इसी समय भारत की राष्ट्रवादी शक्तियों ने अपना योग विश्व को प्रस्तुत कर दिया है। हताशा और निराशा का मारा हुआ संसार बड़ी तेजी से ओ३म् के झण्डे तले योग की शरण में आ रहा है और अपनी हताशा और निराशा को मिटाकर आत्मिक शान्ति की अनुभूति कर रहा है। लोगों को ओ३म् का उच्चारण और जप बड़ा लाभ पहुंचा रहा है। फलस्वरूप बड़ी तेजी से लोग ओ३म् का प्रणव जप करने की ओर बढ़ रहे हैं। इससे बहुत लोगों पर साम्प्रदायिक मान्यताओं के बंधन शिथिल पड़ते जा रहे हैं। लोग ओ३म् और योग के प्रति वैश्विक समाज में छायी हुई प्रत्येक प्रकार की साम्प्रदायिकता से ऊपर मान रहे हैं। जिससे भारत की संस्कृति पुन: विश्व का मार्गदर्शन करने की स्थिति में आती जा रही है।
इसका कारण यह भी है कि सारा पश्चिमी जगत अपने भौतिकवाद से अब ऊब चुका है। उसने कंकरीट का जंगल खड़ा करके देख लिया, बड़े-बड़े भवन बनाकर देख लिये, सैण्ट सोफे और सौंदर्य प्रसाधन या विलासिता के सामान खरीदकर देख लिये, शरीर पर इत्र छिडक़कर देख लिया कि मुझमें से सुगंध निकलती रहे-पर परिणाम सार्थक नही आये। अब विश्व का नेतृत्व पश्चिम के हाथ से खिसक रहा है। विश्व की महाशक्ति अमेरिका भी विश्व को एक परिवार की भावना में लाने में असफल रहा है। कंकरीट के जंगल से उकताकर लेाग भारत की झोंपडिय़ों को खोज रहे हैं, जिस का प्रमाण जंगल में प्रकृति के मध्य बनने वाले फार्म हाउस हैं, जिन्हें अशान्ति और बेचैनी से व्याकुल धनी लोग अधिक अपना रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि भारत का अनुकरण करो-अन्यथा बच नहीं पाओगे।
लोगों ने ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं बना ली हैं, पर उनमें वे शान्ति नहीं ला सके। वे दीवारों से और अट्टालिकाओं में सजे विलासिता और भोग के सामान से शान्ति का परिचय पूछ रहे हैं पर उन्हें बताया जा रहा है कि वह यहां नहीं रहती और कभी तुम्हें वह यहां मिलेगी भी नहीं। लोगों की स्थिति आज ऐसी हो गयी है जैसे एक दूर देश के उस पथिक की हो जाती है जो प्यासा हो और अपनी प्यास बुझाने के लिए बड़ी उत्सुकता से पेड़ों के किसी झुरमुट के पास इस आशा में पहुंचे कि यहां कोई व्यक्ति रहता होगा और उसके पास पानी होगा, पर उसे वहां जाकर पता चले कि यहां भी पानी नहीं है।
लोग अट्टालिकाओं की ओर भागे तो सही पर ये अट्टालिकाएं उनकी प्यास नहीं बुझा पायीं। आज ये अट्टालिकाएं ही लोगों को बता रही हैं कि यदि तुझे वास्तव में ज्ञान की प्यास लगी है तो तुझे भारत की ओर जाना ही होगा। संसार के लोगों की यह स्थिति और उनका भारत की ओर इस प्रकार आना स्पष्ट करता है कि भारत को अपनी नयी और महत्वपूर्ण भूमिका के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत के लिए विश्वगुरू बनने की आज भी अनंत संभावनाएं हैं। आज के विश्व की कलह की स्थिति को केवल भारत के वेद के ‘शान्तिप्रकरण’ से ही दूर किया जा सकता है, और सुख के लिए तरसते विश्व समाज को ‘स्वस्तिवाचन’ से ही दूर किया जा सकता है। सुख और शान्ति की कामना करना मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक है। इसलिए हर व्यक्ति और हर समुदाय ने अपनी-अपनी प्रार्थनाओं में इन दोनों की कामना को अवश्य ही स्थान दिया है। यह अलग बात है कि वैदिक संस्कृति के अलावा अन्य किसी संस्कृति ने मानव को वास्तविक सुख शान्ति क्या है-और ये कैसे मिलेगी?- यह नहीं समझाया है। मनुष्य मोक्ष रूपी जिस आनन्दरस को पाना चाहता है, उसे ही भारत विश्व को समझाने के लिए आगे आये।
हमारे देश में चाहे जितनी गिरावट आ गयी हो और चाहे जितने ‘बाबा’ अपने काले कारनामों के कारण जेल चले गये हों-पर जब तक भारत के पास वेदामृत है-तब तक भारत से ही यह अपेक्षा की जा सकती है कि वही मानवता को ‘आनंद रस’ की घुट्टी पिला सकता है। जो बाबा आज जेल जा रहे हैं या जेल की हवा खा रहे हैं-वे गौतम, कणाद, कपिल के भारत में पैदा अवश्य हो गये हैं, परंतु वे गौतम, कणाद, कपिल आदि की परम्परा के ऋषि नहीं हैं-उनका जीवन वैदिक सिद्घांतों और आदर्शों के प्रति समर्पित नहीं है, इसलिए उन्हें तो वहीं जाना ही था-जहां वे चले गये हैं।
कहने का अभिप्राय है कि हमें इस बात को लेकर निराश होने की आवश्यकता नहीं है कि जब हमारे (तथाकथित) भगवान ही जेल चले गये हैं तो अब तो सूर्योदय की कोई आशा ही नहीं की जा सकती? भारत को पुन: गौतम, कणाद, कपिल आदि ऋषियों की परम्परा का देश बनाना होगा। पाखण्ड, ढकोसला, छल और दिखावे के आडम्बर से बाहर निकलकर भारत को अपना वास्तविक आध्यात्मिक तेजस्वी स्वरूप दिखाना होगा। जिस दिन भारत ब्रह्म तेजधारी द्विजों और परमप्रतापी क्षत्रियों को उत्पन्न करने का कारखाना स्थापित कर लेगा उसी दिन से भारत पुन: विश्वगुरू के पद पर शोभायमान हो जाएगा। भारत की शोभा उसकी अध्यात्मवाद मिश्रित लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है-जो देश व संसार में अध्यात्म प्रेरित भौतिकवाद की क्रांति करने की भावना पर बल देने वाली रही है। इस वास्तविक लोकतंत्र से अभी संसार बहुत दूर है, यही वह शासन व्यवस्था होगी जो विश्व से भय, भूख और भ्रष्टाचार को मिटाने में सक्षम होगी। अभी इस वास्तविक लोकतंत्र के सिद्घांत को या व्यवस्था को भारत को अपने ऊपर या अपने यहां से लागू करके दिखाना है और फिर संसार को इसके सारे लाभ बताना है।
माना जा सकता है कि भारत का मार्ग कंटकाकीर्ण हो सकता है और लम्बा भी हो सकता है, इसे पाने में असंख्य कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ेगा, पर यह नहीं कहा जा सकता कि भारत के लिए यह मार्ग अपनाना और अपने ऊपर लागू करना असंभव ही है। चुनौती को चुनौती देना भारत का संस्कार रहा है। उसने सैकड़ों वर्ष तक विदेशी सत्ताधीशों से युद्घ कर अपने इस संस्कार का परिचय भी दिया है। अत: उपस्थित चुनौती को भी चुनौती देने की आवश्यकता है। यह समझने की आवश्यकता है कि जितनी बड़ी चुनौती होती है-उतनी ही बड़ी साधना करनी पड़ती है। तप, त्याग और बलिदान का पथ इस साधना के मार्ग को सरल करता है। जिसमें भारत प्राचीनकाल से ही पारंगत रहा है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि संपूर्ण राष्ट्र यदि एक साथ उठ खड़ा हुआ तो विश्व में वैदिक संस्कृति का डंका बजने से कोई रोक नहीं पाएगा। अभी सच ये है कि विश्व तो भारत की भूमिका की प्रतीक्षा कर रहा है-पर भारत ही पूर्ण मनोयोग से चुनौती को चुनौती देने का भाव नहीं बना रहा है। हमारी राजनीतिक पार्टियां देश के नाम पर और देश के सम्मान के नाम पर एकता का प्रदर्शन करें। प्रधानमंत्री चाहे कोई भी हो यदि वह देश का सम्मान बढ़ाता है तो उसके साथ देश का प्रत्येक राजनीतिक दल खड़ा हुआ दिखना चाहिए। इतना ही नहीं प्रत्येक प्रधानमंत्री के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाए कि वह भारत की संस्कृति के ‘पुनरूज्जीवी पराक्रम’ वाले संस्कार के वशीभूत होकर भी कार्य करेगा और ‘पुनरूज्जीवी पराक्रम’ के इस सनातन भारतीय मूल्य या संस्कार को सारा भारत एक साथ एक स्वर से अपनी सहमति व स्वीकृति प्रदान करता है। भारत के समाज के मठाधीशों को यह संकल्प लेना होगा कि वे समाज में एकता स्थापित करने के लिए कार्य करेंगे। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि जिस देश में लाखों समाज सेवी संस्थाएं, संगठन, ग्राम पंचायतें आदि हों और उस देश में इसके उपरान्त भी सामाजिक विषमताएं यथा छुआछूत, ऊंचनीच, अगड़ा-पिछड़ा, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक आदि के रूप में दिखायी दे रही हों।
क्रमश:

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