुछ इतिहासकारों के अनुसार आर्यों से संबंधित है ।यह साम्राज्य रोम ,पार्थिया ,चीन के विशाल साम्राज्य की तरह था । जिसका संस्थापक कुजुल कड़फिसेश था। जो चीनी कबीले युची का सरदार था। कुजुल का शासन काल 25 से 50 ईसवी रहा। जिसने तांबे के सिक्के चलाएं। उसके बाद उसका पुत्र विम कडफिश राजा बना । जिसने सोने के सिक्के चलाए ।तांबे के भी चलते रहे ।सिक्के के एक तरफ यूनानी लिपि एवं दूसरी पर खरोष्ठी लिपि में लिखा था। कनिष्क सबसे प्रतापी शासक था। उत्कर्ष काल माना जाता है ।इस का स्वर्ण युग कहा जाता है। जिसका राज्याभिषेक 78 ईसवी है ।शक संवत की शुरुआत इसी के द्वारा की गई थी। जिसने पुरुषपुर पेशावर को अपनी राजधानी बनाया था और एक राजधानी मथुरा बनाई थी। पेशावर में बौद्ध स्तूप व बिहार बनवाया ।बौद्ध स्तूप की खुदाई में ब्रह्मा, बौद्ध , कनिष्क की मूर्ति मिली है। राजवैद्य दरबारी काफी विद्वान थे। कनिष्क के दरबार में कई विद्वान रहते थे ।महर्षि चरक ने चरक संहिता लिखी है ।राजा कनिष्क बौद्ध धर्म की महायान शाखा का मानने वाला था अर्थात अनुयाई था । इसके प्रचार का काफी कार्य किया ।कश्मीर के कुंडल वन में बौद्ध संगीति का आयोजन किया था। जिसका अध्यक्ष वसुमित्र उपाध्यक्ष अश्वघोष था।

अश्वघोष राजकवि है। बुद्ध चरित्र सौंदरानंद थे। इसके सिक्कों पर यूनानी में भारतीय देवी-देवताओं की आकृतियां मिलती हैं ।मथुरा से कनिष्क की मूर्ति सैनिक वेशभूषा में मिली थी। कनिष्क सिक्के पर यूनानी और ईरानी भाषा थी ।तांबे के सिक्के पर बलिवेदी पर बलिदान देते हुए दिखाया गया है। दरबार में एक अन्य विभूति नागार्जुन भी थे ।दार्शनिक व वैज्ञानिक थे। जिसकी तुलना मार्टिन लूथर से की जाती है ।तथा आइंस्टाइन से भी की जाती है ।नागार्जुन की पुस्तक माध्यमिक सूत्र थी। जिसमें सापेक्षता के सिद्धांत को विस्तृत रूप से समझाया गया है ।इसकी राजधानियां समय-समय पर बदलती रहीं । बाग्राम, पेशावर, तक्षशिला, मथुरा, कपिसा राजधानी रही।

उक्त के अलावा अनेक शहर आज भी किसी न किसी रूप में हमारे अतीत का दर्शन कराते हैं। सुधी पाठकों से मेरा निवेदन है कि इस सूची को और बढ़ाने में सहायता प्रदान करें। जिससे कि हम आने वाली पीढ़ियों को अपना प्रमाणिक और गौरवपूर्ण इतिहास प्रदान करने में सफल हो सकें।

देवेंद्र सिंह आर्य

चेयरमैन : उगता भारत

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