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काल सर्प दोष प्रपंच

मेरे पास एक सुप्रसिद्ध धर्म गुरु मिलने आये और कुछ देर की वार्ता के बाद उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोले आपको काल सर्प योग लगा हुआ है, बहुत मुश्किल का समय आपके सामने आ चूका है। कुछ देर रूककर बोले कि घबराना नहीं इसका उपाय किसी दिन बता दूंगा, सब ठीक हो जाएगा। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की।
एक साल बाद वो जब फिर मिले तो मैंने कहा गुरु जी आपके अनुसार मैंने उपाय करवा लिया तो वे तुरंत बोले कि ये तो आपके चेहरे से ही मालूम हो रहा है की काल सर्प दोष खत्म हो चूका है।
ये काल सर्प दोष का प्रपंच ठीक उसी तरह है जैसे की आजकल ठग किसी भोले भाले व्यक्ति को डिजिटल अरेस्ट करते है क्योकि इस डर में जो फंस गया तो समझो कि वो लुट गया यानी काल सर्प दोष के नाम पर ज्योतिषियों के हाथ लूट गया।

काल सर्प दोष प्रपंच क्या है? ये समझते है।

पौराणिक मान्यता:-
ज्योतिषी कहते है की कालसर्प दोष का कुंडली में समय रहते पता लगाकर उसका उपाय करना चाहिए अन्यथा ये दोष व्यक्ति को 42 वर्ष तक परेशान करता है। जब कुंडली के सातों ग्रह पाप ग्रह राहु-केतु के मध्य आ जाएं तो कालसर्प दोष बनता है। ज्योतिष में काल सर्प दोष को बहुत ही हानिकारक योग माना गया है। जिस व्यक्ति की कुंडली में यह काल सर्प दोष बनता हैं उस व्यक्ति को जीवन में काफी संघर्ष करना पड़ता है। इससे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत प्रभावित होता है।
ज्योतिषियों के अनुसार​कालसर्प दोष के लक्षण –

जिस व्यक्ति की कुंडली में काल सर्प दोष होते हैं इस व्यक्ति को –

1) अक्सर सपने में मृत लोग दिखाई देते हैं। कुछ लोगों को तो यह भी दिखाई देता है कि कोई उनका गला दबा रहा हो।
2) उसे जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है और जब उसको जरुरत होती है तब उसे अकेलापन महसूस होता है।
3) पीड़ित व्यक्ति के कारोबार पर काफी नकारात्मक असर पड़ता है। और व्यापार में बार -बार हानि का सामना करना पड़ता है।
4) नींद में शरीर पर सांप को रेंगते देखना, सांप को खुद को डसते देखना।
5) बात-बात पर जीवनसाथी से वाद विवाद होना।
6) रात में बार बार आपकी नींद खुलती है तो यह भी काल सर्प दोष का ही लक्षण है।
7) मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान होता है।साथ ही सिर दर्द, त्वचारोग आदि भी कालसर्प दोष के लक्षण है।

कालसर्प दोष दूर करने के उपाय :- ज्योतिषी कहते है की इसके प्रभाव को खत्म करने के लिए रोजाना पूजा के समय महामृत्युंज मंत्र का जप करें। इसके अलावा, संजीवनी मंत्र के जप से भी कालसर्प दोष दूर होता है। काल सर्प दोष के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए गोमेद रत्न धारण कर सकते हैं। यह रत्न राहु ग्रह से जुड़ा हुआ है जो इस ग्रह से उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा को संतुलित करता है। यदि मंत्र जाप स्वयं ना कर सके तो किसी पंडित के द्वारा मंत्र जाप से भी ये दोष कट जाता है।

कालसर्प दोष दूर करने के लिए त्र्यंबकेश्वर और कालाहस्ती के मंदिर ही ऐसे स्थान हैं जहां यह विशेष पूजा की जाती है।

