अन्ना और रामदेव भ्रष्टाचार दूर करने के लिए सरकार को बताएं लोकतंत्र को बना दो, विद्वानों का शासन


राकेश कुमार आर्य
भगवान कृष्ण की गीता और हमारे वेद व्यक्ति को निष्काम कर्म का सदुपदेश देते हैं। निष्काम कर्म वे हैं जिन्हें व्यक्ति लोककल्याण के भाव से करता है और करने के बाद भूल जाता है। जब निष्कामता का यह भाव शासन का आधार बन जाता है तो वह शासन लोककल्याण कारी शासन बन जाता है। लेकिन यह निष्काम कर्म भाव हर ऐरे-गैरे नत्थू खैरे के द्वारा किये जाने संभव नही है। इन्हें विद्वान लोग ही कर सकते हैं। धर्म के मर्म को समझने वाले तत्वदर्शी लोग कर सकते हैं। भारतीय राजनीति में तत्वदर्शी, विवेकशील, गंभीर और विद्वान लोगों को वरीयता और प्राथमिकता देने के लिए कोई व्यवस्था नही की गयी। इसलिए ‘मैं और मेरे’ के चक्कर में फंसे भ्रष्ट और निकृष्ट लोगों ने राजनीति पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। उसी का परिणाम आज की भ्रष्ट राजनीति है। चुनावों में फर्जी मतदान कराके स्व प्रतिष्ठा को बचाने तथा अपना वर्चस्व स्थापित करने की मिथ्याभावना के वशीभूत होकर लोग राष्ट्र का कार्य करने को चलते हैं। इस प्रकार के लोगों की असमानता की निकृष्ट भावना के कारण समाज का ढांचा बिगड़ गया है। देश के लोग आपस में झगड़ रहे हैं और वैर विरोध नित्य प्रति बढ़ते ही जा रहे हैं। परस्पर के बढ़ते झगड़ों के कारण ऊपर से नीचे तक स्वार्थों का संघर्ष ही दिखाई देता है। स्पष्ट है कि हमारे राजनीतिज्ञ अपनी-अपनी झूठी मान प्रतिष्ठा को लेकर लड़ झगड़ रहे हैं। जिस कारण राष्ट्रहित गौण होकर रह गया है झूठी मान प्रतिष्ठा के चक्कर में देश की आत्मा का ‘आनर किलिंग’ किया जा रहा है। क्योंकि देश की शासन सत्ता की बागडोर मूर्ख समाजद्रोही लोगों के हाथों में चली गयी है।
देश से भ्रष्टाचार को समाप्त कर निष्काम भाव से ओतप्रोत लोक कल्याणकारी शासन की स्थापना के लिए विद्वान लोगों को शासन की बागडोर सौंपने के लिए संविधान में विशेष व्यवस्था करनी चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि जिस देश का सारा प्राचीन साहित्य निष्काम भाव की उच्च भावना से भरा पड़ा है, उसमें भ्रष्टाचार से मुक्त होने के लिए नये नये कानून बनाने में व्यर्थ में ही परिश्रम करना पड़ रहा है। सूत्र को समझने में जितनी देरी की जा रही है उतना ही हम विनाश के निकट जा रहे हैं। हमारी प्राचीन मान्यता रही है कि ‘विद्वान सर्वत्र पूज्यते’ अर्थात विद्वान की सर्वत्र पूजा होती है। पर आज हमने विद्वानों को मूर्खों के पीछे बैठा दिया है। आगे बैठे हुए मूर्ख विद्वानों को चिढ़ा रहे हैं। यह लोकतंत्र के या भारतीय राजनीति के संक्रमण का काल नही है, अपितु भारतीय राजनीति की विडंबना का काल है। सामाजिक कार्य को लेकर आगे बढऩे का नाम राजनीति है, राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए तुच्छ स्वार्थों को तिलांजलि देने की भावना का नाम राष्ट्रनीति है, इसी भावना के पश्चात तपस्वी राजनीतिज्ञों का निर्माण करना एक व्यवस्थित राजनीतिक व्यवस्था का पहला कार्य होता है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव हमें इस दिशा में आगे लेकर चले तो हैं, पर अभी यात्रा का आरंभिक काल है। अभी हमें बहुत कुछ तय करना है और बहुत दूर तक चलना है। हम राजनीति की वर्तमान भ्रष्टï व्यवस्था से मुक्ति तभी पा सकते हैं, जबकि हम वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था को समूल नष्ट करने के लिए प्रतिबद्घ हों। कानून बनाने या जनलोकपाल बनाने से स्थिति नही सुधरेगी। क्योंकि एक सही व्यक्ति को 99 मूर्ख जब हड़काएंगे तो वह सही नही रह पाएगा। एक ईमानदार जनलोकपाल को भ्रष्ट लोगों का बहुमत कितनी देर ईमानदारी से कार्य करने देगा? यह बात बहुत ही विचारणीय है, संविधानिक संस्थानों पर बैठे लोगों को व्यवस्था के भ्रष्ट लोगों का बहुमत शीघ्र ही अपने जैसा कर लेता है, या अपने जैसे लोगों को ही पूर्ण संवैधानिक संस्थानों पर बैठने देता है। इसलिए उचित होगा कि राजनीति के प्रशिक्षण के लिए विशेष व्यवस्था की जाए और एक प्रक्रिया के अंतर्गत तपे तपाये प्रशिक्षित लोगों को निष्काम भाव की शिक्षा देकर एक मिशनरी बनाकर राजनीति में उतारा जाए, तो हम देखेंगे कि बिना किसी कानून के और बिना किसी जनलोकपाल के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने लगेगा। जिन लोगों ने जय-पराजय को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर राजनीति को चोर उचक्कों की चौपाल बनाया है वो लोग देश के ‘ऑनर किलर हैं, उनकी पहचान होनी चाहिए और उन्हें चलता करने के लिए बुद्घिजीवी वर्ग में एक विशेष हलचल मचनी चाहिए।
ऑनर किलिंग को लेकर हम समाज में शोर मचाते हैं लेकिन देश के स्वाभिमान और अस्मिता की हो रही ऑनर किलिंग की ओर हमारा ध्यान नही है।

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