Categories
प्रमुख समाचार/संपादकीय

प्रधानमंत्री सुनें देश की पुकार

राकेश कुमार आर्य
Manmohanबात उस समय की है जब चीन में राजा वू का शासन था। एक दिन बौद्घ भिक्षु बोधिधर्म राजधानी में पधारे। राजा वू ने भिक्षु का श्रद्घा भाव से सत्कार किया। वह बौद्घ भिक्षु के पास गया और बोला-‘स्वामी मैंने बुद्घ के अनेक मंदिर बनवाए, धर्मप्रचार पर अपार धन खर्च किया, अनेक धर्मशास्त्र बंटवाए, अब तो मुझे मोक्ष सरलता से मिल जाएगा ना?
बोधिधर्म कुछ देर सोचकर बोले-‘नही तुम्हें मोक्ष नही मिल पाएगा।’
राजा वू आश्चर्य चकित होकर कहने लगा-‘क्यों स्वामी? मुझसे क्या भूल हो गयी, या मुझमें क्या त्रुटि रह गयी जो मेरे सद्कर्मों के बावजूद मुझे मोक्ष नही मिलेगा?
बोधिधर्म ने कहा-‘राजन जब व्यक्ति इस बात का बखान करता हैकि मैंने यह किया, मैंने वह किया, मैं सब तरह से सक्षम हूं, तो वह बड़ी भारी भूल करता है, क्योंकि ‘मैं’ की भावना कार्य को पुण्यवर्धक नही बना पाती। मैं की भावना को निकाले बिना अच्छे कर्म का पुण्य मिलना संभव नही है, इसलिए ‘मैं’ ग्रंथि का त्याग ही शांति और मोक्ष का आधार है। अपने कर्मों का झूठा बखान मत करो, अपितु लोक कल्याण के लिए हृदय से समर्पित हो जाओ और लोक कल्याण के सारे कार्यों को करते करते उन्हें भूलते जाओ-अवश्य ही मोक्ष के अधिकारी हो जाओगे।’
राजा का शंका निवारण हो गया।
भारत के वर्तमान राजा वू मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार के नौ साल पूर्ण होने पर अपना श्वेत पत्र जारी किया, सारा देश बोधिधर्म बन राजा का बखान सुनता रहा। जब राजा ने सारा बखान पूर्ण कर लिया तो उसने हाथ जोड़कर बोधिधर्म से कहा-‘महाराज’ अब मुझे मोक्ष मिल जाएगा ना, मैं भ्रष्टाचार की महा कीचड़ में रहकर भी उससे अलग रहा हूं- एकदम कमल की तरह। मैंने नौ साल इस देश को चलाया है और तब चलाया है जब चलाने के लिए कोई तत्पर नही था। बोधिधर्म सुनते रहे और जब राजा शांत हो गया, तो कहने लगे कि राजन तुम्हारे बखान में सिवाय इसके कि तुमने देश को नौ साल चलाया है, और कुछ नही है। आत्मप्रशस्ति में गढ़े गये श्लोकों से कभी मोक्ष नही मिला करता है।
राजा अगला प्रश्न करने को ही था कि इतने में उसके ढीले प्रशासन की साक्षी देती एक घटना छत्तीसगढ़ की ओर से आकाश में बिजली की तरह कौंधी और उस ओर देखते हुए बोधिधर्म ने कहा-‘राजन देखते हो तुम्हारे रहते हुए यह क्या हो गया है? नक्सलवादियों ने कत्लेआम करके जश्न मनाया है, जहां अपराधी अपराध करके जश्न मनाए और शासन प्रशासन पंगु बना देखता रह जाए वहां के शासक को मोक्ष पाने का सपना लेने का भी अधिकार नही होता।’
उसका आत्मप्रशस्ति का अपने आप बनाया गया प्रमाण पत्र हाथ से छूट गया।
यह मन: स्थिति डा. मनमोहन सिंह की ही नही है, अपितु भारत के प्रत्येक राजनीतिक दल की है। प्रत्येक नेता की है,।
यह 1965 की बात है। नक्सलवाद पश्चिमी बंगाल के नक्सलवाडी, फासंदा देवा और खारीवाड़ी जिलों से पैदा हुआ था। नक्सलवाड़ी जिले में आतंकवाद की पहली घटना हुई तो आंदोलन का नाम ही नक्सलवाद हो गया। नक्सलवाद इन जिलों में जागीर दारों और भूमाफियाओं के चंगुल से आदिवासी किसानों को मुक्त कराने के लिए उठा। इसने चीनी नेता माओ को अपने आंदोलन का नेता माना और देशी धरती पर विदेशी नेता की सोच की फसल उगाने लगा, माओ का मानना था कि क्रान्ति बंदूक की नाल से निकलती है, बस इसी सूत्र को पकड़कर भारत में नक्सलवाद पनपा और आगे बढ़ा। हमारी सरकारें बंदूक की भाषा को कोसती रहीं और हर घटना पर अपने सैनिकों को शस्त्र उलटे करने की मुद्रा में खड़े रहने का संकेत करती रहीं-मानो मातम की घड़ी है और इसमें चुप रहना ही उचित है। परिणाम ये आया कि नक्सलवादियों ने बहुत बड़े क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया। आज छत्तीसगढ़ में नक्सलवादियों का सिक्का चल रहा है-कई जिलों में जिलाधिकारी और एसएसपी उनकी मर्जी से नियुक्त होते हैं। राजा वू अपने प्रशस्ति पत्र के रूप में श्वेत पत्र जारी कर रहे हैं और उधर काले कारनामे हो रहे हैं। सारे राजनीतिक दलों ने इस घटना की परंपरागत शब्दों में तीव्र निंदा की है-पर यह नही समझने का प्रयास किया है कि लोकतंत्र के 65 वर्ष पूर्ण होने पर भी देश में हत्याओं के बाद शवों के पास बैठकर जश्न मनाने की घिनौनी परंपरा हमारे पतन का प्रतीक है या प्रगति का?
चीन ने नक्सलवादी हिंसा को प्रारंभ से ही अपना समर्थन दिया है, वह लाल झंडे के नीचे संपूर्ण भारत को लाना चाहता है, अभी हाल ही में चीन के प्रधानमंत्री भारत की यात्रा करके गये हैं, जिन्होंने भारत में रहकर बड़ी मीठी-2 बातें बनायी थीं लेकिन भारत से उनके निकलते ही मालूम पड़ा है कि उनकी मीठी बातों की तान जिस समय अपने चरम पर थी उसी समय चीन ने भारत की सीमा में घुसकर पांच किमी. आगे तक सड़क बना ली है। इधर चीन अपनी हरकतें कर रहा है और भारत के साथ अपने हितों को प्रमुखता प्रदान करके समझौतों पर हस्ताक्षर करके लौटे वहां के प्रधानमंत्री ली-क्विंग अपनी सफलता पर जश्न मना रहे हैं तो उनके चेलों ने छत्तीसगढ़ में धरती लाल करके जश्न मनाया है। दोनों का स्पष्ट लक्ष्य है-भारत विरोध। फिर भी ‘नीरों’ बांसुरी बजाता रहे तो इसमें उनका क्या दोष है? चीन ने 1965 से ही नक्सलवाद को बढ़ावा दिया है। उसके सरकारी समाचार पत्र ‘पीपुल्स डेली’ में नक्सलवाद से संबंधित विशेष सामग्री छपती रही है। यहां तक कि चीनी रेडियो से भी नक्सलवादी गतिविधियों का बार बार बढ़ा-चढ़ाकर प्रसारण किया गया है। नक्सलवादी भी भारत को रूस का पिट्ठू कहते रहे हैं और अपनी पत्रिका ‘लिबरेशन’ में इसी प्रकार के भारत विरोधी लेख व बयान छापते रहे हैं। इस प्रकार चीन और उसके पिट्ठू नक्सलवादियों ने भारत के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मिलकर काम किया है और वहां के किसानों को उकसाने की कार्यवाही की है। इनमें सबसे घातक कार्यवाही है हिंसा। नक्सलवादियों का मानना है कि अधिकारों के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य है। वह हिंसा में विश्वास रखते हैं और इसीलिए मई 1970 में उन्हेांने अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी महात्मा गांधी की प्रतिमाओं को भी तोड़ डाला था। इसके अतिरिक्त भारत के महापुरूषों-राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, रवीन्द्र नाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, देशबंधु चितरंजन दास इत्यादि की प्रतिमाएं भी तोड़ डाली गयीं थीं। इसका अभिप्राय है कि नक्सलवादियों का भारत की एकता और अखण्डता में कोई विश्वास नही है और वह असंवैधानिक उपायों और रास्तों को अपनाकर अपनी मांगें मनवाना चाहते हैं।
भारत की सरकार इन सारे उपायों और रास्तों को बंद करना जानती है, परंतु वह चाहती नही है कि ये उपाय और रास्ते प्रतिबंधित किये जाएं, अहिंसा की विकृत परिभाषा को राजधर्म जो बना रखा है-इसलिए बेचारी खूनियों का खून बहाने से भी बचती रहती है। उसे नही मालूम कि क्रांति का रास्ता यदि बंदूक की नली से निकलता है तो असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक गतिविधियों में संलिप्त लोगों को भी बंदूक की नली ही ठीक करती है। कम्युनिस्ट देशों में तो लोकतांत्रिक संघर्षों को भी बंदूकों की नलियों से शांत किया गया है। चीन के थेनआनमन चौक जैसे कई चौक हैं जिन्होंने लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगों को बंदूक की नली से शांत होते देखा है। यही भाषा भारत की सरकार को नक्सलवादियों को समझानी होगी। सुरक्षात्मक भाव ने पूरे देश को असुरक्षित बना रखा है। इच्छाशक्ति के अभाव में पूरा देश ही पंगु बनाकर रख दिया गया है। जबकि विश्व की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक भारतीय सेना इस देश के पास है और सेना के पास हौंसला एवं ताकत भी है परंतु लोकतंत्र में उसे कुछ लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करना पड़ता है। उसी के कारण वह अनुशासित रहते हुए बैरकों से स्वयं बाहर नही निकल सकती।
अब राजा ‘वू’ मोक्ष के निकट है, उनका श्वेत पत्र पढ़ा जा चुका है। उन्हें चाहिए कि आदिवासी किसानों के साथ अब तक हुए अन्याय को वह दूर करके और असंवैधानिक उपायों से देश केा दहला कर अपनी मांगों को पूरा कराने वाले नक्सल वादियों के खिलाफ सेना को कार्यवाही करने का आदेश दें। ‘बोधिधर्म’ इसी प्रतीक्षा में है और पीएम के मोक्ष के लिए यही अंतिम उपदेश दे रहा है। पीएम बोधिधर्म के उपदेश को सुनें देश की पुकार को सुनें। देश उनका ऋणी रहेगा।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
mariobet giriş
mariobet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
celtabet giriş
celtabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
noktabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
romabet giriş
romabet giriş
noktabet giriş
betwild giriş
betwild giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş