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उत्तर प्रदेश के अखिलेश सरकार का एक साल रहा दंगों और दबंगों के नाम

प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 15 मार्च को अपनी सरकार का एक वर्ष पूरा करने जा रहे हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज भी वह वहीं खड़े हैं जहां एक साल पहले शपथ लेने के समय खड़े थे। तमाम दावों के बाद भी उनकी सरकार को दंगों और दबंगों से छुटकारा नहीं मिल रहा है। न तो मुलायम की नसीहतें काम आ रही हैं न अखिलेश की तेजी से कोई कारनामा हो रहा है। अखिलेश राज में जनता की सुरक्षा-संरक्षा पर दंगों, दागियों और दबंगों की दहशत भारी पड़ रही है।
आजम खां, शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव और स्वयं मुलायम सिंह यादव कोई अपने को सीएम से कम नहीं समझता है। सभी के लिये अखिलेश सीएम नहीं बच्चा बने हुए हैं। यह सच है कि राज्य सरकार करीब-करीब सभी मोर्चों पर नाकाम हो रही है लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ बेबुनियाद आरोप भी सरकार पर लग रहे हैं। यह आरोप वह लोग लगा रहे हैं जो सरकार पर दबाव बनाकर अपना स्वार्थ पूरा करना चाहते हैं। परंतु इससे सरकार का ‘पाप’ धुल नहीं जाता है। समाजवादी नेताओं की कारगुजारी से सरकार के मुखिया को भी कम शर्मिंदा नहीं होना पड़ता है सिर ऊंचा करके अपनी बात कहने वाले युवा नेता और मुख्यमंत्री का सिर उनके बेलगाम मंत्रियों और नेताओं ने नीचा कर दिया है। सरकार के लिये समस्या यह है कि उसे विपक्ष के हमलों से नहीं, अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की ही गुंडागर्दी तथा कारगुजारियों से ज्यादा शर्मसार होना पड़ रहा है। नेता तो नेता मंत्री तक दबंगई कर रहे हैं तो उसकी वोट बैंक की घिनौनी राजनीति ने प्रदेश को दंगों की आग में झोंक दिया है। सपा सरकार के साल भर के शासनकाल में हुए करीब ढाई दर्जन दंगे यह बताने और जताने के लिये पर्याप्त हैं कि सरकार ठीक से नहीं चल रही है। वोट बैंक बचाने के लिये ही दंगाइयों पर हाथ नहीं डाला जाता है। दबंगों को पनाह दी जाती है। पैसा बांट कर पीडि़त पक्ष का मुंह बंद करने का घिनौना प्रयास किया जाता है। यहां तक की मुआवजे की रकम और जांच पड़ताल का काम भी पीडि़त पक्ष की धर्म जाति देखकर तय होती है।
समाजवादी सरकार के पैरोकार भले ही अनाप-शनाप बयानबाजी करके सरकार की छवि को बचाने का प्रयास कर रहे हों लेकिन पिछले एक साल में कई ऐसे मौके आये जब सरकार की छवि उसके अपनों के कारण ही विवादों में फंसती रही। यह साया न केवल सत्तारूढ़ दल के लिये मुसीबत का सबब बना रहा बल्कि विरोधी दलों को इससे सरकार पर हमला करने का ‘हथियार’ भी मिल गया। समाजवादी सरकार के बहुमत के साथ जीत कर सरकार बनाने का जश्न जब सपाइयों की उद्दंडता से शुरू हुआ था, उसी समय अहसास हो गया था कि समाजवादी इतिहास एक बार फिर अपने आप को दोहराने जा रहा है। दंगों-दंबगों और जंगलराज के चलते ही 2007 में मुलायम सरकार को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था, यह बात लोग भूले नहीं हैं। अखिलेश सरकार भी करीब-करीब मुलायम सरकार की परिपाटी पर ही चल रही है। चाहे सरकार बनते ही उत्साह का उद्दंडता में तब्दील होने की घटना रही हो या फिर जीत के जश्न में फायरिंग करके कानून को ठेंगा दिखाने वाले विधायकों और मंत्रियों के कारनामे, दुखद यह भी रहा कि अखिलेश सरकार भी न्यायसंगत फैसले लेने की बजाये मौके की नजाकत भांप कर निर्णय सुनाती दिखती है।
