नित्य श्रद्धा भक्ति से यज्ञादि हम करते रहें

‘सत्यार्थ-प्रकाश’ के ‘नवम समुल्लास’ में एक प्रश्न किया गया है कि मुक्ति के साधन क्या हैं?

इस पर महर्षि दयानंद जी महाराज लिखते हैं :-

(1) ‘‘जो मुक्ति चाहे वह जीवनमुक्त अर्थात जिन मिथ्याभाषाणादि पापकर्मों का फल दुख है, उनको छोड़ सुख रूप फल को देने वाले सत्यभाषाणादि धर्माचरण अवश्य करे। जो कोई दुख का छुड़ाना और सुख का प्राप्त होना चाहे, वह अधर्म को छोड़ धर्म अवश्य करे, क्योंकि दुख का पापाचरण और सुख का धर्माचरण मूल कारण है। सत्पुरूषों के संग से विवेक अर्थात सत्यासत्य, धर्माधर्म, कत्र्तव्याकत्र्तव्य का निश्चय अवश्य करे। पृथक-पृथक जानें और शरीर अर्थात जीव पंचकोशों का विवेचन करें। पंच कोश ये हैं:-

एक-अन्नमय जो त्वचा से लेकर अस्थिपर्यंत का समुदाय पृथिवीमय है।

(2) दूसरा-प्राणमय , जिसमें प्राण अर्थात भीतर से बाहर जाता। अपान-जो बाहर से भीतर जाता है।

समान – जो नाभिस्थ होकर सर्वत्र शरीर में रस पहुंचाता है।

उदान – जिससे कंठस्थ अन्नपान खींचा जाता है और बल पराक्रम होता है।

व्यान – जिससे सब शरीर में चेष्टा आदि कर्म जीव करता है।

तीसरा-मनोमय-जिसमें मन के साथ अहंकार, वाक, पाद, पाणि, वायु और उपस्थ पांच कर्मेन्द्रिय हैं।

चौथा-‘विज्ञानमय’ जिसमें बुद्घि, चित्त, श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं, जिनसे जीव ज्ञानादि व्यवहार करता है।

पांचवां-आनंदमय कोश, जिसमें प्रीति प्रसन्नता, न्यून आनंद, अधिकानंद और आधार कारण रूप प्रकृति है।

ये पांच कोश कहलाते हैं इन्हीं से जीव सब प्रकार के कर्म, उपासना और ज्ञानादि व्यवहारों को करता है।

तीन अवस्था-एक जागृत, दूसरी स्वप्न और तीसरी सुषुप्ति अवस्था है। तीन शरीर हैं एक स्थूल-जो दीखता है, दूसरा-पांच गुण, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच सूक्ष्म भूत और मन तथा बुद्घि इन सत्रह तत्वों का समुदाय सूक्ष्म शरीर कहाता है। यह सूक्ष्म शरीर जन्म मरणादि में भी जीव के साथ रहता है। इसके दो भेद हैं-एक-भौतिक अर्थात जो सूक्ष्म भूतों के अंशों से बना है। दूसरा-स्वाभाविक जो जीव का स्वाभाविक गुणरूप है। यह दूसरा-अभौतिक शरीर मुक्ति में भी रहता है। इसी से जीव मुक्ति में सुख को भोगता है। तीसरा कारण शरीर जिसमें सुषुप्ति अर्थात गाढ़ी निद्रा होती है, वह प्रकृति रूप होने से सर्वत्र विभु और सब जीवों के लिए एक है। चौथा-तुरीय शरीर वह कहाता है-जिसमें समाधि से परमात्मा के आनंद स्वरूप में जीव मग्न होते हैं। इसी समाधि में संस्कार जन्म शुद्घ शरीर का पराक्रम मुक्ति में भी यथावत सहायक रहता है।

इन सब कोश अवस्थाओं में जीव पृथक है , क्योंकि जब मृत्यु होती है तब सब कोई कहते हैं कि जीव निकल गया। यही जीव सबका प्रेरक सबका धर्ता, साक्षी, कत्र्ता, भोक्ता कहाता है। जो कोई ऐसा कहे कि जीव कर्त्ता भोक्ता नही है तो उसको जानो कि वह अज्ञानी है, अविवेकी है। क्योंकि बिना जीव के जो ये सब जड़ पदार्थ हैं इनको सुख-दुख का भोग व पाप-पुण्य कर्त्तव्य कभी नहीं हो सकता। हां इनके संबंध में जीव पाप पुण्यों का कत्र्ता और सुख दुख का भोक्ता है।

जब इंद्रियां अर्थों में, मन इंद्रियों में और आत्मा मन के साथ संयुक्त होकर प्राणों को प्रेरणा करके अच्छे या बुरे कर्मों में लगाता है, तभी वह बहिर्मुख हो जाता है। उसी समय भीतर से आनंद, उत्साह निर्भयता और बुरे कर्मों में भय, लज्जा, शंका उत्पन्न होती है। वह अंतर्यामी परमात्मा की शिक्षा है। जो कोई इस शिक्षा के अनुकूल बर्तता है , वही मुक्ति जन्य सुखों को भोगता है और जो विपरीत वर्तता है , वह बंध जन्य दुख भोगता है।

(2) दूसरा साधन वैराग्य है, अर्थात जो विवेक से सत्यासत्य को जानता हो, उनमें सत्याचरण का ग्रहण और असत्याचरण का त्याग करना विवेक है। जो पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यंत पदार्थों के गुण-कर्म-स्वभाव से जानकर उसकी आज्ञापालन और उपासना में तत्पर होना उससे विरूद्घ न चलना, सृष्टि से उपकार लेना विवेक कहाता है।

(3) तीसरा साधन – षटक संपत्ति अर्थात छह प्रकार के कर्म करना। (क) एक शम -जिससे अपने आत्मा और अंत:करण को अधर्माचरण से हटाकर धर्माचरण में सदा प्रवृत्त रहना।

(ख) दूसरा ‘दम’ जिसमें श्रोत्रादि इंद्रियों और शरीर को व्यभिचारादि बुरे कर्मों से हटाकर जितेन्द्रियतादि शुभ कर्मों में प्रवृत्त रखना।

(ग) तीसरा ‘उपरति’ जिससे दुष्ट कर्म करने वाले पुरूषों से सदा दूर रहना।

(घ) चौथा-‘तितिक्षा’ चाहे निंदा स्तुति हानि लाभ कितना ही क्यों न हो, परंतु हर्षशोक को छोड़ मुक्ति साधनों में लगे रहना।

(च) पांचवा ‘श्रद्घा’ जो वेदादि सत्यशास्त्र और इनके बोध से पूर्ण आप्त विद्वान, सत्योपदेष्टा महाशयों के वचनों पर विश्वास करना।

(छ) ‘छठा समाधान’-चित्त की एकाग्रता। ये छह मिलकर एक साधन तीसरा साधन कहाता है। चौथा-‘मुमुक्षुत्व’ जैसे क्षुधा तृषातुर को सिवाय अन्न जल के दूसरा कुछ भी अच्छा नही लगता। जैसे बिना मुक्ति के साधन और मुक्ति के अतिरिक्त दूसरों में प्रीति न होना।’’

इस प्रकार महर्षि दयानंद ने मुक्ति के साधनों का शास्त्रसंगत वर्णन कर हमारी आंखें खोलने का प्रयास किया है। हमारा विचार है कि मुक्ति के साधनों में सर्वाधिक प्रमुख स्थान श्रद्घा का है। श्रद्घा का शाब्दिक अर्थ सत्य को धारण करने से है। ‘वेदादि सत्यशास्त्र और इनके बोध से पूर्ण आप्तविद्वान सत्योपदेष्टा महाशयों के वचनों पर विश्वास’ करने की बात कहकर महर्षि ने भी श्रद्घा के महत्व को द्विगुणित किया है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक उगता भारत

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