विश्लेषण :- भारतीय ज्‍योतिष में सर्प योग के बारे में कोई उल्‍लेख नहीं मिलता है।ये सैकड़ों करोड़ का धंधा है कि डराओ और कमाओ। दुनिया का हरेक इन्सान किसी ना किसी कारण से परेशान है और इसके लिए स्वयं को या अपने कर्मों को दोष देने के बजाय वह ईश्वर और उसकी सत्ता को दोष देने लगता है । पंडितो की शरण में जाता है और धूर्त ज्योतिषी काल सर्प दोष बताकर इसका आनंद लेते है और पैसा बनाते है। यानी 42 साल तक चलने वाला कष्ट कुछ दिनों में पंडित के मंत्र जाप से खत्म।
कालांतर में ज्‍योतिषियों ने धन एक्‍सटॉर्शन के लिए इस योग को पैदा किया और आज इसका सफल परिणाम सामने है।कालसर्प दोष मिथ्या केवल भ्रान्ति मात्र है जो कि आधुनिक ज्योतिषियों के द्वारा फैलाई जा रही है जो पूरी तरह काल्पनिक और आधारहीन है और इसकी कोई प्रमाणिकता नही है।

काल सर्प दोष शब्दवली का भावार्थ समझते है –

काल किसे कहते है-

काल तीन है – वर्तमान , भूतकाल और भविष्यकाल।

इसका मतलब है तीनो काल में हमारा जीवन कर्मों के कारण प्रभावित रहता है और इसमें सर्प की भांति सीधापन होने के बजाय चंचलता बनी रहती है।
मनुष्य असंतुष्ट बना रहता है,और सुख के लिए प्रयत्नशील रहता है। ये मानव के कर्मो का परिणाम ही है कि तीनों काल में कोई न कोई दोष चलता रहता है।

कर्म क्या है :- क्यों करना पड़ता है? और कर्म का क्या परिणाम है ?

कर्म और जीवात्मा का स्वाभाविक सम्बन्ध है अतः जीवात्मा बिना कर्म के नहीं रह सकता। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में ‘स्वतंत्र कर्त्ता’ सूत्र द्वारा कहा कि कर्त्ता कर्म करने में स्वतन्त्र है। कर्त्ता यदि चाहे तो कल्याण का कार्य अर्थात् परोपकार करें, दीन-दुखियों की सेवा करें अथवा अशिव अर्थात् अन्याय, अत्याचार, चोरी, बलात्कार न करें। परन्तु उसका फल उसके हाथ में नहीं है।

वेद में एक मन्त्र में स्पष्ट कहा है:-

न किल्विषमत्र नाधारो अस्ति न यन्मित्रै: समममान एति।
अनूनं निहितं पात्रं न एतत् पक्तारं पक्व: पुनराविशति।। -अथर्व १२/३/४८

अर्थ- “कर्मफल के विषय में कोई त्रुटि कभी नहीं होती और किसी की सिफारिश भी नहीं सुनी जाती, ऐसी बातें नहीं होती। यह भी नहीं है कि मित्रों के साथ सङ्गति करता हुआ जा सकता है। कर्मफल रूपी तराजू पूर्ण है बिना किसी घटा-बढ़ी के सुरक्षित रखी है। पकाने वाले को पकाया हुआ पदार्थ, कर्मफल के रूप में आ मिलता है, प्राप्त हो जाता है।”

उपर्युक्त मन्त्र में स्पष्ट किया गया है कि ईश्वरीय न्याय व्यवस्था में प्रत्येक को उसके कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता है। यदि धर्म के मार्ग पर चलकर कल्याणार्थ कर्म है तो इसका फल पुण्य तथा अधर्मपूर्ण कार्य है तो पाप फल प्राप्त होगा। जिसे हम दूसरे शब्दों में धर्म वाले कार्य का फल स्वर्ग (सुख) तथा अधर्म वाले कार्य का फल नरक (दुःख) भोगना पड़ेगा ऐसा कहते हैं। कहा भी है-

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।

प्रत्येक जीव को अपने किये हुए अच्छे एवं बुरे कर्मों के फल को भोगना पड़ता है।

गुणों के आधार पर जो कर्म किये जाते हैं उन्हें सात्विक, राजसिक, तामसिक कर्म कहते हैं। मनु महाराज ने सात्विक कर्मों की व्याख्या इस प्रकार की है-

वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रह :।
धर्मक्रियात्मचिंता च सात्विकं गुण लक्षणम्।। -मनु. १२/३१

अर्थ- जो वेदों का अभ्यास, धर्मानुष्ठान, ज्ञान की वृद्धि, पवित्रता की इच्छा, इन्द्रियों का निग्रह, धर्म के कार्य और आत्मा का चिंतन होता है यही सत्वगुण का लक्षण है। (स. प्र. नवम समु.)

जो कर्म अहंकार और फल की कामना से अति प्रपण के साथ किया जाता है वह रजोगुणी कहा जाता है। (गीता १८/२४)

लोभ, अत्यन्त आलस्य और निद्रा, धैर्य का अभाव, अत्याचार, नास्तिकता, एकात्मता का अभाव, जिस किसी से मांगना, प्रमोद अर्थात् मद्यपानादि और दुष्ट व्यसनों में फंसना यह तमोगुण के लक्षण हैं। – मनु. १२/३३

कुछ कर्मों का फल दृश्य होता है जो इस लोक और इस जन्म में प्राप्त होता है, और अन्य कर्मों का फल अदृश्य है जन्म-जन्मान्तर में मिलता है। जिसे जीव उपर्युक्त कर्मानुसार भोगता है।

फल की दृष्टि से कर्म का एक अन्य विभाजन तीन प्रकार से किया गया है- संचित, प्रारब्ध तथा क्रियमाण।

मनुष्य जो कर्म करता है उसे क्रियमाण कहते हैं।

जन्म जन्मान्तर के किये हुए तथा उन कर्मों का कोष जिनका फल नहीं प्राप्त हुआ है उन्हें संचित कर्म कहते हैं।

संचित कर्मों से जिन कर्मों का फल हम वर्तमान में भोग रहे हैं उसे ही प्रारब्ध कहते हैं इसी प्रारब्ध को लोग दूसरे शब्दों में ‘भाग्य’ कहते हैं। भाग्य ईश्वर की ओर से नहीं होता अपितु जीवों के कर्मों का कर्मफल ही भाग्य है।

सर्प योग की अलंकारिक भाषा – काल सर्प योग शब्दावली में अलंकारिक भाषा का प्रयोग किया है। विशेषकर जो व्यक्ति जटिल प्रकृति का, घुमावदार, विष सामान, डंक मारने वाला और किसी भी काल में उसकी प्रकृति ऐसी ही हो, उसको काल सर्प दोष वाला कह सकते हैं।

इसके अतिरिक्त जिसके कर्म दुर्भाग्य पूर्ण हो।

दुर्भाग्य किसे कहते हैं – दुर्भाग्य का अर्थ है कि जो लोग मेहनत, भाग-दौड़ से दूर भागते हैं,उनसे भाग्य दूर हो जाता है। इसे ही दुर्भाग्य कहते हैं। आलस्य-प्रमाद,सुस्ती और दूरदृष्टि की कमी के कारण जीवन परेशानियों से घिर जाता है।

दुर्भाग्य का कारण – पूर्व जन्म के कर्म, पाप-पश्चाताप, ‎माँ, ‎दुर्गा स्वरूप स्त्री का दिल दुखाना, ‎दुष्टता, दगाबाजी, दबंगता, दूसरों को ‎दर्द देना, दीनहीन और दया नहीं होना आदि।

राहु काल का मतलब है सूर्योदय और सूर्यास्त का समय । इसलिए राहु की दशा का मतलब है जो आलसी व्यक्ति सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोये रहते हैं वे अवश्य किसी ना किसी बीमारी से ग्रस्त होते हैं।

हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक अज्ञेय जी की कविता ‘सांप मुक्तक’ में कवि ने सांप को संबोधित करते हुए कहा है कि यह तो बताओ कि तुमने यह डसने की कला कहां से सीखी जबकि तुम वास्तव में नगर के निवासी नहीं हो. इस कविता में कवि ने नगर में रहने वाले सभ्य जनों को कृतघ्न होने के प्रति इशारा किया है.

आलंकारिक भाषा का मतलब होता है, शब्दों का ऐसा इस्तेमाल करना जिससे किसी जटिल अर्थ को स्पष्टता या विचारोत्तेजक तुलना के साथ व्यक्त किया जा सके. इसमें किसी चीज़ को सीधे बताए बिना उसे संदर्भित करने के लिए एक साधारण वाक्य का इस्तेमाल किया जाता है.

इसी आलोक में काल सर्प योग शब्दावली का भावार्थ लिया जाए।

अब आप समझ गए होंगे कि ज्योतिषी किस तरह से मूर्ख बनाते हैं।

– डॉ0 डी के गर्ग

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