कल के दोस्त आज के दुश्मन हो गये

देवेन्द्र सिंह आर्य
आखिर भाजपा और जद(यू) का राजनीतिक गठबंधन टूट ही गया। भाजपा में नरेन्द्र मोदी का उदय इस गठबंधन के टूटने की प्रमुख वजह माना जा रहा है। जद(यू) के वरिष्ठ नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेन्द्र मोदी रास नही आ रहे थे और उन्हें भाजपा के ‘नमो नम:’ मंत्र से भारत की राजनीति साम्प्रदायिक बनती नजर आ रही थी। हालांकि एक वक्त वो भी था जब उन्होंने श्री मोदी के भारतीय राजनीति में छा जाने और गुजरात से बाहर निकल जाने के लिए मोदी की प्रशंसा में भारत का रेलमंत्री रहते कशीदे काढ़े थे। पर राजनीति बड़ी चंचला होती है, इसमें राजनीतिज्ञों के हित कब टकरा जायें कुछ नही कहा जा सकता।Untitled
आज नरेन्द्र मोदी से नीतीश की पटरी नही बैठ रही कारण कि आज के नीतीश में और कभी के रेल मंत्री रहे नीतीश में जमीन आसमान का अंतर है। आज नीतीश को अपने कद्दावर नेता शरद यादव को भी मोड़ने की क्षमता हासिल है और रेलमंत्री के रूप में कार्यरत रहे नीतीश अटलजी के एक सिपहसालार थे इसलिए तब उन्हें नरेन्द्र मोदी साम्प्रदायिक नजर नही आते थे पर आज वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को स्वयं पाल रहे हैं और मान रहे हैं यदि नरेन्द्र गुजरात से दिल्ली की ‘टे्रन’ पकड़ सकते हैं तो मैं पटना से दिल्ली क्यों नही जा सकता? लोकतंत्र में ऐसे सपने लेना निस्संदेह नीतीश का मौलिक अधिकार है। पर अधिकारों के पीछे कर्त्तव्यों का तानाबाना भी बुना होता है और उसे नजरदांज नही किया जा सकता। देश की जनता हर नेता के राजनीतिक नाच को बड़ी बारीकी से देखती और जांचती है। उसने राजग में संयोजक रहे शरद यादव को भी देखा है, जिन्होंने गठबंधन को अभी और निभाने की बात कही पर उनकी बात तीसरे मोर्चे की राह तलाश कर दिल्ली पहुंचने को आतुर नीतीश ने नही सुनी, जनता ने नीतीश की आतुरता को भी भांपा है और इस बात पर जनता खामोशी साध गयी है कि गठबंधन टूटने का कोई कारण नीतीश और शरद यादव अपने संवाददाता सम्मेलन में नही दे सके।
जनता ने भाजपा को गठबंधन को संभाले रखकर चलने के लिए प्रयास करते भी देखा है। हालांकि भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी इस सारी स्थिति को गुड़ गोवर करने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है। उनकी ओर से यदि भाजपा में कलह को आरंभ में ही थाम लिया जाता है तो आज राजग में बिखराव की यह स्थिति नही आती। ऐसे में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की यह बात अतिश्योक्ति पूर्ण तो हो सकती
है कि भाजपा जद(यू) गठबंधन आडवाणी की शह पर टूटा है पर यह पूर्णत: असत्य नही हो सकता। भाजपा के राजनाथ सिंह ने जद(यू) के निर्णय को विश्वासघात की संज्ञा दी है।
वैसे उनका भी यह शब्द विलास ही है, क्योंकि उन्हें पहले से ही मालुम था कि जो किया जा रहा है उसका परिणाम क्या आएगा? अब उन्हें राजनीति में बेमेल गठबंधन की राजनीति को अलविदा कह देना चाहिए। अच्छा हो कि नरेन्द्र मोदी और राजनाथा सिंह की जोड़ी थोड़ी देर प्रतीक्षा कर ले और अपने बलबूते पर केन्द्र में सरकार बनाने की तैयारी करे। वैसे नीतीश कुमार सिद्घांतों के लिए समर्पित नही दीखते, वह कांग्रेस की छदम नीतियों को ही धर्मनिरपेक्षता मानकर चल रहे हैं। वह विधानसभा में भी एक सफल विश्वासघात प्राप्त नेता संगठित हो सकते हैं पर वास्तव में तो पूरे बिहार की जनता से उन्हें विश्वासमत लेना है और उनके कार्य को कितना विश्वासमत लेना है और उनके कार्य को कितना विश्वासघाती माना जाए इस पर भी बिहार की जनता की निर्णय देगी इसलिए विश्वासमत बनाम विश्वासघात के खेल के परिणाम को देखने के लिए अभी हमें जनता के निर्णय का ही इंतजार करना होगा जिसने हर परीक्षार्थी की भूमिका को गंभीरता से समझ लिया है, अब देखते हैं कि जनता 2014 में क्या निर्णय देगी। पर कुछ चीजें हैं जो ये बता रही है कि नीतीश जनता की अदालत में हार रहे हैं तभी तो वह गठबंधन टूटने के लिए नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मानने से जनता की अदालत में साफ बात कहने से बच रहे हैं। वह महत्वाकांक्षा के शिकार होकर भी जनता से डर रहे हैं। अंजाम को बयां हो रहा है।

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