ओ३म् “हैदराबाद में धर्म की आजादी के लिए आर्यसमाज का सत्याग्रह, 1939”

images (38)

============
हैदराबाद आजादी से पूर्व एक मुस्लिम रियासत बन गई थी। यहां हिन्दुओं को अपने धर्म का पालन व प्रचार करने पर नाना प्रकार के प्रतिबन्ध लगा दिये गये थे। जैसा पाकिस्तान में विगत 77 वर्षों में हुआ है, ऐसा ही कुछ यहां होता था। आर्यसमाज को भी यहां वैदिक धर्म का प्रचार करने और जुलुस निकालने व जलसा करने की स्वतन्त्रता नहीं थी। ऐसी विकट स्थिति में आर्यसमाज को हैदराबाद के निजाम के विरुद्ध सत्याग्रह का निर्णय लेना पड़ा था। सत्याग्रह पूर्णतः सफल रहा था। देश भर से सत्याग्रहियों के जत्थे इस सत्याग्रह में सम्मिलित हुए थे। अनेक सत्याग्रहियों की प्राणों की कुर्बानियां देने के बाद आर्यसमाज को सफलता प्राप्त हुई थी और यह सत्याग्रह ही आजादी के बाद इस रियासत के भारत में विलय का मुख्य आधार सिद्ध हुआ था जिसे देश के यशस्वी प्रथम उपप्रधान मंत्री तथा गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल जी ने स्वीकार किया था। इस लेख में हम आर्यसमाज के विद्वान नेता एवं संन्यासी स्वामी महात्मा आनन्द स्वामी जी के हैदराबाद आर्य सत्याग्रह से जुड़े हुए प्रसंगों पर प्रकाश डाल रहे हैं जिसका आधार महात्मा आनन्द स्वामी जी का श्री सुनील शर्मा जी द्वारा लिखित जीवन चरित्र है।

सन् 1939 में दुर्भाग्य से डिक्टेटरशिप का कीड़ा हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खां और उसके वजीरे-आजम अकबर हैदरी के दिमाग में भी घुस आया था। अंग्रेज सरकार के वे पहले से पिट्ठू थे और अंग्रेजों की उन्हें शह भी मिलती रही थी। इन्होंने एक-के-बाद-एक ऐसे फरमान जारी कर डाले कि ऋषि दयानन्द के सैनिक आर्य वीरों का खून ही खौल उठा। पहला फरमान यह था कि पहले आज्ञा लो और उसके बाद ही धर्म-प्रचार या जलसा-जुलूस हो। यहां तक कि आर्यसमाज-मन्दिरों में साप्ताहिक सत्संग भी रियासती सरकार की अनुमति के बाद ही हो सकेगा। स्पष्ट है कि मुस्लिम शासक इस फरमान के द्वारा आर्यों को आर्यभूमि पर ही गुलाम बनाने पर उतारू हो चला था। दूसरे फरमान का मतलब यह था कि घर हो या मन्दिर, ‘ओ३म्’ का नाम कहीं सुनाई या दिखाई न पड़े। ‘ओ३म्’ के ध्वज की जगह निजाम का ध्वज फहराने का आदेश दिया गया। इस फरमान में आर्य-संस्कृति को जड़ से उखाड़ फेंकने की चाल चली गई थी। तीसरे फरमान में यज्ञ-हवन पर भी पाबन्दी लगा दी गई। इस तरह आर्यजनों के मिल बैठने और प्रभु-उपासना के सारे रास्ते बन्द कर दिये गए।

यह सब आर्यवीरों के लिए डूब मरने की बात थी। ऐसी अपमान भरी जिन्दगी जीने को कौन तैयार होता? विरोध में रियासती सीमा के बाहर सभाएं और सम्मेलन होने लगे। निजाम ने समझा था कि मुड्ठीभर आर्यसमाजी दो-चार-दिनों में रो-पीटकर झाग की तरह बैठ जाएंगे। इक्का-दुक्का कोई सिर उठाएगा तो उसका सिर ही कुचल देंगे। सबके होश ठिकाने आ जाऐंगे। आर्यसमाज का जोर है पंजाब में, वहां से विरोध करने कौन आएगा? आएगा भी तो कितने दिन विरोध करेगा? आ ही जाएगा तो जेल में पत्थर तोड़ने में ही दो-चार साल काटके लौट जाएगा। वास्तव में इन मुस्लिम शासकों को ज्ञान ही नहीं था कि आर्यों में सहनशीलता यदि मुस्लिमों से दुगुनी है तो प्रभु से प्यार चैगुना है। कुछ दिनों में ही निजाम और उसके वजीरे-आजम को मालूम हो गया कि वे भिड़ों के छत्ते में हाथ डाल बैठे थे।

