आज भी दलगत लोकतंत्र का गुलाम है हमारा देश

मित्रो ! कल मैं ‘उगता भारत ‘ समाचार पत्र के सह संपादक श्री राकेश आर्य जी बागपत वालों के यहां उनके पुत्र के वाग्दान संस्कार समारोह में सम्मिलित होने के लिए गया था। वहां से लौटते हुए रास्ते में सड़क के एक ओर बागपत के सांसद श्री सतपाल सिंह जी का एक पोस्टर लगा हुआ था। पोस्टर पर उनके फोटो को देखकर मैं सोचने लगा कि इस व्यक्ति ने मंत्री रहते हुए एक वैज्ञानिक सत्य को यह कहकर स्थापित करने का प्रयास किया कि मनुष्य बंदर की संतान नहीं है , हमारे पूर्वज पहले दिन से मनुष्य थे और सृष्टि के अंत तक हम इसी रूप में मनुष्य बने रहेंगे।
उनकी इस प्रकार की अभिव्यक्ति से बहुत से मूर्खों के मस्तिष्क में भूकंप आ गया । सरकार ने संज्ञान लिया और इस वैज्ञानिक सत्य को डंके की चोट कहने वाले श्री सतपाल सिंह का मंत्रालय उनसे छीन लिया गया।
यह कितने दुख की बात है कि आज के विज्ञान के युग में भी वैज्ञानिक सत्य को कहने वाले लोगों को अपमान और उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है।
मैं सोच रहा था कि हमारे देश में लगभग 800 सांसद और लगभग चार हजार विधायक किसी न किसी पार्टी या किसी न किसी नेता के गुलाम होकर संसद और राज्य विधानमंडलों में जा कर बैठते हैं। वहां पर उनकी अपनी आवाज नहीं होती , उन्हें वही बोलना पड़ता है जो उनका नेता और उनकी पार्टी उनसे चाहती है। कुछ पार्टियों और कुछ नेताओं की मुट्ठी में बंद ये गुलाम अपने अंत:करण की आवाज को उठा नहीं सकते ।
— उसे नहीं बोल सकते जो सृष्टि नियमों के अनुकूल है ,
– उसे नहीं बोल सकते जो जनहित में बहुत आवश्यक है ।
हम प्यादों के लोकतंत्र में रह रहे हैं।
हमारे जनप्रतिनिधियों को वही बोलना पड़ता है जो इनके नेता के दिमाग में सही है और जिसे इनकी पार्टी उचित मानती है ।
तब इन्हें जनप्रतिनिधि क्यों कहा जाए ? जनप्रतिनिधि थी तो वह होता है जो जनता की आवाज को उठाने वाला हो , उसका प्रतिनिधित्व करने वाला हो ।
हमारे वर्तमान सांसद और विधायक तो अपनी पार्टी और अपने नेता के प्रतिनिधि के रूप में संसद और विधानमंडलों में बैठते हैं । जनता की आवाज को उठाने पर तो इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
मैं यह भी सोच रहा था कि प्रत्येक पार्टी और प्रत्येक नेता योग्य लोगों को अपने साथ संसद में ले जाना नहीं चाहता । वह दिमाग से पैदल बुद्धू और केवल हाथ उठाने में सक्षम लोगों को ही देश की संसद और विधानमंडलों में ले जाकर बैठाना चाहता है । जिससे कि ये सारे बुद्धू समय आने पर केवल उसके सत्ता स्वार्थ की पूर्ति में उसके सहायक हो सकें। अंबेडकर जी ने सच ही तो कहा था कि हमने एक मंदिर बनाया था और उस मंदिर में अर्थात देश की संसद में माफियाओं का कब्जा हो गया।
पहले दिन से ही देश के राजनीतिक माफिया अर्थात पार्टी और उनके कुछ मुट्ठी भर नेता देश को इसी पार्टी गत लोकतंत्र का गुलाम बनाए हुए हैं ।
जनता की भावनाओं को समझने वाले और जनमानस से जुड़े हुए लोगों को राजनीतिक दल चुनाव में प्रत्याशी नहीं बनाते। अधिकतर ऐसे मूर्ख और दिमाग से पैदल लोगों को टिकट दिए जाते हैं जिन्हें समय आने पर यूज की जा सके इसलिए यह बेचारे विधायक और सांसद चुपचाप गुलाम के इक्के की तरह काम करते रहते हैं। इनके भीतर अपनी आवाज नहीं होती , इसलिए इनके भीतर विद्रोह करने का साहस नहीं होता । मौन रहकर और मौज मस्ती काटकर 5 वर्ष बाद यह बेचारे फिर पिटे हुए मोहरे की भांति जनता के सामने आ जाते हैं।
ऐसे में बहुत बड़ा प्रश्न है कि क्या हम इतना बड़ा तामझाम अर्थात व्यवस्था का यह सारा बोझ और उसके लिए इतना बड़ा खर्चा व्यर्थ ही नहीं ढो रहे ? प्रश्न यह भी है कि क्या हम देश में वास्तव में कोई लोकतंत्र स्थापित कर पाए हैं ?
बहुत सारे प्रश्न हैं ,जो झकझोर देते हैं और उत्तर यही आता है कि अभी भी हम परिपक्व लोकतंत्र को स्थापित करने में सफल नहीं हो सके हैं । यही कारण है कि देश अनिश्चितता के दौर में रहते हुए अंधकार की ओर बढ़ रहा है ।
मेरा मानना है कि जब जनप्रतिनिधि अपनी आवाज को शासक के सामने दम ठोक करके कह सकेंगे और राष्ट्रहित में आने वाली बात को अपनी पार्टी के नेता और पार्टी की नीतियों से हटकर कहने का साहस कर पाएंगे , विपक्ष में रहकर भी सरकार की राष्ट्रहितकारी नीतियों का समर्थन कर सकेंगे और सत्तापक्ष में रहकर भी राष्ट्रहित के विरुद्ध लागू की गई नीतियों का विरोध कर सकेंगे तब हम समझेंगे कि देश में वास्तविक लोकतंत्र है और सारी पार्टियां लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध हैं । आपकी क्या राय है ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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