देवता किसे कहते हैं और देवता कितने प्रकार के होते हैं ?

देवता किसे कहते हैं और देवता कितने प्रकार के होते हैं ?

प्र०- देवता किसे कहते है?
उ०-देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा द्योतनाद्वा , द्युस्थानो भवतीति वा । दान देने वाले देव कहाते हैं दीपन अर्थात विद्या रुपी प्रकाश करने वाले देव कहाते हैं । द्योतन अर्थात सत्योपदेश करने वाले देव कहाते हैं ।विद्वान भी विद्या आदि का दान करने से देव कहाते हैं विद्वानसो ही देवा । सब मूर्ति मान पदार्थों का प्रकाश करने से सूर्य आदि को भी देवता कहते हैं । देव देवी देवता- इन सबका एक ही अर्थ है । इन सब का देव होने से ईशवर महादेव कहलाता है।
(कोई स्वयं का नाम महादेव रख ले तो वे ईशवर नही बन सकता )

प्र०- देवता कितने प्रकार के होते है?
उ०- देवता दो प्रकार के होते हैं-
जड देवता और चेतन देवता ।

प्र०- चेतन देवता कौन से है?
उ०- माता, पिता, गुरु, आचार्य, अतिथि, पति पत्नी ये सब चेतन देवता है।

प्र०- क्या चेतन देवों की पूजा करनी चाहिये और करे तो कैसे ?
उ०- हां करनी चाहिये क्योंकि ये हमारा पालन पौषण करते हैं, हमारी रक्षा करते हैं, हमे ज्ञान देकर मनुष्य बनाते हैं । और पूजा का अर्थ है सत्कार करना, इन सबका सम्मान करना इनकी आज्ञा का पालन करना, इनकी आवश्यकता पूरी करना यही इनकी पूजा है ।और जो ऐसा नहीं करता उसे कृत्घ्नता का पाप लगता है।

प्र०- क्या यदि माता पिता उल्टी गलत शिक्षा दे तो उसे भी मानना चाहिये ?
उ०- नहीं, यदि माता पिता दुष्ट हैं तो उनकी गलत बात बिल्कुल न माने, यदि वे चोरी आदि या मद्यपान आदि बुरी सलाह दे तो उसको न माने लेकिन सेवा फिर भी करे।

प्र०- पौराणिक लोग कहते हैं कि तैंतीस करोड़ देवता हैं, क्या यह सच है ?
उ०- नहीं , कोटि शब्द के दो अर्थ हैं, पहला कोटि का अर्थ करोड़ और दूसरा कोटि का अर्थ प्रकार । जड देवता तैंतीस प्रकार के है।

प्र०- जड़ देवता कौन से है?
उ०- आठ वसु- अग्नि पृथ्वी वायु अन्तरिक्ष आदित्य द्यौ चन्द्रमा और नक्षत्र, इन्हें वसु इसलिए कहते हैं कि सब पदार्थ इन्हीं में वसते हैं । ग्यारह रुद्र – प्राण अपान व्यान उदान समान नाग कुर्म कृकल देवदत्त धनञ्जय और जीवात्मा क्योंकि जब ये शरीर से निकलते हैं तो मरण होने से सब सम्बन्धी रोते हैं इसलिए इन्हें रुद्र कहते हैं । आदित्य बारह महिनों को कहते हैं क्योंकि सब जगत के पदार्थों का ये आदान करते हैं और सबकी आयु को ग्रहण करते हैं । इन्द्र बिजली को कहते हैं क्योंकि सब ऐश्वर्य की विद्या का आधार वही है। यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहते हैं क्योंकि सब वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है, पशुओं को भी यज्ञ कहते है क्योंकि उनसे भी प्रजा का पालन होता है। ये तैंतीस देव कहाते हैं । इनके अतिरिक्त तीन देव स्थान नाम जन्म को कहते हैं और अन्न व प्राण को भी देव कहते हैं ।

प्र०- क्या इन जड देवो की पूजा करनी चाहिये और कैसे?
उ०- जी हां, ईश्वर द्वारा दिये जड पदार्थों का अपने व दूसरे के सुख के लिए सदुपयोग करना ही जड पूजा है। ईश्वर द्वारा बनाये पदार्थों की रक्षा करना उन्हें गन्दा न करना ही पूजा है क्योंकि ये अमूल्य है ।

प्र०- क्या ये सारे देव उपास्य है?
उ०- नहीं । ईश्वर सब देवो का देव होने से महादेव कहाता है और केवल वही उपास्य है दूसरा नहीं।

प्र०- वेद मन्त्रों के साथ देवता लिखा होता है क्यों ?
उ०- जिस मन्त्र का जो विषय जिस ऋषि ने समाधि अवस्था मे बैठकर साक्षात्कार किया उस मन्त्र का वही देवता व ऋषि होता है।

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