महाभारत कालीन महान नारी सत्यवती बनाम आज की सशक्त महिला

महाभारत काल में भी नारियों की स्थिति बहुत सम्मान पूर्ण थी । यद्यपि इसी काल में द्रोपदी के चीर हरण होने से कुछ लोगों ने इस प्रकार की भ्रांति फैलाने का कार्य किया है कि महाभारत काल में सामाजिक पतन बहुत अधिक हो चुका था और लोग नारी को जुए में रखने या उसका चीरहरण करने तक की स्थिति में आ गए थे । हमारा मानना है कि जो लोग इस प्रकार की बात करते हैं उन्हें यह भी विचार करना चाहिए कि नारी के प्रति जब समाज की सोच में इस प्रकार का परिवर्तन आया तो उस परिवर्तन का परिणाम निकला – ‘ महाभारत ‘।

अतः महाभारत की इन घटनाओं से आज के परिप्रेक्ष्य में हमें यह शिक्षा लेनी चाहिए कि नारी के प्रति अपनी सम्मान भावना को बढ़ाएंगे और मनु महाराज द्वारा मनुस्मृति में की गई इस व्यवस्था को एक विधि के रूप में पालन करेंगे कि जहाँ नारियों का सम्मान होता है , वहां देवताओं का वास होता है । भारतवर्ष को फिर से देवभूमि बनाने के लिए यही एक उत्तम उपाय है ।
महाभारत काल तक आते-आते चाहे सामाजिक पतन की अवस्था जितनी भी अधिक क्यों न हो गई हो , परंतु इसके उपरांत भी बहुत कुछ ऐसा था जिससे हम आज भी शिक्षा ले सकते हैं । यहां पर हम महाभारत काल की एक ऐसी महान नारी के विषय में चर्चा करेंगे जिसने वासना के वशीभूत न् होकर अपने विवेक और मर्यादित आचरण कर परिचय दिया , और यह नारी थी — एक मल्लाह की सुपुत्री सत्यवती ।
महाभारत की एक महिला पात्र के रूप में सत्यवती का नाम उल्लेखनीय है । यही वह नारी थी जिसने महाभारत की कई प्रमुख घटनाओं को जन्म दिया । यह भी एक सत्य है कि यदि सत्यवती से शान्तनु का विवाह नहीं हुआ होता तो संभव है कि महाभारत ही ना होता । सत्यवती एक मल्लाह की पुत्री थी । जिस पर राजा शांतनु आसक्त हो गए थे । बहुत प्रचलित कहानी है कि राजा शांतनु ने जब अपने विवाह का प्रस्ताव सत्यवती के समक्ष रखा तो उसने राजा के प्रस्ताव को स्वीकार करके भी यह कहकर ठुकरा दिया कि मेरा आपसे विवाह होगा कि नहीं , इसका निर्णय मेरे पिता करेंगे । यह कितने आश्चर्य की बात है कि एक छोटे से मल्लाह की सुपुत्री को एक सम्राट अपनी रानी बनाने का प्रस्ताव दे रहा है और वह उस प्रस्ताव को पाकर मारे प्रसन्नता के उछली नहीं , अपितु अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखकर बड़े संयत भाव से कह दिया कि – ‘ इसका निर्णय तो महाराज मेरे पिताश्री करेंगे। ‘
सत्यवती के इस उत्तर को पाकर जब राजा शांतनु सत्यवती के पिता के पास गए तो सत्यवती के पिता ने कहा कि – ‘ यदि मेरी पुत्री से उत्पन्न पुत्र को ही आप हस्तिनापुर का शासक बनाएं तो मैं यह संबंध सहर्ष स्वीकार कर सकता हूं । ‘ इस पर राजा ने कहा कि हस्तिनापुर का युवराज तो मैं और मेरी राज्यसभा मेरी पूर्व पत्नी के पुत्र देवव्रत को नियुक्त कर चुके हैं। जिसमें मैं अब कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता । ‘ राजा के इस प्रकार के कथन को सुनकर तब मल्लाह ने भी कह दिया कि – ” यदि आप ऐसा नहीं कर सकेंगे तो मैं भी अपनी पुत्री का आपके साथ विवाह नहीं कर पाऊंगा। ”
इस पर राजा गंभीर सोच – विचार में पड़ गए और वहां से अपने घर लौट आए । तब राजा की मन:स्थिति की जानकारी करके राजकुमार देवव्रत ( जो बाद में भीष्म के नाम से विख्यात हुआ ) स्वयं चलकर सत्यवती और उसके पिता के पास पहुंच गया । उसने सत्यवती और उसके पिता को अपनी ओर से यह कहकर आश्वस्त किया कि – ” मैं राजगद्दी का उत्तराधिकारी नहीं बनूंगा । मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मेरे पिता से जो भी संतान सत्यवती को प्राप्त होगी , वही हस्तिनापुर की शासक बनेगी । ”
