भारत की 18 लोकसभाओं के चुनाव और उनका संक्षिप्त इतिहास, भाग 10 , 10वीं लोकसभा – 1991 – 1996

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विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के पतन के पश्चात जब चंद्रशेखर को कांग्रेस ने अपना मोहरा बनाकर देश का प्रधानमंत्री बनाया तो आरंभ से ही यह स्पष्ट हो गया था कि इस समय नई लोकसभा के चुनाव बहुत निकट हैं । कांग्रेस 1980 के इतिहास को दोहराने की तैयारी कर रही थी, जब इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई की सरकार को गिराकर चौधरी चरण सिंह को अपना मोहरा बना देश का प्रधानमंत्री बनवाया था और उसके पश्चात चौधरी चरण सिंह से समर्थन वापस लेकर देश में मध्यावधि चुनाव करा दिए थे। कांग्रेस को लग रहा था कि जो कुछ अबसे लगभग 10 वर्ष पहले हुआ था ,जनता वही अब दोहरा देगी और केंद्र में उसे एक बार फिर सरकार बनाने का अवसर प्राप्त होगा। राजनीति अवसरों को समझने और अवसरों के अनुसार चलने का एक मनोरंजक खेल है। इसमें रहकर हर खिलाड़ी अवसरों की खोज करता रहता है। वैसे संसार के समर क्षेत्र में भी हम देखें तो वहां भी हर व्यक्ति अपने विकास के अवसर खोजता रहता है । जब तक यह प्रतियोगिता सात्विक भाव में रहती है, तब तक इसमें कोई बुराई नहीं है। अवसर खोजना चाहिए और उनमें स्वार्थ ना हो, दूसरे को गिराकर आगे बढ़ने की ललक ना हो, इतने तक अवसरों की खोज करना सात्विक भाव में रहकर अपने विकास की संभावनाओं को तलाशना होता है।
राजनीति में जब तक ऐसा चलता है, तब तक वह भी अवसरों को खोजने की अनुमति देती रहती है। पर जब राजनीति हर अवसर में स्वार्थ तलाशने लगती है तो वह दूषित हो जाती है। ऐसी राजनीति को अवसरवादी राजनीति कहकर पुकारा जाता है। अवसरवादी राजनीति को अच्छा नहीं समझा जाता। हमारा भी यही मानना है कि अवसरवादी राजनीति तो नहीं होनी चाहिए पर अवसर को पहचानने की कला प्रत्येक राजनीतिक व्यक्ति के भीतर अवश्य होनी चाहिए। पता नहीं कब कौन सा अवसर हमारे लिए सौभाग्यशाली हो जाए ? यह मानकर राजनीति को अपने अनुकूल मोड़ने का प्रयास हर राजनीतिक व्यक्ति करता है। संसार का सामान्य व्यक्ति भी परिस्थितियों और अवसरों को अपने अनुकूल करके चलने का संघर्ष करता हुआ देखा जाता है। तब राजनीति इससे अछूती नहीं रह सकती। वैसे भी राजनीति में कौन सा अवसर हमारे लिए कितना सौभाग्यशाली बन जाए ? यह कभी नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि हर व्यक्ति राजनीति में अवसरों को अपने अनुकूल कर ऊंची छलांग लगाने का प्रयास करता रहता है।

