शांता कुमार
अवधबिहारी का पता भी वहीं पर चला। उसी के आधार पर दिल्ली में अमीरचंद के घर में छापा मारा गया। मास्टर जी अवधबिहारी व सुल्तानचंद्र पकड़ लिये गये। मास्टरजी के घर पर पुलिस को एक पत्र मिला जो अवधबिहारी द्वारा किसी एमएस को लिखा गया था। इस एमएस की खोज आरंभ हुई। पता लगा कि उसका वास्तविक नाम दीनानाथ है। बस फिर क्या था। पुलिस ने सब घरों को छान मारा। तब दीनानाथ पकड़ लिये गये। कितने ही निर्दोष लोगों केा इसलिए पीटा गया तथा कठोर यातनाएं दी गयीं, क्योंकि उनका नाम दीनानाथ था। आखिर असली दीनाथ मिल गया। श्रीमान पकड़े जाते ही मुखबिर बन गये। क्रांति के बारे में जो कुछ भी उसे मालुम था उसने उगल दिया। सुल्तानचंद्र मास्टर अमीरचंद्र का गोद लिया पुत्र था। वह भी पुलिसकी यातनाओं को सह न सका। उसने सब गुप्त भेद बक दिये। इन दिनों के द्रोह के परिणाम स्वरूप वर्षों दूर के सूत्र जोड़कर अच्छा बड़ा मुकदमा पुलिस ने बना लिया। दल के अन्य लोग, लाला हनुमंतसहाय, चरणदास व लाला हंसराज के पुत्र बलराज, भाई बालमुकुंद तथा वसंतकुमार भी धर लिये गये
भारत वसुंधरा वीरप्रसू रही है। इसमें कोई संदेह नही परंतु वीरों, ऋषि मुनियों की इस जननी माता मां की गोद में सदा ही कुछ देशद्रोही भी पलते रहे हैं। एक ओर कुछ मनचले नवयुवक अपने जीवन के खिले यौवन युक्त पुष्पों को मां के चरणों पर अर्पित करते रहे तो दूसरी ओर अपने हड्डी चमड़े के शरीर की रक्षा के लिए या कुछ चांदी के टुकड़ों के बदले कुछ लोगों ने समय समय पर देशद्रोह करके भारत की स्वतंत्रता व सुखवैभव की हत्या की। भारत की स्वतंत्रता के प्रकाशमान सूर्य के उदय होते ही राहु बनकर ये कुछ भ्रष्टï कलंकित लोग उभर आए। आजादी मिलती मिलती रह गयी। इतिहास के पग पग पर यदि ये गद्दार न होते तो भारत कब का स्वतंत्र हो गया होता।
कुल मिलाकर 13 अभियुक्तों पर अभियोग चलाया गया। सुल्तानचंद्र मास्टर अमीरचंद का गोद लिया पुत्र था। उन्होंने ही उसे पाला पोसा व बड़े लाड प्यार से बड़ा किया था। पर भाग्य की बिडंबना देखिए कि उसी का बदला सुल्तानचंद्र ने किस रूप में चुकाया? मास्टर अमीरचंद्र के विरूद्घ कुछ भी प्रमाणित न होता, यदि उनका अपना ही पुत्र उनके सब भेद अदालत में न खोल देता। मानो अपने ही हाथ, जिन पर पूरा भरोसा था अपने ही गले को दबाकर मृत्यु दण्ड दे रहे हों। आखिर पुत्र के अतिरिक्त और कौन ऐसा स्थान हो सकता है, जहां मनुष्य विश्वास कर सके। भरी अदालत में अपने ही पुत्र का हाल देख मास्टरजी का वज्र हा हृदय पिघल उठा। मनुष्यता के इस विश्वासघात ने मानो मास्टरजी के हृदय को चकनाचूर कर दिया। बाद में फांसी का फंदा भी जिस हृदय को न डरा सका, सामने खड़ी मृत्यु भी जिसके सजल नैन न कर सकी, वही अमीरचंद्र भरी अदालत में अपने पुत्र के बयान देते समय फूट फूटकर रो उठे। मानो साहस और वीरता का स्तंभ ही ध्वस्त हो गया हो। सुल्तानचंद्र बाद में दिल्ली में बड़े आनंद का जीवन व्यतीत करता रहा, परंतु मास्टरजी सदा के लिए इस धरती पर से उठ गये।
सात मास तक मुकदमा चलता रहा। सभी अभियुक्तों ने उस समय भी बड़ी वीरता व साहस का परिचय दिया। 5 अक्टूबर 1914 को निर्णय सुनाया गया। मास्टर अमीचंद्र अवधबिहारी भाई मुकुंदलाल व बसंतकुमार को फांसी की सजा दी गयी और लाला हनुमंतसहाय व बलराज भल्ला को सात वर्ष का कारावास।
