धारा 498-ए : सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का कोई असर नही

supreme court

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

हमारी बहन-बेटियों को दहेज उत्पीड़न के सामाजिक अभिशाप से कानूनी तरीके से बचाने और दहेज उत्पीड़कों को कठोर सजा दिलाने के मकसद से संसद द्वारा सम्बंधित कानूनी प्रावधानों में संशोधनों के साथ भारतीय दण्ड संहिता में धारा 498-ए जोड़ी गयी थी। मगर किसी भी इकतरफा कठोर कानून की भांति इस कानून का भी प्रारम्भ से ही दुरुपयोग शुरू हो गया। जिसको लेकर कानूनविदों में लगातार विवाद रहा है और इस धारा को समाप्त या संशोधित करने की लगातार मांग की जाती रही है। इस धारा के दुरुपयोग के सम्बन्ध में समय-समय पर अनेक प्रकार की गम्भीर टिप्पणियॉं और विचार सामने आते रहे हैं। जिनमें से कुछ यहॉं प्रस्तुत हैं :-
1. 19 जुलाई, 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए को कानूनी आतंकवाद की संज्ञा दी।
2. 11 जून, 2010 सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के सम्बन्ध में कहा कि पतियों को अपनी स्वतंत्रता को भूल जाना चाहिये।
3. 14 अगस्त, 2010 सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार से भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए में संशोधन करने के लिए कहा।
4. 04 फरवरी, 2010 पंजाब के अम्बाला कोर्ट ने स्वीकार कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों का दुरूपयोग हो रहा है।
5. 16 अप्रेल, 2010 बॉम्बे हाई कोर्ट ने और 22 अगस्त, 2010 को बैंगलौर हाई कोर्ट ने भी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के दुरूपयोग की बात को स्वीकारा।
6. केवल यही नहीं, बल्कि 22 अगस्त, 2010 को केन्दीय सरकार ने सभी प्रदेश सरकारों की पुलिस को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों के दुरुपयोग के बारे में चेतावनी दी।
7. विधि आयोग ने अपनी 154 वीं रिपोर्ट में इस बात को साफ शब्दों में स्वीकारा कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों का दुरुपयोग हो रहा है।
8. नवम्बर, 2012 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश द्वय टीएस ठाकुर और ज्ञानसुधा मिश्रा की बेंच ने कहा कि धारा 498-ए के आरोप में केवल एफआईआर में नाम लिखवा देने मात्र के आधार पर ही पति-पक्ष के लोगों के विरुद्ध धारा-498-ए के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिये।
उपरोक्त गंभीर विचारों के होते हुए भी धारा 498-ए भारतीय दंड संहिता में कायम है इसका दुरुपयोग भी लगातार जारी रहा है। जिसको लेकर देश की सर्वोच्च अदालत अर्थात् सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 02 जुलाई, 2014 को एक बार फिर से अनेक गम्भीर मानी जा रही टिप्पणियों के साथ अपना निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने अपने निर्णय में मूल रूप से निम्न बातें कही हैं:-
1. दहेज उत्पीड़न विरोधी धारा 498-ए का पत्नियों द्वारा जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है।
2. धारा 498-क में वर्णित अपराध के संज्ञेय और गैर जमानती होने के कारण असंतुष्ट पत्नियां इसे अपने कवच की बजाय अपने पतियों के विरुद्ध हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं।
3. धारा 498-क के तहत गिरफ्तारी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने के साथ-साथ, गिरफ्तार व्यक्ति को अपमानित भी करती है और हमेशा के लिए उस पर धब्बा लगाती है।
4. धारा 498-ए वर पक्ष के लोगों को परेशान करने का सबसे आसान तरीका है। पति और उसके रिश्तेदारों को इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार कराना बहुत आसान है। अनेक मामलों में पति के अशक्त दादा-दादी, विदेश में दशकों से रहने वाली उनकी बहनों तक को भी गिरफ्तार किया गया है।
5. धारा 498-ए के इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों में से करीब एक चौथाई पतियों की मां और बहन जैसी महिलायें होती हैं, जिन्हें गिरफ्तारी के जाल में लिया जाता है।
6. धारा 498-ए के मामलों में आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसदी तक है, जबकि सजा दिलाने की दर सिर्फ 15 फीसदी है।
7. हाल के दिनों में वैवाहिक विवादों में इजाफा हुआ है। जिससे शादी जैसी संस्था प्रभावित हो रही है।
उपरोक्त कारणों से सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि धारा 498-ए के दुरुपयोग को रोकने के लिये हम सभी राज्य सरकारों को निम्न निर्देश देते हैं :-
(सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक निर्देश के सम्बन्ध में इस आलेख के लेखक द्वारा टिप्पणियॉं भी दी गयी हैं।)
1. देश में पुलिस अभी तक ब्रितानी सोच से बाहर नहीं निकली है और गिरफ्तार करने का अधिकार बेहद आकर्षक है। पहले गिरफ्तारी और फिर बाकी कार्यवाही करने का रवैया निन्दनीय है, जिस पर अंकुश लगाना चाहिए। पुलिस अधिकारी के पास तुरंत गिरफ्तारी की शक्ति को भ्रष्टाचार का बड़ा स्रोत है।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् सुप्रीम कोर्ट मानता है कि हमारी पुलिस न तो न्यायप्रिय है और न हीं निष्पक्ष है, बल्कि इसके साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि में पुलिस भ्रष्ट भी है। इसके उपरान्त भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा केवल पुलिस के इस चरित्र की निन्दा करके ही मामले को समाप्त कर दिया गया। पुलिस के चरित्र में सुधार के लिये किसी प्रकार की पुख्ता निगरानी व्यवस्था कायम करने या अन्य किसी भी प्रकार के सुधारात्मक आदेश नहीं दिये गये। जबकि न मात्र धारा 498-ए के सन्दर्भ में बल्कि हर एक मामले पुलिस का न्यायप्रिय तथा निष्पक्ष नहीं होना और साथ ही भ्रष्ट होना आम व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्ति में सबसे बड़ी और खतरनाक बाधा है। मगर सुप्रीम कोर्ट कम से कम इस मामले में आश्चर्यजनक रूप से मौन रहा है।
2. सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में आगे निर्देश देते हुए कहा है कि सभी राज्य सरकारें अपने-अपने पुलिस अधिकारियों को हिदायत दें कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498-क के तहत मामला दर्ज होने पर स्वत: ही गिरफ्तारी नहीं करें, बल्कि पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 में प्रदत्त मापदंडों के तहत गिरफ्तारी की आवश्यकता के बारे में खुद को संतुष्ट करें।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् जिस पुलिस को खुद सुप्रीम कोर्ट एक ओर भ्रष्ट मानता है, उसी पुलिस को खुद को ही इस बात की निगरानी रखनी है कि पुलिस के द्वारा कानूनी प्रावधानों का सही से प्रयोग किया जा रहा है या नहीं! क्या यह संभव है?
3. किसी व्यक्ति के खिलाफ पत्नियों द्वारा अपराध करने का आरोप लगाने के आधार पर ही फौरी तौर पर कोई गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। दूरदर्शी और बुद्धिमान पुलिस अधिकारी के लिए उचित होगा कि आरोपों की सच्चाई की थोड़ी बहुत जांच के बाद उचित तरीके से संतुष्ट हुए बगैर कोई गिरफ्तारी नहीं की जाये।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् यहॉं पर भी सुप्रीम कोर्ट की नजर में दूरदर्शी और बुद्धिमान पुलिस को ही स्वयं पर निगरानी रखनी है। सुप्रीम कोर्ट को किसी बाहरी ऐजेंसी से निगरानी करवाने की जरूरत प्रतीत नहीं होती है।
4. पुलिस स्वत: ही आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती और उसे गिरफ्तार करने की वजह बतानी होगी और ऐसी वजहों की न्यायिक समीक्षा की जायेगी। पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार करने की जरूरत के बारे में मजिस्ट्रेट के समक्ष कारण और सामग्री पेश करनी होगी। क्योंकि पतियों को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार एक बात है और इसके इस्तेमाल को पुलिस द्वारा न्यायोचित ठहराना दूसरी बात है। गिरफ्तार करने के अधिकार के साथ ही पुलिस अधिकारी ऐसा करने को कारणों के साथ न्यायोचित ठहराने योग्य होना चाहिए।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् यहॉं पर सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश के बारे में दो बातें गौर करने वाली हैं। प्रथम तो आदेश में ये साफ नहीं है कि धारा 498-ए के तहत मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपियों को गिरफ्तार करने से पूर्व मजिस्ट्रेट के समक्ष गिरफ्तारी के आधारों को पुलिस की ओर से सिद्ध करना होगा या गिरफ्तारी के बाद में मजिस्ट्रेट के पूछने पर सिद्ध करना होगा। दूसरे जिन मजिस्ट्रटों की अदालत से राष्ट्रपति तक के खिलाफ आसानी से गिरफ्तारी वारण्ट जारी करवाये जा सकते हैं और जो अदालतें मुकदमों के भार से इस कदर दबी बड़ी हैं कि उनके पास वर्षों तक तारीख बदलने के अलावा लोगों की सुनवाई करने का समय नहीं है, उन अदालतों से ये अपेक्षा किया जाना कि पुलिस ने गिरफ्तारी करने से पूर्व अपनी अन्वेषण डायरी में जो कारण लिखें हैं, वे कितने न्यायोचित या सही या उचित हैं, इसकी पड़ताल किये जाने की अपेक्षा किया जाना कहॉं तक व्यावहारिक होगा?
5. जिन किन्हीं मामलों में 7 साल तक की सजा हो सकती है, उनमें गिरफ्तारी सिर्फ इस कयास के आधार पर नहीं की जा सकती कि आरोपी ने वह अपराध किया होगा। गिरफ्तारी तभी की जाए, जब इस बात के पर्याप्त सबूत हों कि आरोपी के आजाद रहने से मामले की जांच प्रभावित हो सकती है, वह कोई और क्राइम कर सकता है या फरार हो सकता है।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी उक्त आदेश को पूर्व में भी अनेकों बार दोहराया जाता रहा है, लेकिन पुलिस द्वारा लगातार और बिना किसी प्रकार की परवाह किये इस प्रावधान का और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हर दिन उल्लंघन किया जाता रहा है। जिसका मूल कारण है, इस कानून का उल्लंघन करने वाले किसी पुलिस लोक सेवक को आज तक किसी प्रकार की सजा नहीं दिया जाना। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बार फिर से दोहराये गये इस आदेश का क्या हाल होगा, सहज कल्पना की जा सकती है!

ये तो हुई बात सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय की उक्त टिप्पणियों तथा निर्देशों की, लेकिन जमीनी हकीकत इतनी भयावह है कि धारा 498-ए के कहर से निर्दोष पीड़ितों को मुक्ति दिलाने के लिये इससे भी कहीं आगे बढकर किसी भी संवैधानिक संस्था को विचार कर निर्णय करना होगा, क्योंकि फौरी उपचारों से इस क्रूर व्यवस्था से निर्दोष पतियों को न्याय नहीं मिल सकता है। अत: इसके बारे में कुछ व्यवहारिक और कानूनी मुद्दे विचारार्थ प्रस्तुत हैं :-
1. पति-पत्नी के बीच किसी सामान्य या असामान्य विवाद के कारण यदि पत्नी की ओर से भावावेश में या अपने पीहर के लोगों के दबाव में धारा 498-ए के तहत एक बार पति के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा देने के बाद इसमें समझौता करने का कानूनी प्रावधान नहीं हैं!
ऐसे हालातों में इस कानूनी व्यवस्था के तहत एक बार मुकदमा अर्थात् एफआईआर दर्ज करवाने के बाद वर पक्ष को मुकदमें का सामना करने के अलावा, समाधान का अन्य कोई रास्ता ही नहीं बचता है। इसलिये यदि हम वास्तव में ही विवाह और परिवार नाम की सामाजिक संस्थाओं को बचाने के प्रति गम्भीर हैं तो हमें इस मामले में मुकदमे को वापस लेने या किसी भी स्तर पर समझौता करने का कानूनी प्रावधान करना होगा। अन्यथा वर्तमान हालातों में मुकदमा सिद्ध नहीं होने पर, मुकदमा दायर करने वाली पत्नी के विरुद्ध झूठा मुकदमा दायर करने के अपराध में स्वत: आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की कानूनी व्यवस्था किया जाना प्राकृतिक न्याय की मांग है, क्योंकि स्वयं सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि 85 फीसदी मामलों में धारा 498-ए के आरोप सिद्ध ही नहीं हो पाते हैं। इस स्थिति से कैसे निपटा जाये और झूठे आरोप लगाने वाली पत्नियों के साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पूरी तरह से मौन है। जो दुखद है।
2. वरपक्ष के जिस किसी भी सदस्य का, वधुपक्ष की ओर से धारा 498-ए के तहत एफआईआर में नाम लिखवा दिया जाता है, उन सभी सदस्यों को बिना ये जाने कि उन्होंने कोई अपराध किया भी है या नहीं उनकी गिरफ्तारी करना पुलिस अपना परमकर्त्तव्य समझती रही है!
मेरी राय में उक्त हालातों के लिये मूल में दो बड़े कारण हैं-

पहला तो यह कि धारा 498-ए के मामले में साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान न्यायशास्त्र के उस मौलिक सिद्धान्त का सरेआम उल्लंघन करते हैं जिसके अनुसार आरोप लगाने के बाद आरोपों को सही सिद्ध करने का दायित्व अभियोजन या वादी पक्ष पर नहीं डालकर आरोपी को पर डालता है कि वह अपने आपको निर्दोष सिद्ध करे। जिसके चलते पुलिस को इस बात से कोई लेना-देना नहीं रहता कि कोर्ट से यदि कोई आरोपी छूट भी जाता है तो इसके बारे में उससे कोई सवाल-जवाब किये जाने की समस्या होगी।
दूसरा बड़ा कारण यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस को अपना रौद्र रूप दिखाने का पूरा अवसर मिलता है और सारी दुनिया जानती है कि रौद्र रूप दिखाते ही सामने वाला निरीह प्राणी थर-थर कांपने लगता है! पुलिस व्यवस्था तो वैसे ही अंग्रेजी राज्य के जमाने की अमानवीय परम्पराओं और कानूनों पर आधारित है! जहॉं पर पुलिस को लोगों की रक्षक बनाने के बजाय, लोगों को डंडा मारने वाली ताकत के रूप में जाना और पहचाना जाता है! ऐसे में यदि कानून ये कहता हो कि 498-ए में किसी को भी बन्द कर दो, यह चिन्ता कतई मत करो कि वह निर्दोष है या नहीं! क्योंकि पकड़े गये व्यक्ति को खुद को ही सिद्ध करना होगा कि वह दोषी नहीं, निर्दोष है। अर्थात् अरोपी को अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने के लिये स्वयं ही साक्ष्य जुटाने होंगे। ऐसे में पुलिस को पति-पक्ष के लोगों का तेल निकालने का पूरा-पूरा मौका मिल जाता है।
इसलिये जरूरी है कि संसारभर में मान्यताप्राप्त न्यायशास्त्र के इस सिद्धान्ता को धारा 498-ए के मामले में भी लागू किया जाना चाहिये कि आरोप लगाने वाली पत्नियॉं इस बात के लिये जिम्मेदार हों कि उनकी ओर से लगाये गये आरोप पुख्ता तथा सही हैं और मंगठन्थ नहीं हैं। जिन्हें न्यायालय के समक्ष कानूनी प्रक्रिया के तहत सिद्ध करना उनका कानूनी दायित्व है। जब तक इस प्रावधान को नहीं बदला जाता है, तब तक गिरफ्तारी को पारदर्शी बनाने की औपचारिकता मात्र से कुछ भी नहीं होने वाला है।
3. अनेक बार तो खुद पुलिस एफआईआर को फड़वाकर, अपनी सलाह पर पत्नीपक्ष के लोगों से ऐसी एफआईआर लिखवाती है, जिसमें पति-पक्ष के सभी छोटे बड़े लोगों के नाम लिखे जाते हैं। जिनमें-पति, सास, सास की सास, ननद-ननदोई, श्‍वसुर, श्‍वसुर के पिता, जेठ-जेठानियॉं, देवर-देवरानिया, जेठ-जेठानियों और देवर-देवरानिया के पुत्र-पुत्रियों तक के नाम लिखवाये जाते हैं। अनेक मामलों में तो भानजे-भानजियों तक के नाम घसीटे जाते हैं।
पुलिस ऐसा इसलिये करती है, क्योंकि जब इतने सारे लोगों के नाम आरोपी के रूप में एफआईआर में लिखवाये जाते हैं तो उनको गिरफ्तार करके या गिरफ्तारी का भय दिखाकर आरोपियों से अच्छी-खायी रिश्‍वत वसूलना आसान हो जाता है (जिसे स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकारा है) और अपनी तथाकथित जॉंच के दौरान ऐसे आलतू-फालतू-झूठे नामों को रिश्‍वत लेकर मुकदमे से हटा दिया जाता है। जिससे अदालत को भी अहसास कराने का नाटक किया जाता है कि पुलिस कितनी सही जॉंच करती है कि पहली ही नजर में निर्दोष दिखने वालों के नाम हटा दिये गये हैं। ऐसे में इस बात का भी कानूनी प्रावधान किया जाना जरूरी है कि यदि इस बात की पुष्टि किसी भी स्तर पर हो जाती है कि धारा 498-ए के मामले में किसी व्यक्ति का असत्य नाम लिखवाया गया है तो उसी स्तर पर एफआईआर लिखवाने वाली के विरुद्ध मुकदमा दायर किया जाकर कार्यवाही की जावे।

इस प्रकार हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि न मात्र धारा 498-ए के मामलों में बल्कि जिन किन्हीं भी मामलों या प्रावधानों में कानून का दुरुपयोग हो रहा है, वहॉं पर किसी प्राभावी संवैधानिक संस्था को लगातार सतर्क और विवेकपूर्ण निगरानी रखनी चाहिये, जिससे कि ऐसे मामलों में धारा 498-ए की जैसी स्थिति निर्मित ही नहीं होने पाये। क्योंकि आज धारा 498-ए के मामले में सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों के बाद भी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं दिख रहा है, बल्कि कुछ लोगों का तो यहॉं तक कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के कारण दहेज उत्पीड़कों के हौंसले बढेंगे, जिससे पत्नियों पर अत्याचार बढ सकते हैं। फिर भी मेरा साफ तौर पर मानना है कि जब तक इस कानून में से आरोपी के ऊपर स्वयं अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने का भार है, तब तक पति-पक्ष के निर्दोष लोगों के ऊपर होने वाले अन्याय को रोक पाना या उन्हें न्याय प्रदान करना वर्तमान व्यवस्था में असम्भव है, क्योंकि धारा 498-ए के मामले में साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान न्याय का गला घोंटने वाले, अप्राकृतिक और अन्यायपूर्ण हैं! अत; धारा 498-ए के कहर से निर्दोष पतियों को बचाने में सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान निर्णय भी बेअसर ही सिद्ध होना है!

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