राजीव गांधी की चाल और चंद्रशेखर

राजीव गांधी ने भी एक बार फिर ऊंची छलांग लगाने का मन बनाया। उन्होंने अपनी मां इंदिरा गांधी वाली चाल चली और चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाकर शीघ्र ही उनसे समर्थन वापस ले लिया। चंद्रशेखर ने 6 मार्च 1991 को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इस प्रकार उनकी सरकार का भी पतन हो गया। चंद्रशेखर के बारे में यह बात माननी पड़ेगी कि उनके भीतर स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा था। अपनी पार्टी के अकेले सांसद होकर भी वह कभी किसी प्रकार की हीन भावना से ग्रसित नहीं रहे। उन्होंने अकेला रहकर भी बड़े-बड़े नेताओं को पटकनी देने में संकोच नहीं किया। संसद में उनके भाषण बहुत ही उत्तम हुआ करते थे। वह संसद में बोलते हुए अच्छे-अच्छे नेताओं की बोलती बंद कर दिया करते थे।
विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को गिराकर अपनी पार्टी के अकेले सांसद होकर भी वह प्रधानमंत्री पद को प्राप्त करने में सफल हुए। यह उनके स्वाभिमानी और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व के कारण ही संभव हो पाया था। वे देश के नौवें प्रधानमंत्री बने। 1977 से 1988 तक वे जनता पार्टी के अध्यक्ष भी रहे थे । 10 नवंबर 1991 को चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की थी। चौधरी चरण सिंह देश के अब तक के पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने संसद का एक दिन के लिए भी सामना नहीं किया था। उसके विपरीत चंद्रशेखर संसद का सामना करने में सफल हुए और उन्होंने संसद में अपना बहुमत सिद्ध कर दिया। इसके उपरान्त भी उनकी सरकार अधिक देर तक चल नहीं पाई। इस प्रकार चौधरी चरण सिंह के बाद वह दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्हें अपने पद पर सबसे कम समय तक रहने का अवसर प्राप्त हुआ। उनके अवसर को कांग्रेस के नेता राजीव गांधी ने लपकने का प्रयास किया। यह अलग बात है कि नियति उन्हें कहीं और ले जा रही थी। जिसके चलते वह अवसर का लाभ नहीं उठा पाए । इससे पहले कि अवसर उनके पास आता , दर्दनाक मौत उनके पास आ गई। जिस अवसर को वह अपने लिए भुनाने की तैयारी कर रहे थे, उसका लाभ पी0वी0 नरसिम्हाराव को प्राप्त हुआ। सचमुच राजनीति कभी-कभी अपने खिलाड़ियों के साथ बड़ा निर्दयता का व्यवहार करती देखी जाती है। कभी-कभी यह इतनी उदार हो जाती है कि किसी को छप्पर फाड़कर दे देती है।
इस समय हमने राजनीति के दोनों स्वरूप एक साथ देखे। वह जहां राजीव गांधी के प्रति बड़ी कठोर हो गई थी , वहीं उसने एक अप्रत्याशित अवसर पी0वी0 नरसिम्हाराव के लिए उपलब्ध कराकर उन्हें ‘छप्पर फाड़ कर’ दे दिया था।
चंद्रशेखर खड़े-खड़े देखते रह गए। उनका छप्पर भी उड़ गया और जो हाथ में आया हुआ था उसे भी नियति ने छीन लिया।
शायद इसी को कर्म – लेख कहते हैं।
जिस समय 1991 में दसवीं लोकसभा के चुनाव हुए उस समय की स्थिति कुछ इस प्रकार थी कि राजीव गांधी उस समय अपने कर्मों का भुगतान पा रहे थे और पी0वी0 नरसिम्हा राव उस समय अपने कर्मों के कारण स्वयं अपनी अपेक्षाओं से भी बड़ा एक ‘पुरस्कार’ प्राप्त करने जा रहे थे। जबकि चंद्रशेखर अपने कर्मों के कारण आए हुए पुरस्कार को मंचासीन लोगों को ही देकर मंच से उतर रहे थे। कर्मों के भुगतान का खेल सचमुच बड़ा अजीब है।

चंद्रशेखर पर जासूसी का आरोप

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार को गिराने के लिए कांग्रेस के नेता राजीव गांधी ने उस समय उन पर आरोप लगाया था कि वह प्रधानमंत्री रहते हुए उनकी जासूसी करवा रहे हैं। जबकि सच यह था कि कांग्रेस अपने दिए गए समर्थन का 'मूल्य' प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से वसूल करना चाहती थी। जिसे एक सीमा तक तो वह देने के लिए तैयार थे ,पर जब सीमा से बाहर बात जाने लगी तो उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया।  इस पर कांग्रेस ने जासूसी का बहाना बनाया और उनकी सरकार गिराकर नए चुनाव की भूमिका तैयार कर दी।

कांग्रेस की स्थिति हुई मजबूत

  जब 1991 के लोकसभा के चुनावों के लिए कांग्रेस के नेता राजीव गांधी चुनाव प्रचार पर निकले हुए थे तो 21 मई 1991 को लिट्टे के उग्रवादियों ने उनकी हत्या कर दी। इस चुनाव में कांग्रेस ने अपनी पिछली सीटों में 37 सीटों की वृद्धि करते हुए 232( बाद में कुछ अन्य सीटों को जीतने पर यह संख्या 252 तक पहुंच गई थी) सीटें जीती थीं। कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत तो नहीं था पर वह सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई। स्पष्ट बहुमत के लिए उसे अभी कुछ अन्य दलों के समर्थन की आवश्यकता थी। पी0वी0 नरसिम्हाराव बहुत ही गंभीर प्रकृति के राजनेता थे। उन्हें किसी प्रकार के दिखावे की कभी आवश्यकता नहीं रही थी। अपने कार्य के प्रति निष्ठा बनाकर चुपचाप काम करते रहना उनकी प्रवृत्ति थी। उन्होंने नई चुनौती को स्वीकार किया। उनकी कार्यशैली बहुत ही उत्तम थी।                        तत्कालीन परिस्थितियों में कांग्रेस ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त माना और कई प्रकार के कयासों के बीच उन्हें सरकार बनाने के लिए कांग्रेस ने अपना नेता चुना। राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी ने दिल पर कठोर पत्थर रखकर पी0वी0 नरसिम्हाराव को सरकार बनाने दिया। बाद की परिस्थितियों ने स्पष्ट किया कि सोनिया गांधी कभी नहीं चाहती थीं कि पी0वी0 नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री बनें। सोनिया और उनके परिवार ने पी0वी0 नरसिम्हाराव के प्रति पहले दिन से अपनी उपेक्षा  दिखाई और जितनी देर भी वह देश के प्रधानमंत्री रहे उनके कार्यों में अड़ंगा डालने का हरसंभव प्रयास किया।