तब सत्यवती के पिता ने कहा कि यह कोई बात नहीं हुई । हमें क्या पता ? यह भी तो हो सकता है कि आप स्वयं राजा न बनकर अपने पुत्र को राजा बना दें । तब इस पर देवव्रत ने भीषण प्रतिज्ञा की कि मैं जीवन भर ब्रह्मचारी रहूंगा और विवाह नहीं करूंगा । इसके उपरांत राजा शांतनु का सत्यवती के साथ विवाह संपन्न हुआ ।
इस छोटी सी परंतु अत्यंत महत्वपूर्ण घटना से हमें पता चलता है कि उस समय एक प्रतापी शासक का भी यह साहस नहीं था कि वह एक मल्लाह की पुत्री को उठाकर अपने घर ले आए और उससे विवाह कर ले । जब एक राजा ऐसा आचरण नहीं कर सकता था कि वह किसी भी महिला को बलात अपने राजभवन में ले आए तो जनसाधारण की स्थिति क्या होगी ? पाठक सहज ही अनुमान लगा सकते हैं । स्पष्ट है कि उस काल में महिलाएं बहुत सम्मानपूर्ण जीवन जी रही थीं । जनसाधारण से लेकर राजा तक किसी का भी यह साहस नहीं था कि वह किसी की भी बेटी से जबरन विवाह कर ले। यह एक वास्तविक लोकतंत्र का काल था , जब एक प्रतापी सम्राट भी एक मल्लाह की सुपुत्री से मर्यादानुकूल व्यवहार करते हुए उससे उसका हाथ मांग रहा था । समाज और राजकीय व्यवस्था के द्वारा प्रदत्त मल्लाह की पुत्री को भी यह अधिकार था कि वह राजा के प्रस्ताव को स्वीकार करे या न करे ।
इसके पश्चात दूसरी बात यह देखिए कि मल्लाह की सुपुत्री को भी यह कहने का अधिकार था कि वह किसके साथ अपना विवाह करेगी – इसका निर्णय उसके पिता लेंगे । मल्लाह की सुपुत्री भी भावनाओं के प्रवाह में बही नहीं । यदि वह चाहती तो इतने बड़े प्रतापी शासक के विवाह प्रस्ताव को अपना सौभाग्य मानकर स्वयं स्वीकार कर लेती और राजा के साथ चली जाती । परंतु उसने भी मर्यादा का पालन किया और राजा से बड़े विनम्र भाव से परंतु स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि यदि वह मेरा विवाह अपने साथ चाहते हैं तो इसके लिए उन्हें मेरे पिता के पास जाना ही होगा।
जब राजा सत्यवती के पिता के पास जाता है तो वह भी स्वतंत्रता के साथ भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सदुपयोग करते हुए राजा को निर्भीकता से अपना उत्तर देता है , और कह देता है कि यदि आप मेरी सुपुत्री के पुत्र को ही हस्तिनापुर का राजा बनाएं तो मैं अपनी पुत्री का विवाह आपके साथ सहर्ष कर सकता हूं । यह भी उस समय के लोकतंत्र का एक आदर्श उदाहरण है । जब एक प्रतापी शासक एक मल्लाह के द्वार पर स्वयं चलकर जाता है और उससे अपने मन की बात कहता है । राजा यदि चाहता तो उस मल्लाह को अपने दरबार में बुला लेता । जहां राजा के राजकीय वैभव को देखकर मल्लाह स्वयं ही राजा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता । पर यह दूसरी बात हो रही है । राजा स्वयं मल्लाह के द्वार पर पहुंचा है और मल्लाह उसके सामने खड़ा होकर अपने मन की बात कहने का साहस कर रहा है । आजकल ‘ राजा ‘ की बात तो छोड़िए गली मोहल्ले का विधायक भी किसी मल्लाह की बेटी को ऐसा बोलने का अधिकार नहीं दे सकता और ना ही मल्लाह को इतना बोलने का साहस हो सकता है जितना महाभारत के काल में घटित इस घटना में हमें देखने को मिल रहा है। सचमुच आज इतिहास को सही ढंग से समझने की आवश्यकता है।

इसके साथ ही साथ फिर एक लोकतांत्रिक उदाहरण देखिए । राजा यहां पर आसक्ति के वशीभूत होकर भी मर्यादा का त्याग नहीं करता । वह कह देता है कि यह निर्णय करना कि मेरे बाद राजा कौन बनेगा ? – अब उसके हाथ की बात नहीं रही । क्योंकि देवव्रत को अपना युवराज घोषित करने के उपरांत वह अपने इस अधिकार का परित्याग कर चुका है । अब देवव्रत राजा बनेगा या कोई और बनेगा , इसका निर्णय तो राज्यसभा को ही करना है । जिसके समक्ष मैं अपनी बात को कह भी नहीं सकता । राजा संकोच और लोक मर्यादा के भय से व्यथित हो उठे ।
तब क्या हो ? -इस प्रश्न का उत्तर स्वयं देवव्रत बनकर सामने आया और उसने मर्यादित आचरण करते हुए पिता के लिए प्रतिज्ञा लेकर सबकी समस्याओं का समाधान कर दिया। उसने स्पष्ट कर दिया कि वह राजा नहीं बनेगा और अपने राजपद को अपने पिता और माता सत्यवती से होने वाली संतान के लिए सहर्ष छोड़ता है । इस पर सत्यवती के पिता ने फिर एक प्रश्न उछाल दिया कि हो सकता है , आप राजा न बनने पर अपनी संतान को राजा बना दें ? तब देवव्रत ने फिर ‘ भीषण प्रतिज्ञा ‘ की कि वह कभी विवाह नहीं कराएगा और आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए जीवन यापन करेगा।
सत्यवती एक ऐसी महान महिला है जिसने न केवल अपने विवाह के समय मर्यादा पालन करने के प्रति अपनी निष्ठा का परिचय दिया , अपितु अपने शेष जीवन में भी उसने मर्यादा पालन करने में कहीं भी प्रमाद का प्रदर्शन नहीं किया । उसने अपनी भूमिका को संतुलित और मर्यादित बनाकर रखा । अपने पुत्रों के साथ – साथ उसने देवव्रत से भीष्म बने शांतनु के पहले पुत्र के साथ भी ममतामयी आचरण किया और सदैव उसके प्रति ममतामयी संबंध बनाए रही।
चित्र विचित्र की मृत्यु के उपरांत एक समय ऐसा भी आया था जब हस्तिनापुर के राज्य सिंहासन के लिए कोई उत्तराधिकारी उपलब्ध नहीं था। तब माता सत्यवती ने भीष्म से यह अनुरोध किया था कि वह अब अपनी प्रतिज्ञा को त्यागकर चित्र विचित्र की पत्नियों में से किसी के साथ अपना विवाह संस्कार कर ले और संतति उत्पन्न कर हस्तिनापुर को कोई योग्य उत्तराधिकारी प्रदान करें । यहां पर भीष्म ने हठ का परिचय दिया और उसने देश , काल व परिस्थिति पर विचार न करते हुए माता सत्यवती के आग्रह को ठुकरा दिया । यदि उस समय भीष्म इस महान देवी के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते तो हस्तिनापुर वर्णसंकर संतान की भेंट नहीं चढ़ता । परंतु दुर्दिन किसी से पूछ कर नहीं आते और इस समय हस्तिनापुर के साथ भी यही हो रहा था कि उसे दुर्दिनों की ओर बढ़ने से कोई रोक नहीं पा रहा था ।
सत्यवती के जीवन से हमें यही प्रेरणा मिलती है कि अपनी बात को मर्यादा और संतुलन के साथ कहने का साहस रखो । नैतिकता को जीवन का श्रंगार बनाओ और देश , काल , परिस्थिति पर विचार करते हुए सही निर्णय लो । व्यक्ति यदि अपनी भूमिका को संतुलित और मर्यादित बना लेता है तो वह निश्चय ही सफलता की सीढ़ियों को चूम लेता है ।
आजकल की कोई नारी जब फिल्मी सितारों की ऐश्वर्यपूर्ण जिंदगी से प्रभावित होकर उनके हाथों अपने शील को बेचती हुई देखी जाती है या किसी अन्य ‘ दिग्विजय ‘ के पद , पैसा व प्रतिष्ठा से प्रभावित होकर अपना शील हरण स्वयं कराती है तो उसकी आधुनिकता और महिला सशक्तिकरण के प्रति उसकी निष्ठा पर संदेह होता है । उसके भीतर की वह सशक्त महिला मर चुकी है जो अपने अधिकारों की विनम्रतापूर्वक रक्षा करने में उसी प्रकार सक्षम हो जैसे सत्यवती ने अपने धर्म और शील की रक्षा की थी। कहने का अभिप्राय है कि उच्छृंखलता का नाम महिला सशक्तिकरण नहीं है ,अपील अपने अधिकारों की विनम्रतापूर्वक और बिना किसी भावनात्मक प्रवाह में बहे रक्षा करने का नाम महिला सशक्तिकरण है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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