आज भी जरूरत है शास्त्री जी जैसे आदर्शवादी नेता और मंत्री की

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अनुराग भारद्वाज

यह किस्सा तबका है जब लाल बहादुर शास्त्री गृह मंत्री थे।एक बार वे और मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर दिल्ली के क़ुतुब एन्क्लेव इलाके से वापस आ रहे थे।दिल्ली के एम्स के पास एक रेलवे फाटक था। ट्रेन आने वाली थी।फाटक बंद था।गृह मंत्री की गाड़ी रुक गयी।कार के बगल में गन्ने वाले को देखकर शास्त्री बोले, ‘कुलदीप, जब तक फ़ाटक खुलता है क्यूं न गन्ने का रस पिया जाए?’
जब तक कुलदीप नैयर कुछ कहते, लाल बहादुर शास्त्री उतरे, गन्ने वाले को पैसे दिए और दो गिलास रस ले आये।कुछ देर बाद फ़ाटक खुला और उनकी गाड़ी आगे बढ़ गयी।गन्ने वाले को शायद ही पता चला हो कि उसका ग्राहक गृह मंत्री था। उस जमाने में प्रधानमंत्री की भी गाड़ी में एक ही सिपाही होता था। ऊपर से शास्त्री जी तो किसी भी तरह से रोबीले व्यक्ति नहीं लगते थे। उनका आचरण बेहद सादगी भरा था। इतना कि जब वे गृह मंत्री नहीं रहे तो अपने घर में ज़रूरत से ज़्यादा बिजली इस्तेमाल नहीं करते थे। जब किसी ने पूछा कि क्यों वे अक्सर एक बल्ब की रोशनी में ही काम निपटाते हैं तो उनका ज़वाब था, ‘अब मैं गृह मंत्री नहीं हूं, इतना ख़र्च नहीं उठा सकता।’
भारतीय राजनीति में जब भी सादगी की बात होगी, लाल बहादुर शास्त्री सबसे पहले पायदान पर होंगे। पर देश को संभालने के लिए सादगी काफी नहीं होती। शास्त्री की सादगी उनके व्यक्तित्व पर अक्सर भारी रही है।लेकिन सादगी उनके व्यक्तित्व का सिर्फ एक पक्ष थी। संकटों को सुलझाने की उनकी काबिलियत और मजबूत फैसले करने जैसी बातें भी उन्हें बाकी राजनेताओं से अलहदा बनाती थीं।
बतौर गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने चीन की लड़ाई देखी थी और जवाहर लाल नेहरू की तरह वे चीन को लेकर किसी मुगालते में नहीं थे। एक साक्षात्कार में कुलदीप नैयर ने इस बात का जिक्र किया था।कुलदीप नैयर के मुताबिक शास्त्री ने उनसे कहा था, ‘चीन एक दिन धोखा देगा और पंडितजी ये बात समझ नहीं रहे हैं’।
ऐसा ही हुआ। जंग हुई, रणनीतिक ग़लतियां हुईं और भारत हारा।इस हार के पीछे लेफ्टिनेंट जनरल कौल का पूर्वी कमान का अध्यक्ष होना एक कारण बताया जाता है।कौल कश्मीरी थे और रक्षा मंत्री वीके मेनन के ख़ास विश्वस्त। फौज से ज़्यादा फौजियों के हाउसिंग प्रोजेक्ट में दिलचस्पी लेकर वे अपनी समाजवादी छवि चमकाने में लगे रहते। शास्त्री कौल की नियुक्ति पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर चुके थे, पर उनकी नहीं सुनी गई। बताते हैं कि चीन के हमला बोलने के कुछ दिनों बाद कौल साहब पेट की गड़बड़ी को लेकर दिल्ली चले आये थे। दरअसल, वे मोर्चे पर सारे गलत रणनैतिक फ़ैसले कर रहे थे और देश ख़ामियाज़ा भुगत रहा था। उनकी ग़ैर मौजूदगी में लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह ने दिलेरी से कमान संभाली। इसके पहले अपने पर अमिट कलंक लगे, जनरल कौल वापस कमान संभालने आ गए। पर तब तक चीन जंग जीत चुका था।
जब चीन ने एकतरफ़ा युद्ध विराम किया तो लाल बहादुर शास्त्री असम के तेजपुर गए। जनरल कौल ने उन्हें शांति समझौता करने की सलाह दी। शास्त्री ने अनसुना कर दिया।उनके रवैये से कौल समझ गए कि उनके दिन पूरे हो गए हैं।हार के कई कारण थे।नेहरू का चीन को लेकर ग़लत आकलन, फौज में संसाधनों की कमी की तत्कालीन सेनाध्यक्ष पीएन थापर की शिकायत न सुना जाना और मोर्चे पर लेफ्टिनेंट जनरल कौल की रणनीतिक गलतियां।पर ठीकरा फूटा सेनाध्यक्ष थापर के सर पर उन्हें इस्तीफ़ा देने का हुक्म सुना दिया गया। संसद तो वीके मेनन की गर्दन लेकर ही शांत हुई।
इस हार से भारत की स्थिति कमज़ोर हुई, पश्चिमी देश भारत पर कश्मीर को लेकर पाकिस्तान से बातचीत करने का दबाव बनाने लगे। अमेरिका ने इसके लिए नेहरू के बजाय शास्त्री को तरजीह देने की कोशिश की। इससे पता चलता है कि उनका रसूख़ बढ़ गया था।
 
फिर कुछ दिनों बाद कश्मीर में ‘मू-ए-मुक़द्दस’ का मामला हो गया। यह पैगंबर साहब के बाल की चोरी की घटना थी।इसे संभालने में अगर ज़रा सी भी चूक हो जाती तो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में तो हिंदू-मुस्लिम दंगे होते ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम देशों में भारत की किरकिरी हो जाती। शास्त्री इस दौरान गृह मंत्री नहीं थे।वे ‘मिनिस्टर विदआउट पोर्टफ़ोलियो’ कहे जाते थे पर नेहरू को किसी और पर यकीन नहीं था। उन्होंने शास्त्री को ही इसे संभालने का ज़िम्मा दिया और शास्त्री ने निराश नहीं किया। अब वे नेहरू के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी के और मज़बूत दावेदार बन गए थे। इतने कि अमेरिकन पत्रकार वैलेस हेन्गेन अपनी किताब ‘आफ्टर नेहरु हू’ में सीधे-सीधे तौर पर शास्त्री को उनका उत्तराधिकारी घोषित किया।
नेहरू के अचानक निधन की वजह से जब कांग्रेस में प्रधानमंत्री बनने की दौड़ मची तो लाल बहादुर शास्त्री पीछे ही रहे। मोरारजी देसाई ने खुल्लमखुल्ला अपनी दावेदारी पेश की थी। शास्त्री का रुख इसके ठीक उलट था. वे पार्टी में चुनाव के बजाय रायशुमारी से पीएम बनने की बात कर रहे थे। यह तब है जब वे ‘कामराज प्लान’ के तहत गृह मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देकर एक बल्ब की रोशनी में काम करते थे। राजनीति में कुर्सी न हो, तो कोई नहीं पूछता। लेकिन शास्त्री तब भी लोकप्रिय थे।
1965 की भारत-पाक जंग लाल बहादुर शास्त्री जीवन का सबसे कठिन इम्तिहान थी। जिस तरह नेहरू चीन से दोस्ती की बात करते थे उसी तरह शास्त्री पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के इच्छुक थे।पाकिस्तान के मुखिया अयूब खान ने उनके पीएम बनने को दोनों मुल्कों के रिश्ते के लिए शुभ माना था। किस्मत की बात कहें या शास्त्री का कॉमन सेंस कि वे किसी भुलावे में नहीं आये।जब कच्छ में दोनों मुल्कों की सेनाओं के बीच झगड़े बढ़े तो उन्होंने पलटवार करने में नेहरू की तरह देर नहीं लगाई।यहां वही लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह पश्चिमी कमान संभाल रहे थे।वे पेट की ख़राबी को लेकर दिल्ली नहीं आये, बल्कि उनकी दिलेरी ने पाकिस्तानी अफ़सरों का हाज़मा ज़रूर ख़राब कर दिया।
भारत का पलड़ा भारी होने पर भी इस युद्ध का परिणाम तो ड्रा ही कहा जाता है। तिथवाल और हाजी पीर कब्ज़े में आ गया था, भारतीय सैनिक लाहौर हथिया सकते थे, पर 23 सितंबर को हुए युद्धविराम ने कई लोगों को चौंका दिया। कुलदीप नैयर अपनी किताब ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में लिखते हैं कि शास्त्री ने फ़ीरोज़पुर दौरे के दौरान सैनिकों को युद्धविराम की घोषणा के पीछे ‘फॉरेन प्रेशर’ की बात कही। उन्होंने कहा कि अमेरिका के दबाव में उन्हें ऐसा करना पड़ा क्योंकि वह भारत को आर्थिक और खाद्य मदद दे रहा था।
युद्ध के बाद लाल बहादुर शास्त्री काफ़ी लोकप्रिय हो गए थे। उनका, ‘जय जवान, जय किसान’ नारा लोगों के सर चढ़कर बोला। एक हार्टअटैक झेल चुके शास्त्री जब पाकिस्तान से बातचीत करने ताशकंद गये तो लोगों की उम्मीदों का पहाड़ भी अपने साथ ले गए। भारत-चीन युद्ध की खटास को इस लड़ाई के अंजाम ने कम जो किया था। ताशकंद समझौते को लेकर देश में अलग-अलग राय बनी। कुछ को यह भारत के हित में लगा, तो कुछ ने शास्त्री की देश-विरोधी कहा। बताया जाता है कि समझौते की रात उन्होंने घर फ़ोन करके परिवार वालों की राय मांगी तो उन्हें निराशा हुई।उसी रात शास्त्री का दिल कमज़ोर पड़ा और हमेशा के लिए थम गया।
कुलदीप नैयर लिखते हैं कि वैलेस हेन्गेन की तरह उन्होंने शास्त्री से पूछा था कि उनकी सेहत ख़राब रहती है और अगर कुछ अनहोनी हो गयी तो, ‘आफ्टर शास्त्री हू?’। शास्त्री का जवाब था कि अगर वे तीन या चार साल और जीवित रहे तो यशवंतराव बनें और अगर वे एक या दो साल में चल बसें तो इंदिरा गांधी को उनका उत्तराधिकारी चुना जाना चाहिए।

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