बात सपा के दामन को दागदार करने वालों की कि जाये तो कई नाम सामने आते हैं। इसमें से खास-खास पर ही ध्यान दिया जाये तो भी सूची काफी लम्बी हो जाती है। सरकार के साल भर के शासनकाल में कई बार सपा नेताओं ने सरकार और संगठन की छवि को दागदार किया। कुछ माह पूर्व गोंडा में राजस्व राज्य मंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह का एनआरएचएम योजना में आयुष डॉक्टरों की नियुक्ति के मसले पर किया गया तांडव किसी से छिपा नहीं है। दबंग मंत्री जी की बात जब सीएमओ ने नहीं सुनी तो उनको बंधक बना लिया गया। पहले तो सरकार मंत्री के पक्ष में खड़ी दिखी लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला गया तो सरकार बैकफुट पर आ गई। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सरकार की छवि बचाने के लिये पंडित से इस्तीफा लेना पड़ा तो जिलाधिकारी और एसएसपी को हटाना पड़ा। दहशत का आलम यह था कि डर के मारे तत्कालीन सीएमओ ने गोंडा जाने से ही इंकार कर दिया। सरकार ने उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाने की बजाये तबादला कर दिया जिससे पंडित को अपनी प्रतिष्ठा बचाने का मौका मिल गया। बाद में विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह दोबारा राज्यमंत्री के रूप में सरकार में शामिल हो गये। कुछ इसी तरह का रवैया सरकार ने पशु तस्करी में फंसे सपा नेता केसी पांडेय के मामले में उठाया। सपा के राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य केसी पांडेय और उनके चेले का गोंडा के पुलिस अधीक्षक नवनीत राणा ने स्टिंग आपरेशन कर डाला। केसी पांडेय की आवाज टेप की गई। वह टेप में आशुतोष पांडे की पैरवी करते सुने गये और आशुतोष एसपी को घूस की पेशकश कर रहे थे। सरकार की फजीहत हुई तो पुलिस ने उन्हें आपराधिक षड्यंत्र के तहत नामजद कर लिया। सरकार ने केसी पांडेय के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई करके जनता के बीच गुड गवर्नेंस का मैसेज देने की बजाये गोंडा के एसपी का तबादला कर दिया और जांच सीबीसीआईडी को सौंप कर पल्ला झाड़ लिया। यह कांड केसी पांडेय के उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के उपाध्यक्ष के तौर पर राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त करने के दूसरे ही दिन हुआ था। आज भी वह अपने पद पर विराजमान हैं। सपा नेता और राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के उपाध्यक्ष नटवर गोयल लखनऊ में कब्जाई जमीन पर बिजली चोरी के विवाद में फंस गये थे, एक प्रेस छायाकार ने विवादित स्थल और वहां चल रहे निर्माण कार्यों की फोटो लेने की कोशिश की तो उसकी पिटाई कर दी गई। बाद में नटवर की लाल बत्ती छिन गई और उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन तब तक सरकार के दामन पर दाग तो लग ही चुका था। बीज प्रमाणीकरण निगम का अध्यक्ष बनने के बाद साहब सिंह सैनी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला था। वर्षों से गर्दिश से जूझ रही उनकी पहली पत्नी सामने आ गईं और देहरादून में उनके खिलाफ अदालती कार्रवाई पर उतर आईं। साहब सिंह के खिलाफ उत्तराखंड में मुकदमा भी दर्ज हो गया है। विधूना के विधायक प्रमोद गुप्ता का सपा नेतृत्व का खासा करीबी माना जाता है। उनके लखनऊ के एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज में पढऩे वाले बेटे ने मर्यादा की सभी हदें पारकर अपनी महिला टीचर को ही तमाचा जड़ दिया। मामला विधान सभा और विधान परिषद दोनों ही सदनों में गूंजा। घटना सत्ता पक्ष के विधायक के बेटे से जुड़ी थी, इसलिये पुलिस मामला रफादफा करने में लग गई। बमुश्किल टीचर की रिपोर्ट लिखी गई। पुलिस पर जब दबाव पड़ा तो उसने गुपचुप तरीके से विधायक के बेटे के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके उसे अदालत में हाजिर कर दिया जहां से उसे जमानत भी मिल गई। इसी प्रकार इलाहाबाद में सपा विधायक विजमा यादव के बेटे के खिलाफ भी एफआईआर हुई है। जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी के करीबी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वसीम अहमद का भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते हटाया जाना भी गत दिनों सरकार की किरकिरी की वजह बना था।
उत्तर प्रदेश सरकार में खाद्य मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया प्रकरण ने तो सरकार को कहीं मुंह दिखाने लायक ही नहीं छोड़ा। प्रतापगढ़ के वलीपुर गांव में सीओ कुंडा जिया उल हक की हत्या से प्रदेश की सियासत में भूचाल ही आ गया। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया जिनके ऊपर बसपा राज में कई गंभीर आरोप लगे थे और उनकी जांच भी चल रही है, वह समाजवादी सरकार बनते ही एक दम पाक-साफ हो गये। स्वच्छ सरकार का दावा करने वाले युवा नेता और मुख्यमंत्री बने अखिलेश यादव ने जैसे ही राजा भैया को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने की घोषणा की, राजनैतिक पंडितों ने सरकार की कथनी और करनी पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिये। अखिलेश सरकार में राजा भैया के शामिल होते ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने खाद्यान्न घोटाले का मुद्दा गरमा दिया था। जिसे आज तक ठंडा नहीं किया जा सका।
कुंडा के सीओ हत्याकांड ने तो सरकार को पूरी तरह से बेनकाब करके रख दिया। हवा का रूख भांप कर सरकार द्वारा तुरंत ही राजा भैया को मंत्रिमंडल से हटा दिया गया, मामले की सीबीआई जांच का आदेश हो गया।
सरकार की छवि बचाने के लिये राजा के गिरफ्तारी तक देने की बात हवा में उछली, लेकिन इससे सरकार की और फजीहत हो सकती है यही सोच कर ऐन मौके पर राजा की गिरफ्तारी की योजना टाल दी गई। सरकार के ढुलमुल रवैये के चलती ही सीओ हत्याकांड की आग ठंडी नहीं हो पा रही है। प्रदेश की जनता सीओ हत्याकांड से गमगीन है तो विपक्ष पूरी तरह से हमलावर।

वहीं जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी जैसे धर्मगुरू भी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये सीओ कुंडा की शहादत को भी अल्पसंख्यकों से जोड़कर लोगों की भावनाएं भड़काने में लगे हैं। सपा नेताओं की कारगुजारी का प्रभाव न केवल सरकार की अच्छी नीतियों और विकास योजनाओं पर पड़ता नजर आ रहा है, बल्कि एक वर्ष के कार्यकाल में विवादों के ये साये और गहरे होते जा रहे हैं। बात प्रदेश में फैल रहे साम्प्रदायिक दंगों की कि जाये तो उत्तर प्रदेश में सपा सरकार को सत्तारूढ़ हुए एक साल मुश्किल से हुआ है लेकिन राज्य में करीब तीस जिलों में साम्प्रदायिक दंगे हो चुके हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गत दिनों विधानसभा में कहा कि पिछले साल मार्च से दिसम्बर 2012 तक राज्य में 27 दंगे हुए। यादव ने पिछले 15 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। एक तरफ मुख्यमंत्री सदन में कहते हैं कि मथुरा, बरेली और फैजाबाद में बड़े दंगे हुए। बरेली और फैजाबाद में धार्मिक असहिष्णुता के कारण तथा मथुरा में विविध कारणों से दंगे हुए। पांच दंगे यौन संबंधों के कारण हुए। ऐसे दंगे प्रतापगढ़ और बहराइच में हुए। मुजफ्फरनगर को तीन बार ऐसे मामले में दंगों का दर्द सहना पड़ा। गोवध के कारण मेरठ में दंगा हुआ। संत रविदास नगर में जमीन संबंधी विवाद के कारण दंगा हुआ। इसके अलावा गाजियाबाद, संभल, बिजनौर, इलाहाबाद, लखनऊ कुशीनगर और मुरादाबाद में भी दंगे हुए। गाजियाबाद और कुशीनगर को दो-दो बार दंगे देखने पड़े। धार्मिक असहिष्णुता के कारण दस जगहों पर दंगे हुए हैं। साम्प्रदायिक दंगों और इससे जुड़े विवाद की रोकथाम के लिए सभी आयुक्तों को इस साल नौ जनवरी को आवश्यक निर्देश भेजे गये हैं।

एक तरफ मुख्यमंत्री साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की बात सदन में करते हैं तो ठीक उसी समय अंबेडकर नगर के टांडा में साम्प्रदायिक हिंसा फैल जाती है। हिंदू वाहिनी (युवा) के जिलाध्यक्ष रामबाबू की हत्या के पश्चात अचानक माहौल इतना खराब होता है कि दंगा टांडा में दंगा फैल जाता है। उपद्रवी पुलिस टीम पर हमला करने से भी नहीं चूकते। कफ्र्यू लगाकर देखते ही गोली मारने तक के आदेश हो जाते हैं। मरने वाला यहां कोई ‘जिया उल हक’ नहीं था इसलिये सरकार के माथे पर कोई शिकन नहीं आई। पुलिस और प्रशासन दंगा शांत करने और दंगाइयों पर नियंत्रण करने की बजाये ‘सरकारी’ हवा में बहता दिखता है। इस घटना का उल्लेख इसलिये किया जा रहा है जिससे की सरकार की हनक और धमक वाली बातों से पर्दा हट सके। बहरहाल, समाजवादी सरकार की खराब होती छवि से मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री बनने के सितारे गर्दिश में आ सकते हैं। हालात ऐसे बन गये हैं कि जनता कहने लगी है कि एक बार धोखा खा चुके हैं और खा सकते नहीं।

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