kaiyat

लेखक – आर्य सागर 

वैदिक सभ्यता की शुरुआत से ही कश्मीर विलास का नहीं विद्वता का प्रतिनिधि व संवाहक रहा है। वैदिक काल ही नहीं मध्यकाल तक भी वेद ,वेदांग ,संस्कृत, दर्शन साहित्य के एक से बढ़कर एक विद्वान कश्मीर ने दिये है। 14वी शताब्दी तक काशी नगरी की विद्या में प्रतिद्वंदी यदि कोई भूमि रही है तो वह कश्मीरी रही है। कश्मीर से जाकर न्याय, मीमांसा, संस्कृत व्याकरण के अनेकों कश्मीरी विद्वानों ने काशी आदि के विद्वानों को शास्त्रार्थों में पराजित किया है । संस्कृत में पर्वत को नग कहते हैं पर्वत से जो झरना जलीय स्रोत निकलता है उसे नाग कहते हैं वेरीनाग, अनंतनाग जैसे सैकड़ो झरने कश्मीर में आज भी बहते हैं बस ज्ञान गंगा सुख गयी है जो कश्मीर में कभी बहती थी। मध्यकाल तक इन्हीं झरनो के किनारे अनेकों विद्वानों ने वैदिक साहित्य की सेवा की है वहीं प्राचीन वैदिक काल में कश्मीर में अनेकों ऋषि मुनियों ने तपस्या की अनेकों यज्ञ याग कश्मीर में रचायें ।

कश्मीर की इस प्राचीन वैदिक परंपरा पर अन्य किसी लेख में लिखा जाएगा जितना लिखा जाए फिर भी उतना थोड़ा होगा। हम बात करते हैं संस्कृत भाषा व्याकरण के अद्वितीय विद्वान कैयट की जिन्होंने पाणिनि ऋषि के अष्टाध्यायी व्याकरण सुत्र ग्रन्थ पर महर्षि पतंजलि के विशाल भाष्य जिसे महाभाष्य कहते हैं उस पर ‘ प्रदीप’ टीका लिखी हैं। संस्कृत व्याकरण भाषा शास्त्र व न्याय दर्शन पर विद्वान कैयट ने 15 के लगभग ग्रंथ लिखे हैं।

कैयट विद्या के उपासक थे ।उनके पास संसाधनों के नाम पर कुछ पोथिया एक चटाई एक कमंडल था,आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं था । कहा जाता है वह दिन भर इधर-उधर खेतों से जाकर अन्न संग्रह करते उच्छवृति से गुजारा करते और देर रात्रि तक साहित्य का सृजन करते हैं ऐसा करते वह गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए उनकी धर्मपत्नी अर्धांगिनी से उनकी यह हालत नहीं देखी गई उन्होंने हाथ जोड़कर कहा- पतिदेव आप दिन में भोजन प्रबंध की चिंता ना करें मैं पास से ही मूंज घास इकट्ठा कर उसकी रस्सी बना लिया करूंगी जिन्हें बेचकर हमारा गुजारा चल जाएगा ।आप केवल निश्चिंत होकर अध्ययन लेखन पर केंद्रित रहे विद्या दिवाकर अस्त नहीं होना चाहिए। कैयट की पत्नी मूंज घास की रस्सी बनाकर जिनका उपयोग श्रौत यज्ञ यागो में होता था उन का विक्रय करती थी उससे ही गुजर बसर होता था।

एक बार दक्षिण भारत के विद्वानों का एक दल कश्मीर आया ।यहां उल्लेखनीय होगा यह भारत की प्राचीन परंपरा रही है यहां दक्षिण के विद्वान उत्तर आते तो उत्तर के विद्वान दक्षिण भारत जाते थे। विद्या के प्रचार प्रसार के लिए ।यहां पर्यटन मनोरंजन के लिए नहीं रहा प्राचीन काल में कोई भी कश्मीर जाता था तो वह शास्त्रों में अधिकार अर्जित करने विद्या वृद्धि सीखने के लिए ही जाता था विशुद्ध बौद्धिक पर्यटन की परंपरा रही है। भारत विश्व गुरु यूं ही नहीं बन गया था।आदिशंकर भी कश्मीर में इसी महान योजना के तहत आए थे। वहीं नशेड़ी अय्यास मुगल बादशाह जहांगीर जब कश्मीर आया तो उसने उसमें केवल विलास ही ढूंढा उसने इसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर इसे जन्नत घोषित किया और मदिरा में डूब गया जब शहजादा खुर्रम में बगावत की जिसको शाहजहां के नाम से जाना जाता है तब भी वह कश्मीर को ना छोड़ सका लेकिन प्राचीन संस्कृत साहित्य में महाकवि कालिदास आदि के साहित्य में कश्मीर को इससे भी उत्तम उपमा कश्मीर को पहले से ही मिली हुई है। भौतिक तौर पर कश्मीर भारत माता का मुकुट है लेकिन उससे भी पहले यह राष्ट्र देवता रूपी विश्व गुरु भारत का मस्तिष्क रहा है शेष भारत से भी अधिक भारतीय कश्मीर है । आचार्य शंकर शारदा पीठ का भी अनूठा सम्बन्ध रहा । कश्मीर का एक नाम शारदा देश भी रहा है। दुर्भाग्य से वह शारदा पीठ / मन्दिर आज पाक अधिकृत कश्मीर में है ।शारदा लिपि का भी कश्मीर में ही आविष्कार शारदा पीठ से हुआ ।शारदा लिपि से ही गुरुमुखी लिपि का विकास हुआ है जो आज पंजाबी भाषा की लिपि है गुरुग्रंथ साहब जिसमें लिखा गया ।