नरसिम्हाराव की कार्यशैली और नेहरू गांधी परिवार

पी0वी0 नरसिम्हाराव ने अपने शासनकाल में देश की गिरती हुई आर्थिक शाख को सुधारने का बहुत ही उत्तम प्रयास किया। चंद्रशेखर के शासनकाल में देश को सोना गिरवी रखकर अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मजबूर होना पड़ा था। यह पी0वी0 नरसिम्हाराव का दीर्घकालिक राजनीतिक अनुभव और कार्य शैली का ही परिणाम था कि देश ने आर्थिक क्षेत्र में नई रफ्तार पकड़ी। उन्होंने बड़े मनोयोग से सरकार चलाने का गंभीर और सार्थक प्रयास किया। जितनी देर का भी उन्हें अवसर मिला उसका सदुपयोग करने में उन्होंने कमी नहीं छोड़ी।
प्रधानमंत्री रहते हुए पी0वी0 नरसिम्हाराव अधिकतर अस्वस्थ रहते थे। पर इसके उपरांत भी उन्होंने अपनी बीमारी को अपने काम पर हावी नहीं होने दिया। काम करते रहने में उनका अटल विश्वास था। काम करने के प्रति उनकी लगनशीलता को देखकर ही बाद में देश के राष्ट्रपति बने ए0पी0जे0 अबुल कलाम ने उन्हें ‘देशभक्त राजनेता’ के रूप में उल्लेखित किया। वास्तव में गांधी नेहरू परिवार से बाहर के व्यक्ति को नौकरशाही भी काम करने में कई प्रकार के रोड़े अटकाने के लिए जानी जाती रही है। इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि पी0वी0 नरसिम्हाराव को प्रधानमंत्री के रूप में काम करने में कितने प्रकार की अड़चनों का सामना करना पड़ा होगा ?
उन दिनों कांग्रेस संगठन उनके साथ नहीं था, कांग्रेस के अधिकांश सांसद भी उनके साथ न होकर सोनिया गांधी के ‘राजभवन’ के चक्कर लगाते देखे जाया करते थे। इस सबके उपरांत भी वह शांत भाव से सरकार चलाते रहे।
पी0वी0 नरसिम्हाराव 1980 से 1984 तक देश के विदेश मंत्री भी रहे थे । उन्होंने जिस मंत्रालय को भी संभाला उसी में अपनी विशेष पहचान छोड़ी। जब वह देश के प्रधानमंत्री बने तो आर्थिक सुधारों के क्षेत्र में उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया। जिसके चलते उन्हें स्वतंत्र भारत में ‘आर्थिक सुधारो का जनक’ कहा जाता है । उन्होंने अपनी सरकार में उस समय के जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री बनाया । उन्हीं के आदेश से डॉ मनमोहन सिंह ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष नीति आरंभ की। इस नीति के परिणामस्वरुप बैंकों का भ्रष्टाचार नियंत्रित करने में आशातीत सफलता प्राप्त हुई। उन्होंने देश का प्रधानमंत्री रहते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को उदार बनाया । उनके बारे में विशेषज्ञों की मान्यता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ उन्होंने फिर से एकीकृत किया।

