बिखरे मोती-भाग 22

बिखरे मोती

किंतु साधु के संग में, कर देवों सा व्यवहारvijender-singh-arya1

मन्यु पीने से अभिप्राय है-क्रोध को पीना, क्रोध का शमन करना, शांति और क्षमा भाव को प्राप्त होना। यदि कोई व्यक्ति क्रोध के वशीभूत रहता है तो उसका शरीर मानसिक और शारीरिक रोगों का घर बन जाता है।

धनिक होय रोगी रहै,
वो नर मरे समान।
धन से भी संसार में,
सेहत होय महान ।। 352।।

लक्ष्मी आश्रित दुष्ट के,
तो करती है नाश।
देव पुरूष के पास हो,
तो करती है विकास ।। 353।।

मायाचारी के साथ में,
कर मायावी व्यवहार।
किंतु साधु के संग में,
कर देवों सा व्यवहार।। 354।।

दुष्टों की संगति सदा,
खो देती सम्मान।
निगलै सारे गुणों को,
व्यक्ति का अभिमान ।। 355।।

मित्रद्रोह और क्रोध हो,
त्याग का हो अभाव।
ज्यादा दिन जीते नहीं,
जिनका ऐसा स्वभाव ।। 356।।
यज्ञशेष नीतिज्ञ हो,
और हो ऋजु स्वभाव।
अहिंसक सत्यवादी हो,
मिले स्वर्ग की छांव ।। 357।।

यज्ञशेष से अभिप्राय है-अपने आश्रितों को खिलाकर खाने वाला ऋजु स्वभाव से अभिप्राय है-सरल स्वभाव अर्थात कुटिलता रहित स्वभाव, स्वर्ग की छांव से अभिप्राय है-स्वर्ग में स्थान मिलता है।

सुगमता से प्राप्त हों,
हर जगह चाटुकार।
हितभाषी और मितभाषी,
दुर्लभ हों नर नार ।। 358।।

छोड़ देय नर एक को,
जो हित हो परिवार।
गति पावै यदि आत्मा,
तो छोड़ देय संसार ।। 359।।

रक्षा कर धन नार की,
जो चाहवै कल्याण।
डूब न इनके मोह में,
कर अपना उत्थान ।। 360।।

अपना उत्थान से अभिप्राय है-आत्मोत्थान
निन्दित कपटी दुष्ट हो,
पशुता से भरपूर।
घर में न देना आश्रय,
रहो दूर ही दूर ।। 361।।

मूरख बैरी जंगली,
और होवै जो क्रूर।
इनसे कभी न मांगना,
रक्षित रखना नूर।। 362।।

रक्षित रखना नूर से अभिप्राय-अपनी लाज को बचाकर रखना।

प्रमादी और झूठिया,
निशिदिन पीवै भंग।
दम्भी और पाखण्डी का,
कभी न करना संग ।। 363।।
क्रमश:

 

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