डॉक्टर अम्बेडकर का आर्थिक दृष्टिकोण

डा. अम्बेडकर जी का जन्म 1891 में हुआ था। उस समय स्वामी दयानंद जी संसार में नहीं थे ,परंतु उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज बहुत सक्रियता के साथ कार्य कर रहा था। उनके मानस पुत्रों ने सारे देश को अपने वैचारिक प्रभाव में ले लिया था। जिस समय डॉक्टर अंबेडकर युवावस्था में प्रवेश कर रहे थे उसे समय आर्य समाज अपने कई प्रकार की क्रांतिकारी कार्यों से देश के युवाओं का मार्गदर्शन कर रहा था। बड़ौदा नरेश स्वामी दयानंद जी के विचारों से बहुत अधिक प्रभावित थे। जब उन्होंने देखा कि डॉक्टर अंबेडकर को शिक्षा प्राप्त करने में विशेष व्यवधान आ रहा है तो उन्होंने स्वामी दयानंद जी के विचारों से प्रभावित होकर इस प्रतिभावान युवा के लिए विशेष साधन उपलब्ध कराने के लिए अपने आप को प्रस्तुत किया।
इस प्रकार डा. भीमराव अम्बेडकर को बी.ए., एम.ए., पी.एच,डी., डी.एस.सी. (लन्दन), एल.एल.डी., बार-एट-ला, जैसी उपाधियों से विभूषित और प्रकाण्ड पण्डित बनाने में आर्यसमाजी आन्दोलन का विशेष योगदान रहा। डॉ आंबेडकर भी इस बात को भली प्रकार जानते थे कि यदि बड़ौदा नरेश ने उनके लिए विशेष साधन उपलब्ध कराकर उन्हें शिक्षा महारथी बनाने में अपना योगदान दिया है तो उसके पीछे स्वामी दयानंद जी का वैचारिक आंदोलन खड़ा था। यही कारण रहा कि उन्होंने स्वामी दयानंद जी के विचारों से अनेक स्थानों पर सहमति व्यक्त की है और कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं अप्रत्यक्ष रूप से स्वामी जी के विचारों का समर्थन किया है। डॉ आंबेडकर को विद्वान बनाने में आर्य नरेश श्री सयाजीराव गायकवाड़ का विशेष योगदान रहा जिन्होंने 1912 से 1915 तक डा. भीमराव अम्बेडकर को उच्च विद्या-विभूषित करने के लिए शिष्यवृत्तियां प्रदान कीं। महाराजा गायकवाड ने डॉक्टर अंबेडकर को उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए अमेरिका भेजा। यदि महाराजा गायकवाड के भीतर डॉ आंबेडकर के प्रति जातीय द्वेष होता तो वह ऐसा कदापि नहीं करते। हम सभी प्रकार जानते हैं कि राज ऋषि शाहू महाराज भी आर्य समाज के आंदोलन से बहुत अधिक प्रभावित थे। उन पर स्वामी दयानंद जी के विचारों का गहरा प्रभाव था। उन्होंने भी डॉ अंबेडकर को अंबेडकर बनाने में विशेष योगदान दिया था। राजर्षि शाहू महाराज ने भी सन् 1919 से 1922 तक अम्बेडकरजी को विदेश जाकर शिक्षा प्राप्त करने के लिए हर प्रकार की सहायता प्रदान की थी।
आर्यनरेश राजर्षि शाहू महाराज ने पत्रकार डा. अम्बेडकर के विषय में सन् 1920 में माणगांव में सम्पन्न प्रथम अस्पृश्यता परिषद में यह भविष्यवाणी भी की थी कि ’डा. अम्बेडकर भारतवर्ष के अखिल भारतीय नेता होंगे।’ स्पष्ट है कि इन दोनों महाराजाओं के ऊपर स्वामी दयानंद जी के मानवीय विचारों की गहरी छाप थी। जिसके चलते उन्होंने डॉक्टर अंबेडकर के निर्माण में अपना भरपूर सहयोग प्रदान किया। उन्होंने यह नहीं देखा कि डॉ अंबेडकर की जाति क्या है ! उन्होंने केवल एक बात देखी कि निम्न कुल में उत्पन्न बच्चे को भी राष्ट्र नायक बनाने में सहयोग देना चाहिए। यही कारण था कि उदारता का प्रदर्शन करते हुए राजा ने यह भविष्यवाणी कर दी कि भविष्य में डॉक्टर अंबेडकर एक राष्ट्र नायक के रूप में स्थापित होंगे। हमें ध्यान रखना चाहिए कि स्वामी दयानंद जी के विचारों से प्रेरित आर्य समाज का आंदोलन अपने तत्कालीन परिवेश में सर्वत्र अपनी आभा बिखेर रहा था जिससे हर समझदार और राष्ट्रभक्त व्यक्ति प्रभावित था। बड़ौदा नरेश तो स्वामी जी के जीवन काल में भी उनके परम भक्त रहे थे। उनकी इच्छा थी कि स्वामी जी के राष्ट्रवादी उद्बोधन राजाओं के भीतर की निष्क्रियता और निकम्मेपन को दूर करने में समर्थ हो सकते हैं। इसलिए वह ऐसे प्रयास निरंतर करते रहे कि स्वामी जी महाराज तत्कालीन राजाओं के भीतर छाई हुई निष्क्रियता को दूर करने के लिए उन्हें सामूहिक रूप से संबोधित करते रहें।
आगे चलकर जब स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने महर्षि दयानंद जी के अछूत उद्धार के कार्य को आगे बढ़ाया और इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये तो डॉक्टर अंबेडकर स्वामी श्रद्धानंद जी के इस प्रकार के कार्यों से अत्यधिक प्रभावित हुए थे।
अपनी ‘व्हाट कांग्रेस एण्ड गांधी हैव डन टू दि अन्टचेबल्स’ पुस्तक में डॉ अंबेडकर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि ‘स्वामी श्रद्धानन्द दलितों के सर्वश्रेष्ठ सहायक और समर्थक थे। अस्पृश्यता निवारण से सम्बन्धित (कांग्रेस की) समिति में रहकर यदि उन्हें स्थिरता से काम करने का अवसर मिल पाता तो निःसन्देह एक बहुत बड़ी योजना आज हमारे सामने विद्यमान होती।’
हम सभी जानते हैं कि भारतीय स्वाधीनता के क्रांतिकारी आंदोलन के महान नेता लाला लाजपत राय जी पर महर्षि दयानंद जी के विचारों का गहरा प्रभाव था। लाला लाजपत राय जी के विचारों ने हमारे देश के अनेक क्रांतिकारी युवाओं को प्रभावित किया था। जब लाला लाजपत राय जी पर पंजाब में पुलिस का बर्बरता पूर्ण लाठी प्रहार हुआ तो इस घटना से उस समय का युवा आंदोलन हो उठा था। बाद में लाल जी की मृत्यु हुई तो देश के अनेक क्रांतिकारी युवाओं ने उनकी मौत का प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया। जिस समय लाका जी की मृत्यु हुई उस समय डॉक्टर अंबेडकर जी ने भी उन्हें अश्रुप्पूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की थी। डा. भीमराव जी अम्बेडकर जनवरी, 1913 में बड़ौदा आये थे और यहां उनका दलितोद्धार का कार्यकरने वाले आर्यसमाज के विद्वान पं. आत्माराम अमृतसरी जी से परिचय हुआ। अमृतसरी जी उन्हें उपयुक्त निवास की व्यवस्था होने तक अपने साथ आर्यसमाज वडोदरा में ले आये थे जहां वह एक सप्ताह तक उनके साथ रहे थे। स्वाभाविक है कि पं. आत्माराम अमृसरी और आर्यसमाज के इस सहवास व निकटता से डा. अम्बेडकर जी को आर्यसमाज की विचारधारा को जानने व समझने का अवसर मिला होगा और उन्होंने आर्यसमाज के दैनिक सन्ध्या व अग्निहोत्र सहित अन्य गतिविधियों को भी देखा व समझा होगा और इनको करने के कारणों व होने वाले लाभों को भी जाना होगा।
आज हम डॉक्टर अंबेडकर जी की जयंती मना रहे हैं। इस अवसर पर हमें केवल एकपक्षीय बात नहीं करनी चाहिए कि डॉक्टर अंबेडकर ही शिक्षा क्षेत्र के ऐसे महारथी रहे, जिनसे पहले इस देश में शिक्षा से कोई परिचित नहीं था। हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन काल से ही भारत शिक्षा क्षेत्र में अग्रणी रहा है और अपने शिक्षा क्षेत्र में किए गए अनेक प्रकार के ज्ञान विज्ञान के कार्यों से ही यह देश प्राचीन काल से विश्व गुरु के रूप में सम्मानित रहा है। वेदों की ओर लौटने का आवाहन करके स्वामी दयानंद जी महाराज ने हमें अपने स्वर्णिम अतीत का बोध कराया था। इस प्रकार राष्ट्रबोध, संस्कृति बोध और इतिहास बोध के साथ-साथ स्वबोध से प्रेरित होकर हमने डॉक्टर अंबेडकर का निर्माण किया। जिनका भारत के संविधान के निर्माण में विशेष योगदान रहा। यद्यपि जिस संविधान को हम डॉक्टर अंबेडकर द्वारा निर्मित कहते हैं उस संविधान का 80% भाग विदेशी संविधानों से लिया गया है। उसमें भी सबसे अधिक भाग ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए 1935 के भारत सरकार अधिनियम से लिया गया है । डॉक्टर अंबेडकर स्वयं कहते थे कि यदि मेरी चले तो इस संविधान को जलाने वाला सबसे पहला व्यक्ति मैं होऊंगा। इसलिए इस संविधान को बाबा छाप संविधान कहना डॉक्टर अंबेडकर जी का अपमान करना है। उनका राष्ट्रवादी चिंतन हम सबके लिए प्रेरणादायक है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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