नरसिम्हाराव और राम मंदिर आंदोलन

  पी0वी0 नरसिम्हाराव जब देश का नेतृत्व कर रहे थे उसी समय राम मंदिर आंदोलन भी अपने चरम पर था। भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ अन्य  हिंदूवादी संगठन राम मंदिर आंदोलन को लेकर पूरे देश में राजनीति को गरमा रहे थे। नरसिम्हाराव अपनी राजनीतिक कार्यशैली के अनुसार मंदिर आंदोलन के प्रति पूर्णतया मौन रहे। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस के दिन वह बहुत अधिक उग्र नहीं हुए। जिसे लेकर उनके विरोधियों ने यह दुष्प्रचार भी किया कि उन्होंने जानबूझकर बाबरी मस्जिद को 'शहीद' होने दिया। यद्यपि पी0वी0 नरसिम्हाराव मंदिर मस्जिद प्रकरण के प्रति अधिक रुचि नहीं दिखा रहे थे। वह प्रधानमंत्री रहते हुए अपने कार्य पर ध्यान दे रहे थे। इसके साथ ही साथ भाजपा को अपनी राजनीति भी करने दे रहे थे। वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से यह आश्वासन भी प्राप्त कर चुके थे कि बाबरी को कोई क्षति नहीं पहुंचाई जाएगी। इसके उपरांत भी जो कुछ हुआ उस पर उन्हें दु:ख हुआ। यह अलग बात है कि उन्होंने अन्य कांग्रेसियों की भांति और विशेष रूप से नेहरू गांधी परिवार के सदस्यों की भांति बाबरी विध्वंस पर छाती पीटने का काम नहीं किया।
  कहा जाता है कि पी0वी0 नरसिम्हा राव के शासनकाल में ही देश के जाने-माने वैज्ञानिक ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम ने परमाणु परीक्षण पर ध्यान केंद्रित किया। देशभक्त प्रधानमंत्री के रूप में नरसिम्हा राव ने इस कार्य को भी शांत मन से आगे बढ़ने दिया। यद्यपि परमाणु परीक्षण उनके शासनकाल में नहीं हुआ और यह आगे जाकर अटल जी के शासनकाल में संपन्न हो पाया। 

नरसिम्हाराव और कश्मीर समस्या

पी0वी0 नरसिम्हाराव ने अपने शासनकाल में लक्ष्य बनाकर कार्य किया। शिक्षा नीति में भी उन्होंने सुधार किया। राष्ट्रीय स्तर पर नवोदय विद्यालयों के रूप में आवासीय विद्यालयों की स्थापना में भी उनका चिंतन और दृष्टिकोण देश और देशवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा। इस सबके उपरांत भी वह कश्मीर जैसी समस्या की ओर ध्यान नहीं दे पाए । उस समस्या की ओर से उन्होंने पूरी तरह आंखें मूंद ली थीं। उन्होंने यह मान लिया था कि इस समस्या को आने वाले प्रधानमंत्री के लिए छोड़ दिया जाए। पी0वी0 नरसिम्हाराव का शासन काल चंद्रास्वामी जैसे तांत्रिकों को लेकर भी चर्चा में रहा। जब उनके विरुद्ध 26 जुलाई 1993 को अविश्वास प्रस्ताव आया तो उस समय वह अपनी सरकार को 265 सदस्यों के मत प्राप्त करके बचाने में सफल हो गए थे। पर बाद में उन पर आरोप लगा कि अपनी सरकार को बचाने के लिए उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत दी।

दसवीं लोकसभा के पदाधिकारीगण

दसवीं लोकसभा के चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी ने 121 सीटें जीतकर अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत कर लिया। जबकि जनता दल मात्र 59 सीट ही जीत पाया। इस लोकसभा के अध्यक्ष शिवराज पाटिल 10 जुलाई 1991 से 22 मई 1996 तक रहे। लोकसभा के उपाध्यक्ष के रूप में एस मल्लिकार्जुनैया ने 13 अगस्त 1991 से 10 मई 1996 तक कार्य किया। जबकि प्रधान सचिव के रूप में के0सी0 रस्तोगी 20 जून 1991 से 31 दिसंबर 1991 तक , सीके जैन 1 जनवरी 1992 से 31 मई 1994 तक और उसके पश्चात आरसी भारद्वाज 31 मई 1994 से 31 दिसंबर 1995 तक और एसएन मिश्रा 1 जनवरी 1996 से 10 मई 1996 तक कार्य करते रहे। इस चुनाव में 359.1 करोड़ रूपया सरकारी स्तर पर खर्च हुआ। इस समय देश के राष्ट्रपति आर वेंकटरमन ( 25 जुलाई1987 से 25 जुलाई 1992 ) और डॉ शंकर दयाल शर्मा (25 जुलाई 1992 से 25 जुलाई 1997) थे।
पी0वी0 नरसिम्हाराव के शासनकाल में वार्षिक योजना 1990- 92 और आठवीं पंचवर्षीय योजना 1992- 97 लागू थी। अर्थ विशेषज्ञों के अनुसार आठवीं पंचवर्षीय योजना को अर्थव्यवस्था में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मुद्रा स्थिति की दर उस समय अधिक थी। विभिन्न कारकों के कारण भुगतान संतुलन की स्थिति भी जटिल थी। उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था उच्च राज्यकोषीय घाटे और बजटीय घाटे का सामना कर रही थी और अर्थव्यवस्था में पर्याप्त संसाधनों का आवश्यक प्रवाह अनुपस्थित था। देश के सबसे अधिक चर्चित रहे श्री टी.एन. शेषन (12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996) दसवीं लोकसभा के समय देश के मुख्य चुनाव आयुक्त थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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