राम द्वारा विराध राक्षस को उसकी कुचेष्टा का यथा योग्य दंड देना

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बाल्मीक रामायण का इस देश के जनमानस पर व्यापक प्रभाव है। राम को हुए 8.70 लाख से अधिक वर्ष व्यतीत हो चुके हैं परन्तु ऐसा लगता है कि यह कुछ ही दिनों पूर्व की बात हो। बहुत से लोगों ने रामायण को नहीं पढ़ा होता परन्तु वह राम के जीवन की अधिकांश घटनाओं को जानते हैं। इसका कारण उनका रामलीला जैसे नाटकों को देखना व अनेक अवसरों पर तुलसीकृत रामायण का पाठ व कथायें सुनना है। रामायण की ऐसी ही एक घटना राम द्वारा राक्षस विराध का दण्डकारण्य में उसके पापाचरण के कारण वध करना है। इस पूरी घटना को हम पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिये प्रस्तुत कर रहे हैं। यह घटना हमने ‘हरयाणा साहित्य संस्थान, गुरुकुल झज्जर, झज्जर’ द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘महारानी सीता’ से ली है। इस पुस्तक के लेखक हैं स्वामी ओमानन्द सरस्वती एवं आचार्य वेदव्रत शास्त्री। यह दोनों ही विद्वान दिवंगत हो चुके हैं। हमने इन दोनों विद्वानों को देखा है और इनके व्याख्यान व उपदेश भी सुने हैं। पं0 वेदव्रत शास्त्री जी ‘सर्वहितकारी साप्ताहिक पत्र’ निकालते थे जो हमें विगत 20 वर्षों से प्राप्त हो रहा है। ‘महारानी सीता’ पुस्तक का प्रथम संस्करण सन् 2011 में प्रकाशित हुआ है। 172 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य एक सौ रूपये है और यह एक महत्वपूर्ण पठनीय ग्रन्थ है। इस पुस्तक में बाल्मीकि रामायण में माता सीता जी से जुड़ी घटनाओं को प्रस्तुत किया गया है। सभी परिवारों में यह पुस्तक होनी चाहिये और सभी सदस्यों को इसका पाठ करना चाहिये। इसके स्वाध्याय से परिवारजनों को अच्छे संस्कार प्राप्त होने सहित धर्म की रक्षा भी होगी। स्वाध्याय से यह लाभ होता है कि हम जिस महापुरुष का जीवन चरित्र पढ़ते हैं उसके कुछ व अनेक गुण पढ़कर व सुनकर वह हमारे भीतर प्रविष्ठ हो जाते हैं और हमारे जीवन व विचारों को प्रभावित करते हैं। राम और सीता जी ने भी अपने विद्यार्थी जीवन में अपने गुरुजनों व परिवारजनों से तत्कालीन व पूर्व के विद्वानों व प्रसिद्ध देवियों के चरित्रों को पढ़ा व सुना था। उन्होंने वेदों का भी विद्वानों व ऋषियों से अध्ययन किया था। इसी का परिणाम उनका आदर्श व यशस्वी जीवन था। आज भी राम चन्द्र जी व सीता जी का जीवन हमारे लिये आदर्श एवं प्रेरणादायक है। अतः हम सबको इस पुस्तक के स्वाध्याय से लाभ उठाना चाहिये। इसके अतिरिक्त हमें बाल्मीकि रामायण का भी पाठ करना चाहिये।

‘महारानी सीता’ पुस्तक में विराध राक्षस के वध की घटना इस प्रकार दी गई है। वह (विराध) राक्षस बाघ की खाल पहने हुए था तथा चर्बी तथा रुधिर से लिपटा हुआ था। वह मुख फाड़कर काल की भांति सब प्राणियों को भयभीत करनेवाला राम, लक्ष्मण व सीता के सम्मुख आया और सीता को कमर से पकड़कर उठाकर अपने कंधे पर रख पीछे हटकर बोला-कैसे तुम दोनों तपस्वी बनकर एक स्त्री के साथ रहते हो? तुम दोनों युवक अधर्मचारी पापी कौन हो जो मुनियों को दूषित करते हो? मैं विराध नाम का राक्षस इस दुर्गम वन में सदा ऋषियों का मांस खाता हुआ शस्त्र सहित विचरण करता हूं। यह उत्तम नारी मेरी भार्या (पत्नी) होगी और तुम दोनों पापियों का युद्ध में मैं रुधिरपान करुंगा।

विराध राक्षस के ऐसे गर्वयुक्त वाक्य सुनकर जनकसुता प्रबल वायु के वेग से केले की भांति कांपने लगी। तब राम ने धनुष पर चिल्ला चढ़ाकर तीक्ष्ण तीर से उस राक्षस को बींध दिया। तीरों से बिंधा हुआ वह राक्षस सीता को छोड़कर त्रिशूल उठाकर क्रुद्ध हुआ राम लक्ष्मण की ओर दौड़ा। उसके वज्रतुल्य त्रिशूल के राम ने टुकड़े टुकड़े कर दिए। उन दोनों की मार खाता हुआ वह भयंकर राक्षस दोनों को भुजाओं से उठाकर भागने लगा। उस राक्षस की बाईं भुजा लक्ष्मण ने और दाईं राम ने बलपूर्वक तोड़ दी। भुजायें टूट जाने पर वह मूच्र्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। बहुत बाणों से बिंधे हुए तथा तलवारों से जख्मी राक्षस ने पुरुष श्रेष्ठ राम को कहा कि हे पुरुष-व्याघ्र! इन्द्र समान बलवाले आपने मुझे मारकर प्राणों से विमुक्त कर दिया। आप मुझे गड्ढे में फेंककर कुलशतापूर्वक जायें। मरे हुए राक्षसों को गड्ढे में डालने की सनातन मर्यादा है। उक्त वचन सुनकर महाबली राक्षस ने प्राण त्याग दिए। लक्ष्मण ने गड्ढा खोदकर और राम लक्ष्मण ने उसको गड्ढे में डालकर दोनों भाई भयरहित होकर महावन में आनन्दपूर्वक घूमने लगे।

इस घटना में राम व लक्ष्मण सहित माता सीता के चरित्र पर भी प्रकाश पड़ता है। राम वीर, साहसी, निर्भीक, दुष्ट-दमन-कर्ता, मर्यादा-पालक, दुष्टों के लिये मृत्यु के समान भयानक, पत्नी व नारी जाति के रक्षक आदि अनेक गुणों से युक्त थे। जब हम रामायण व राम चन्द्र जी के जीवन की इस प्रकार की घटनाओं को पढ़ते हैं तो हमारे जीवन में भी यह गुण प्रविष्ठ हो जाते हैं। यह स्वाध्याय करने का लाभ है। हम आशा करते हैं कि यह संक्षिप्त लेख पाठकों को पसन्द आयेगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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