बालमुकुंद भाई परमानंद के भाई थे। उन्होंने भाई को बचाने के लिए एडी चोटी का जोर लगाया। अपनी आर्थिक कठिनाईयों के होते हुए भी वे प्रिवी कौंसिल तक गये पर अंग्रेजी न्याय अंधा था। कुछ न बना। भाई बालमुकुंद अपनी बीए तक की शिक्षा के बाद लाला लाजपतराय के साथ लगकर देश कार्य कर रहे थे। बड़े साहसी त्याग वृत्ति के नवयुवक थे। उनका एक अतीव सुंदर रमणी रामरखी से प्यार हो गया था। उसी के साथ उनका विवाह भी हो गया। दोनों का परस्पर बहुत अधिक असाधारण प्यार था। फांसी की सजा सुनाए जाने पर बड़े गौरव से भाई मुकुंदलाल ने कहा था, आज मुझे अत्यंत आनंद हो रहा है। क्योंकि इसी नगर में जहां कि हमारे पूर्व पुरूष श्री भाई मतिदास ने देश व धर्म के लिए अपने प्राण दिये थे। मैं भी उसी उद्देश्य के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर रहा हूं। मुझे हृदय में इतना बड़ा उल्लास है, आनंद है।
मास्टरजी अमीरचंद्र दिल्ली के अतीव प्रतिष्ठित आदर युक्त नागरिक थे। अवधबिहारी के पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने ही उसका पालन पोषण किया था। जज भी अपने निर्णय में मास्टर जी की सुहृदयता का वर्णना करना न भूला। उसने कहा था। यह स्मरण रखना चाहिए कि अमीरचंद्र की तरह देशभक्त यदि उनकी किसी विशेष बात के लिए सनक निकाल दी जाए तो वे बहुत ही निर्दोष आदर योग्य प्रतिष्ठित व्यक्ति होते हैं।
दिल्ली षडयंत्र की कहानी अधूरी रहेगी, यदि भाई बालमुकुंद की अत्यंत प्रिय पत्नी रामरखी का वर्णन न किया जाए। वह कोई क्रांतिकारिणी न थी। परंतु प्रेम की पावन बलिवेदी पर उसने जो बलिदान दिया, उससे वह भी अन्य शहीदों की भांति क्रांतिकारी इतिहास में अमर हो गयी। फांसी से कुछ दिन पूर्व रामरखी अपने पति से मिलने जेल में गयी। उसे पता चला कि भाईजी को मिट्टïी मिली रोटियां खाने को मिलती हैं तथा गर्मी की ऋतु में भी दो कंबल लेकर अंधेरी कोठरी में सोना पड़ता है। उसने भी अपनी रोटी में मिट्टी मिलानी आरंभा कर दी और गर्मी होते हुए भी कंबल लेकर सोने लगी। भले ही कष्टï हो, परंतु अपने पति की भांति जीवन व्यतीत करने में उसे अपूर्व सुख प्राप्त हुआ। फांसी वाले दिन वह प्रात: ही उठी, स्नान करके और वस्त्र आभूषण पहनकर, खूब श्रंगार किया। मानो विवाह की भांवरें लेने जा रही हो। नई नवेली दुल्हन सी बनकर वह घर से बाहर चबूतरे पर प्रभु भजन करने बैठी। उधर भाई बालमुकुंद का शरीर फांसी के फंदे पर झूला होगा और इधर उनकी पत्नी ने चबूतरे पर बैठे की प्राण त्याग दिये।
वह बैठी तो उठी नही। आचार्य चतुरसेन ने बड़े मार्मिक शब्दों में इस दशा का वर्णन किया है। वे लिखते हैं दूर जहां तक स्थूल दृष्टिï से देख सकती है, जहां तक आततायी शासकों का कानून विधान पहुंच सकता है, उससे बहुत दूर उस पार जहां जेल नही, फांसी नही विप्लव नही, पराधीनता भ्ी नही, केवल प्रेम ही प्रेम है, उसी लोक में वह अपने चिर प्रियतम बालमुकुंदजी से अनंतकाल तक सहवास का आनंद उठाने के लिए चली गयी।
रामरखी का विवाह हुए थोड़े ही दिन हुए थे। उसने कोई जहर न खाया था। कोई और बात न की थी, पर चबूतरे पर से उसकी लाश उठी। पति पत्नी दोनों की लाशें एक साथ धू धू कर जलीं। एक की लपटें देश के बलिदान की कहानी कह रही थीं, तो दूसरे के प्रज्वलित शोले पति प्रेम का संदेश दे रहे थे। रामरखी सीता सावित्री जैसी सतियों की तरह पूजा के योग्य है।
वसंतकुमार विश्वास आयु में सबसे छोटे थे। वे बंगाल के नादिया जिले के रहने वाले थे। उनक आयु केवल 21 वर्ष की थी। उन्हें पहले आजीन कारावास का दण्ड हुआ था। बाद में सरकार की अपील पर इन्हें भी मृत्युदण्ड दिया गया।
अवधविहारी टै्रनिंग कॉलेज का छात्र था। फांसी के लिए ले जाते समय जब उसकी अंतिम इच्छा पूछी गयी तो वह बोला, अंतिम इच्छा यही है कि अंग्रेजी राज्य नष्टï भ्रष्टï हो जाए। अंग्रेजी आफीसर ने कहा अब यह कहने से क्या होगा इस अंतिम समय तो शांति से प्राण त्यागो। कड़क कर गर्जना की अवधबिहारी ने, शांति कैसी? मैं तो चाहता हूं कि इस प्रलंयकार आग भड़के। उस आग में तुम जलो, मैं जलूं और भारत की गुलामी भी जल उठे और उस सारी आग में मेरा भारत कुंदन बनकर निखर उठे।
क्रमश:

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