लेख के मूल प्रसंग पर लोटते है दक्षिण के विद्वानों ने जब कैयट से भेंट वार्ता की तो वह उनके अपूर्व पांडित्य तर्क शक्ति सरलता विनम्रता के सामने नतमस्तक हो गए लेकिन उनकी दीन हीन स्थिति को देखकर उनको बहुत ग्लानि भी हुई। दाक्षिणात्य विद्वानों के उस दल ने कश्मीर के तत्कालीन राजा से भेंट की जो पांडवों की वंश परंपरा का राजा था कश्मीर के ही एक अन्य संस्कृत के विद्वान इतिहासकार कल्हण रचित ‘राजतरंगिणी’ ग्रन्थ में भी उसका उल्लेख मिलता है । उन्होंने कैयट की स्थिति से उनका परिचय कराया राजा खुद चलकर के कैयट की कुटिया पर आए राजा ने कहा हे! विद्वन मुझे क्षमा करना। मेरे राज्य में रहते हुए भी तुम इतना कष्ट पा रहे हो मुझे पाप लगेगा। राजा ने अनेक बार इस वाक्य को दोहराया कैयट ने इतना ही कहा राजा में आपसे एक वचन मांगता हूं क्या आप पूरा करेंगे राजा ने कहा बताएं क्यों नहीं निःसंकोच आप मुझ से कुछ भी मांगे ।कैयट ने कहा- मुझे व मेरी पत्नी को तत्काल कश्मीर छोड़ने की आज्ञा दें मैं नहीं चाहता मुझ दीनहीन व्यक्ति के रहते तुम्हें पाप लगे ।यह देख सुन वहां उपस्थित अन्य लोग दंग रह गए । उन्होंने सोचा निर्धनता के कारण कैयट चिड़चिड़ा हो गए हैं लेकिन राजा ने जब कैयट को आजीविका के लिए कुछ गांव देने की पेशकश की कैयट ने इतना ही कहा की राजा में किसी धन विलास का भूखा नहीं हूं ।मेरा जीवन बहुत आराम से कट रहा है यही ब्राह्मण वृति है विद्या का दान करना मेरा कर्तव्य है मेरा प्रत्येक क्षण अमूल्य है । आप मेरा अमूल्य समय खराब कर रहे हैं मुझे मेरे ग्रंथ को पूरा करने दीजिए मुझे आप मेरे हाल पर छोड़ दो ।आप तत्काल यहां से चले जाएं राजा लाख अनुमेय विनय करता रहा लेकिन कैयट ने राजा के एक भी आग्रह को स्वीकार नहीं किया राजा निराश लौट गया।

इतनी महान रही है कश्मीर की भूमि । कश्मीर में प्रत्येक घर में वैदिक विद्वान स्कॉलर होते थे बहुसंख्या में। यही कारण रहा पंडित की उपाधि यहां प्रत्येक वर्ग को मिली यहां पंडित शब्द किसी भी जाति विशेष के लिए कभी भी रूढ नहीं रहा जैसा शेष भारत में मिलता है। कश्मीर के इतिहास लेखन के मामले में कश्मीरियत जैसे झुठे कपोल कल्पित शब्दों को घडकर कश्मीर के कैयट जैसे हजारों विद्वानों की परंपरा को उन्हीं की विद्या स्थली कश्मीर घाटी में दफन कर दिया गया। इसमें दोष हिंदुओं का भी कम नहीं है जिन्होंने अपनी प्राचीन वैदिक परंपरा साहित्य शास्त्रों से मुख मोड़ लिया अध्ययन अध्यापन की प्राचीन परंपरा से जुड़ते तब जाकर कैयट जैसी विभूतियों से उनका परिचय आखिर होता इसके अभाव में उनके लिए तो कश्मीर केवल इतना भर ही है भारत का सबसे खूबसूरत लेकिन आतंकवाद से ग्रसित राज्य जहां यदि शांति स्थापित हो जाए तो इससे बढ़िया हनीमून डेस्टिनेशन नहीं हो सकता कुछ के लिए यह सिनेमा सूट की बेहतरीन लोकेशन है। आखिर कभी कश्मीर के प्राचीन वैदिक हिंदू स्थलों जो गुरुकुल पीठ थे शारदा पीठ सरीखे उनके पुनः र्निर्माण शैव व बौद्ध मठो के जीर्णोद्धार व संस्कृत दर्शन विज्ञान गणित के अध्ययन अध्यापन केन्द्रों की पुनः स्थापना की बात कश्मीर के संबंध में क्यों नहीं की जाती ?।

इन प्रश्नों का जवाब तलाशे।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता, ग्रेटर नोएडा

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