_मौलाना आजाद किस बूते ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ के प्रतीक हैं?_

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  • शंकर शरण

वर्ष २००८ में भारत में मौलाना अबुल कलाम आजाद के जन्मदिन 11 नवंबर को ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस’ घोषित किया था। यह भारत के शैक्षिक-सांस्कृतिक पतन का ठोस प्रमाण है, कि शिक्षा के ऐसे क्षुद्र राजनीतिकरण पर भी कोई आवाज नहीं उठी। उलटे अधिकांश बौद्धिक हर साल इस दिन को मौलाना आजाद का गुणगान करना अपना कर्तव्य समझते हैं।

जबकि मौलाना आजाद के जीवन, कार्य और विचारों में कुछ नहीं जिस से उन्हें शिक्षा का आदर्श समझें। उन्होंने न कभी औपचारिक पढ़ाई की, न कोई शिक्षा संस्थान बनाया। उन की अपनी लिखी मामूली पुस्तिकाएं इस्लाम की व्याख्याएं मात्र हैं। उन की एक मात्र अंग्रेजी पुस्तक कुरान का अनुवाद है। अन्य पुस्तक ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ में भी उन के राजनीतिक जीवन के पूर्वार्ध की सारी बातें गायब हैं। केवल 1935 ई. से बाद के मामूली राजनीतिक विवरण है, जिसे भी उन के सहयोगी हुमायूँ कबीर ने लिखा था।

इस शैक्षिक शून्यता के अलावा, आजाद की राजनीतिक विरासत भी शोचनीय है। वह कट्टरपंथी, अलगावपरस्त, विशेषाधिकारी इस्लामी राजनीति आजाद ने ही शुरू की थी जो यहाँ मुख्य मुस्लिम राजनीति बनी। यहाँ वही पहले मुस्लिम नेता थे जिस ने इस्लाम को राजनीति का आधार बनाया। वरना यहाँ उलेमा राजनीति से दूर रहते थे। उसे खारिज कर आजाद ने इस्लाम को ही राजनीति का उसूल घोषित किया। एक बार यह कर देने के बाद मुस्लिमों के लिए देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्र जैसे मूल्य ठुकराना बिलकुल तय था।

सन् 1912 से ही अपने अखबार ‘अल हिलाल’ से आजाद ने वह अभियान चलाया। 1913 ई. में खालिस मजहबी पार्टी ‘हिजबुल्ला’ (अल्लाह की पार्टी) गठित की। इस का संगठन इस्लामी ईमामियत जैसा था। तदनुरूप, 1920 ई. में आजाद ने यहाँ के मुसलमानों को ‘हिजरत’ करने, यानी भारत छोड़ कर मुस्लिम देशों को प्रस्थान कर जाने का फतवा भी जारी किया। यह शरीयत को राजनीति का सिद्धांत मानने का स्वभाविक निष्कर्ष था। उतने ही स्वभाविक, जैसा सत्ता में गैर-मुस्लिम को भागीदारी न देने, उसे दूसरे दर्जे के नागरिक ‘जिम्मी’ मानना, आदि। इन संबंधी प्रश्न उठने पर आजाद हमेशा टाल देते थे।

कोई कहेगा कि आजाद ने वह सब अंग्रेजों से लड़ने के लिए किया। लेकिन उस लड़ाई में हिन्दुओं का स्थान कहाँ था? कहीं था भी या नहीं? आजाद के पूरे चिंतन, कार्य, संगठन, आदि में हिन्दुओं की कहीं कोई चर्चा नहीं आती। मानो उन का कोई अस्तित्व ही न रहा हो! इसीलिए, जब ‘अल हिलाल’ के पाठक इस्लामी दृष्टि से देश या कौमियत के सवाल उठाते, तो आजाद ने कभी उत्तर न दिया। ऐसे सवालों को ही भ्रामक कह कर, ‘बाद में’ समझाने का दिलासा दिया, जो वक्त कभी न आया।

लेकिन गर आजाद सफल होते, तब क्या नीतियाँ चलाते? मुसलमानों के लिए कुरान को राजनीति की टेक बना देने के बाद कैसा राजनीतिक तंत्र बनता? उस में हिन्दुओं का क्या हाल होता? कुरान में मौजूद उत्तर कठोर इस्लामी तानाशाही के सिवा कुछ नहीं दिखाते हैं। इसीलिए आजाद ऐसे सवाल टालते थे। चाहे यह उन की होशियारी या खालीपन हो, मगर इसी को बाद में जिन्ना ने भरा, और मौलाना आजाद कुछ न कर सके! क्योंकि मूल उसूल उन का ही था, जिस की तार्किक परिणति रोकना उन के बस में न था।

इसलिए प्रो. मुशीर-उल-हक जैसे विद्वानों ने माना है कि भारत-विभाजन का मूल आधार वह विचारधारा थी जिस ने इस्लाम को राजनीति के केंद्र में रखा। यह काम यहाँ सर्वप्रथम आजाद ने ही किया था! सो, ‘राष्ट्रवादी उलेमा’ एक कपटी अवधारणा है, जो बाद में कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने गढ़ कर फैलायी। दरअसल, राष्ट्रवाद और इस्लाम का छत्तीस का आँकड़ा है। प्रोफेट मुहम्मद ने इस्लाम की भौगोलिक सीमा बाँधने की सख्त मनाही की थी। शायर इकबाल ने ठीक ही लिखा कि ‘वतनपरस्ती भी बुतपरस्ती है, जिसे इस्लाम बर्दाश्त नहीं करता’। अतः कुरान को राजनीति का आधार बना लेने पर ‘वन्दे मातरम्’ या हिन्दुओं के साथ मुसलमानो का सह-अस्तित्व नहीं चल सकता।

इन कारनामों के अलावा, आजाद ने अपने बारे में भी गलत बातें फैलाई। अपने पूर्वजों के बड़े आलिम होने की बात खुद गलत प्रचारित की। आजाद की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री नेहरू को संसद में क्षमा माँगनी पड़ी कि ‘‘हम ने गलती से कह दिया था कि मरहूम आजाद मिस्त्र के अल-अजहर विश्वविद्यालय में पढ़े थे। पर वे वहाँ कभी नहीं पढ़े थे।’’ यह भूल इसलिए हुई, क्योंकि आजाद के करीबियों द्वारा लिखी जीवनियों में दशकों से यही सब लिखा हुआ था! इसे विवाद उठने पर भी आजाद ने कभी नहीं सुधारा!

मौलाना आजाद का जन्म जरूर सऊदी अरब में हुआ। उन के पिता ने अरब स्त्री से शादी की। किन्तु आजाद ने बात को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। अपनी माँ के बारे में भी दोहरी बातें कहीं। वे मक्का के शेख मुहम्मद जहीर वत्री की बेटी थीं, या भतीजी? इस पर आजाद ने अलग-अलग मौकों पर, अलग-अलग बात कही। फिर, पिता मौलाना खैरूद्दीन और परनाना मौलाना मुनव्वरुद्दीन के ‘अरबी के विश्व-प्रसिद्ध आलिम’ होने की बात आजाद ने (हुमायूँ कबीर को) खुद कही, जो गलत थी। अरबी कौन कहे, भारतीय उलेमा लिस्ट में भी आजाद के पिता या परनाना का नाम नहीं मिलता। न आजाद ने कभी उन दोनों में से किसी की लिखी किसी एक भी किताब का नाम तक बताया!

दरअसल, खुद मौलाना न होने, किन्तु इस की जरूरत महसूस करने के कारण आजाद ने अपनी ऐसी छवि बनाने का जतन किया कि उन की वंशावली बड़े अरबी आलिमों से जुड़ती है। जबकि, यहाँ उलेमा के आधिकारिक संगठन जमीयत-उलेमा ने कभी आजाद को मौलाना, ईमाम, आदि नहीं बनाया था!

ऐसी तमाम क्षुद्र कारसाजियों की तुलना भारत में स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, कविगुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर, श्रीअरविन्द, मदन मोहन मालवीय या क. मा. मुंशी के महान शैक्षिक, राष्ट्रीय अवदानों से करके देखें। तब झलकेगा कि भारत में ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ का प्रतीक मौलाना अबुल कलाम आजाद को बनाना मूढ़ता और हिन्दू-विरोधी ‘सेक्यूलर’ राजनीति की पराकाष्ठा है। कितना दुःखद! कि आज भारत के स्वघोषित राष्ट्रवादी संघ-भाजपा के राज में भी वही चल रहा है।

सचेत पाठक स्वयं परखें, और विचार करें – मौलाना आजाद के किस कारनामे के लिए उन्हें ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ का आदर्श माना जाता है?

जो भाई लोग अधीर होकर कहना चाहें कि मौलाना ने भारत-विभाजन का विरोध किया था, उन्हें पूरी बात कहनी चाहिए। मौलाना विभाजन के विरोधी इसलिए थे कि वे पूरा हिन्दुस्तान इस्लामी कब्जे में लाना चाहते थे! उन्हें लगा था कि विभाजन के बाद तो बचा भारत खालिस हिन्दू होगा, जिस में इस्लाम का नामो-निशान नहीं रहेगा। इसलिए उन्होंने विरोध किया था। उस का कारण इस्लामी कट्टरता थी, न कि भारत के प्रति प्रेम।

अब हमारे शिक्षा-संचालक या नीति-निर्धारक लोग बताएं कि वे मौलाना आजाद की किस बात को शिक्षा का आदर्श बताना चाहते हैं? यदि वे नहीं बताते, तो समझना लेना चाहिए कि हमारी सांस्कृतिक-शैक्षिक दुर्गति किस हद तक हो चुकी है!

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