सन् 1938 के दिसम्बर की अन्तिम तारीखों में आर्यसमाज ने हैदराबाद में सत्याग्रह की घोषणा कर दी। पांच-सात दिनों बाद रियासत के मुख्य-मन्त्री को अपनी मांगे पेश करते हुए आर्यसमाज ने स्पष्ट लिख दिया कि निजामशाही धार्मिक कामों में हस्तक्षेप न करे और आर्य-धर्मोपासना पर लगाई गई सभी पाबन्दियां हटा ले। एक सप्ताह की चेतावनी देकर, महात्मा नारायण स्वामी जी के नेतृत्व में गुरुकुल के विद्यार्थियों ने रियासत में प्रवेश किया और ‘ओ३म्’ का नाद गुंजाते हुए गिरफ्तारियां दीं। उन्हें हिरासत में लेकर रियासत से बाहर शोलापुर में छोड़ दिया गया। सत्याग्रहियों ने दूसरी टोली को नेतृत्व सौंपकर, दोबारा जाकर गिरिफ्तारियां दे दीं। इस बार उन्हें एक वर्ष के लिए कठोर कारावास का दण्ड दिया गया। दूसरी टोली श्री चांदकिरण शारदा के नेतृत्व में गई तो सत्साग्रहियों को तेरह महीने सक्षम कारावास के लिए भेज दिया गया।

तीसरी टोली के नेता बने खुशहालचन्द जी ‘खुर्सन्द’। एक दूरदर्शी पत्रकार होने के नाते उन्होंने पहले धुआंधार प्रचार किया। नगर-नगर और गांव-गांव जाकर सारी स्थिति स्पष्ट की। बम्बई जाकर समाचार पत्रों के सम्पादकों से मिले। प्रेस ने इसे धार्मिक हस्तक्षेप मानते हुए हैदराबादी निजाम के विरुद्ध लेख और समाचार प्रकाशित किये। अब यह मामला आर्यसमाज तक सीमित न रहकर समूचे देश की आवाज बन गया। निजाम-सरकार ने बुद्धिजीवियों को खरीदकर ऐसे लेख और कविताएं छपवाई जिनसे यह प्रतीत हो कि मामला ‘हिन्दू-मुस्लिम-विवाद’ का है।

खुशहालचन्द जी ने प्रेस के माध्यम से स्पष्ट प्रचारित करा दिया कि आर्यों को मुस्लिम भाइयों के तौर-तरीकों से कोई विरोध नहीं है और निजाम-सरकार अपनी काली करतूतों पर पर्दा डालने के लिए मिथ्या बहाने तराश रही है। इधर से दाल न गली तो निजाम-सरकार ने एक और झूठ प्रचारित कर दिया कि सनातनधर्मी जनता पूरी तरह निजाम के पक्ष का समर्थन करती है। खुशहालचन्द जी सीधे ‘बद्रीनाथ मठ’ के जगद्गुरु शंकराचार्य जी के पास पहुंच गए। जगद्गुरु ने भी स्पष्ट घोषणा कर दी–‘‘इस धर्मयुद्ध में सनातनधर्मी जगत् ‘आर्यसमाज’ के साथ है।” फिर क्या था, सिक्खों ने भी आर्यबन्धुओं के साथ सत्याग्रह के मैदान में उतरने का शंख बजा दिया। ये समाचार विदेशों तक लपक लिए गए। मलय, बर्मा, अफ्रीका और थाईलैंड आदि देशों से भी सत्याग्रहियों के जत्थे आने की तैयारी करने लगे। निजाम और उसके वजीरे-आजम के हाथ-पांव फूल गए। उन्हें सपने में भी यह आशा नहीं थी कि मुट्ठीभर आर्यसमाजियों के लिए बाहर के देश भी हल्ला बोल देंगे। आन्दोलन की कमर तोड़ने के लिए निजाम ने एक नई चाल चली। उन दिनों भारत में एक ही समाचार-एजेंसी थी ‘एसोसिएटेड प्रेस’। इस एजेंसी का मुंह रुपयों से बन्द करके यह मिथ्या समाचार प्रचारित करा दिया कि ‘सरकार और सत्याग्रहियों में समझौता हो गया है और आर्य-सत्याग्रह बन्द हो चुका है।’

खुशहालचन्द जी ने तुरन्त समाचार पत्रों द्वारा खण्डन करा दिया कि ‘सत्याग्रह जारी है और इसे बन्द कराने का अधिकार केवल आर्यसमाज की सार्वदेशिक सभा को है।’ निजाम-सरकार डाल-डाल थी तो खुशहालचन्द जी पात-पात थे। निजाम के पास दण्ड-व्यवस्था थी और सत्याग्रही निहत्थे थे, फिर भी, खुशहालचन्द जी के भाषणों और प्रेस-वक्तव्यों ने निजामशाही को जनता के कटघरे में खड़ा कर दिया। रियासती सरकार द्वारा हो रहे दमन पर सब जगह थू-थू हो रही थी। पूरे देश में हड़कम्प-सा मच गया। यह सत्याग्रह केवल आर्यसमाज तक सीमित न रहकर मनुष्यमात्र का धर्म-युद्ध बन गया। जो कांगे्रसी आर्य-विचारधारा के थे, वे कुछ समय के लिए गांधी जी को छोड़कर प्रभु-नाम पर लगे बन्धनों को तोड़ फेंकने के लिए हैदराबाद की ओर कूच करने लगे। निजामशाही अब भी अपनी हठधर्मी पर अडिग थी। खुशहालचन्द जी को उनके साथियों-समेत तेरह-तेरह महीने के लिए कड़ी कैद का दण्ड देकर जेल में ठूंस दिया। उन्हें पत्थर तोड़ने का काम दिया गया तो खुशहालचन्द जी ने ठहाका लगाकर यह डयूटी सिर-आंखों पर स्वीकार कर ली और बोले-‘‘अरे भाई, जुल्मों-सितम के पत्थर तोड़ते-तोड़ते ही तो हम जवान हुए हैं। इसका तो हमें बचपन से अभ्यास है।”

निजामशाही ने जेल में और जेल से बाहर सत्याग्रहियों पर मनमाने अत्याचार किये, परन्तु सत्याग्रहियों के कारवां निरन्तर ‘ओ३म्’ का नाद गुंजाते रहे। सन् 1939 के जुलाई मास तक सत्याग्रहियों के जत्थे गिरफ्तारियां देते रहे। जेलें भर गईं, मगर सत्याग्रहियों का तांता न टूटा। निजामशाही की अब दुनियाभर में निन्दा होने लगी। आर्यसमाज के हाथों नाकों चने चबाकर निजाम की नीदें हराम हो गई। अगस्त, 1939 में उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ी। ‘ओ३म्’ का ध्वज लगाने, यज्ञ-हवन करने और सत्संग पर लगाई गई सारी पाबन्दियां हटा ली गईं। इस प्रकार आर्यसमाज के साथ समझौता करके निजाम-सरकार ने अपना पिण्ड छुड़ाया।

सत्याग्रह में महात्मा नारायण स्वामी जी के साथ जेल की सजा खुशहालचन्द जी के लिए महान् वरदान बन गई। नारायण स्वामी जी अपने युग के प्रकाण्ड विद्वान्, वेदों के मर्मज्ञ, उच्च कोटि के संन्यासी थे और अध्यात्म-विद्या में गहरी पैठ रखते थे। खुशहालचन्द जी को उनके संसर्ग में परम-शान्ति का आभास होता था। आत्म-दर्शन की जो उत्कट अभिलाषा उनके मन में किशोरावस्था में थी, नारायण स्वामी जी के निकट रहकर वह और अधिक भड़क उठी। खुशहालचन्द जी ने उनसे संन्यास की दीक्षा देने का भी अनुरोध किया, परन्तु नारायण स्वामी जी ने कहा ‘‘अभी प्रतीक्षा कीजिए। संन्यास का अभ्यास अभी घर में ही कीजिए और इसी को संन्यास की तैयारी समझिये।”

इस प्रकार लगभग पिच्चासी वर्ष पूर्व हैदराबाद रियासत में आर्य हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों की रक्षा आर्यसमाज द्वारा की गई थी। इस सत्याग्रह का नेतृत्व आर्यसमाज के दो महान् विद्वान नेताओं महात्मा नारायण स्वामी जी तथा स्वामी स्वतन्त्रतानन्द सरस्वती जी ने किया था। आज आर्यसमाज में इस कोटि के नेता नहीं रहे। वह युग आर्यसमाज का स्वर्णिम युग था। ईश्वर करे उस युग की पुनरावृत्ति हो। आर्यसमाज के अनुयायी उस युग को स्मरण करते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन में एक बार वह स्वर्णिम समय पुनः आये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betvole giriş
betvole giriş
fenomenbet
betvole giriş
betkanyon
betvole giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betvole giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
timebet giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
vaycasino giriş
kulisbet giriş
mariobet giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
grandbetting giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
grandpashabet giriş
betvole giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
damabet
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betvole giriş
betpark giriş
betvole giriş
betpark giriş
celtabet giriş
betpipo giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
superbahis giriş
perabet giriş
perabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
mariobet giriş
betvole giriş
mariobet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
mariobet giriş
betpas giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
dedebet
betkanyon
radissonbet
casinofast
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
norabahis giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş