नरेंद्र मोदी के भाषण का बदल रहा है स्वरूप, क्या हो सकते हैं मायने ?

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डॉ. संतोष कुमार तिवारी

लेखन, संगीत आदि की तरह भाषण देना भी एक कला है। जो लोग रोज लेखन करते हैं या जो रोज गीत-संगीत पर काम करते हैं, उनकी कला में निखार और
निपुणता बढ़ती जाती है। यही हमारे प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी के साथ हो रहा है। उनके भाषण तो पहले भी बहुत ओजस्वी होते थे और आम जनता के दिलों को छू जाते थे, परन्तु अब उनमें और निखार आ गया है। उनमें अनुप्रास अलंकार का तत्व बढ़ता जा रहा है। मोटे तौर पर अनुप्रास का मतलब होता है कि एक ही अक्षर या शब्द का बार-बार उच्चारण होना। जैसे कि महात्मा गांधी का भजन है: रघुपति राघव राजा राम। इसमें ‘र’ अक्षर की बार-बार ध्वनि हो रही है।

हाल ही में केरल के कोच्चि में आईएनएस विक्रांत के नौसेना में शामिल होने पर उन्होंने अपने भाषण में अनुप्रास का बहुत ही प्रभाशाली तरीके से इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा: विक्रांत- विशाल है, विराट है, विहंगम है। विक्रांत विशिष्ट है, विक्रांत विशेष भी है। विक्रांत केवल एक युद्धपोत नहीं है। ये 21वीं सदी के भारत के परिश्रम, प्रतिभा, प्रभाव और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। यदि लक्ष्य दुरन्त हैं, यात्राएं दिगंत हैं, समंदर और चुनौतियाँ अनंत हैं- तो भारत का उत्तर है- विक्रांत। आजादी के अमृत महोत्सव का अतुलनीय अमृत है – विक्रांत।

पीएम नरेंद्र मोदी

उन्होंने कहा, ‘लक्ष्य कठिन से कठिन क्यों न हों, चुनौतियां बड़ी से बड़ी क्यों न हों, भारत जब ठान लेता है, तो कोई भी लक्ष्य असम्भव नहीं होता है। आज भारत विश्व के उन देशों में शामिल हो गया है, जो स्वदेशी तकनीक से इतने विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण करता है। आज INS विक्रांत ने देश को एक नए विश्वास से भर दिया है, देश में एक नया भरोसा पैदा कर दिया है। आज विक्रांत को देखकर समंदर की ये लहरें आह्वान कर रही हैं- अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।’

मोदीजी ने इस अवसर पर कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता की दो पक्तियाँ भी बताईं। ये पंक्तियाँ भी अनुप्रास से अलंकृत थीं:

नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो, नमो!

अनुप्रास के प्रयोग से उनका भाषण काव्यात्मक हो जाता है। लोगों के दिलों को वह और अधिक गहराई से छूने लगता है। वह सबको मन-मुग्ध कर लेता है। नरेन्द्र मोदी हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी के शब्दों में भी अनुप्रास का प्रयोग कर रहे हैं। पिछले माह कुनो नेशनल पार्क के चीता कार्यक्रम में उन्होंने कहा: दुनिया आज जब प्रकृति और पर्यावरण की ओर देखती है, तो टिकाऊ विकास की बात करती है। लेकिन प्रकृति और पर्यावरण, पशु और पक्षी के लिए ये केवल टिकाऊपन और सुरक्षा के विषय नहीं हैं। हमारे लिए ये हमारी संवेदनशीलता और आध्यात्मिकता का भी आधार हैं। हम वो लोग हैं जिनका सांस्कृतिक अस्तित्व; सर्वम् खल्विदम् ब्रह्म; के मंत्र पर टिका हुआ है। अर्थात्, संसार में पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, जड़-चेतन जो कुछ भी है, वो ईश्वर का ही स्वरूप है, हमारा अपना ही विस्तार है। हम वो लोग हैं जो कहते हैं-

परम् परोपकारार्थम्
यो जीवति स जीवति।

अर्थात्, खुद के फायदे को ध्यान में रखकर जीना वास्तविक जीवन नहीं है।वास्तविक जीवन वो जीता है जो परोपकार के लिए जीता है। इसीलिए, हम जब खुद भोजन करते हैं, उसके पहले पशु-पक्षियों के लिए अन्न निकालते हैं।

दुनियाभर में कवि, लेखक और भाषण-कला में माहिर लोग अपनी बात को असरदार तरीके से प्रस्तुत करने के लिए अनुप्रास अलंकार का प्रयोग करते रहे हैं।
मैथली शरण गुप्त की कविता है: वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक ने लिखा: The fault-finder will find faults even in paradise. (द फाल्ट-फाइंडर विल फाइन्ड फाल्ट इवेन इन पैरेडाइज) अर्थात छिद्रान्वेषक स्वर्ग में भी कोई न कोई बुराई ढूंढ लेंगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन भी अनुप्रास का इस्तेमाल बहुत प्रभावी ढंग से करते थे। उन्होंने कहा: When I do good, I feel good. When I do bad, I feel bad. That’s my religion. (व्हेन आई डू गुड, आई फील गुड. व्हेन आई डू बैड, आई फील बैड. दैट इज माइ रेलीजन) अर्थात जब मैं अच्छा करता हूँ, तो मुझे अच्छा लगता है। जब मैं बुरा करता हूँ, तो मुझे बुरा लगता है। यही मेरा धर्म है।

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