दक्षिण भारत के संत (१६) त्यागराजा

बी एन गोयल

जिस व्यक्ति को भारत के शास्त्रीय संगीत में थोड़ी भी रुचि होगी उसे संगीतकार त्यागराज के बारे में अवश्य जानकारी होगी। भारतीय शास्त्रीय संगीत को दो भागों में बांटा जाता है – उत्तरी और दक्षिणी । उत्तरी को हिंदुस्तानी संगीत कहते हैं और दक्षिणी को कर्नाटक संगीत कहा जाता है। कर्नाटक संगीत के संगीतज्ञों में त्यागराजा का नाम शीर्ष पर है।

यदि गत 300 वर्षों का दक्षिण भारत का इतिहास देखे। लगता है जैसे सभी कुछ कल ही घटित हुआ हो। तिरुपति के चंद्रगिरी क़िले में बैठ कर तत्कालीन महाराजा ने फ्रांसिस डे नाम के अँग्रेज़ के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस के अनुसार चेन्नई का क्षेत्र सैंट जॉर्ज के क़िले के निर्माण के लिए फ्रांसिस डे को सौंप दिया गया। इस के बाद 1809 में एक अनहोनी घटना हुई। भारतीय क्षेत्र के तत्कालीन महाराजा ने ब्रिटिश जिलाधीश को अपने ही क्षेत्र के उपयोग के लिए किराया देना शुरू कर दिया।

ब्रिटिश शासन के समय में इस तरह की अनेक घटनाएं घटती रही। देसी राजा बदलते रहे। 1799 में टीपू सुलतान की पराजय हुई। ब्रिटिश अधिकारी और अधिक बलशाली होते गए। तंजावुर में मराठा साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। लेकिन दूसरी ओर कुछ सकारात्मक काम भी हुए। तंजावुर क्षेत्र में संगीत की त्रिमूर्ति – त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितार और श्यामा शास्त्री – का आविर्भाव हुआ और कर्नाटक संगीत का संवर्धन हुआ। ये कर्नाटक संगीत के तीन स्तम्भ थे। इन में त्यागराज का अपना एक अनूठा स्थान था| इन्होंने भगवान राम की भक्ति में 800 से भी अधिक पदों की रचना की। इन में मात्र 500 पद ही आजकल अधिक प्रचलित हैं। अधिकांश  पद तेलुगु भाषा में थे और कुछ संस्कृत में थे।ये पद तमिल भाषा क्षेत्र में भी काफी प्रसिद्ध थे। त्यागराज की मान्यता थी कि यदि भक्ति के पदों को सम्पूर्ण निष्ठा, आस्था, शुद्धता, और समर्पण भाव से गाया जाए तो मनुष्य आध्यात्मिक ऊँचाई को सहजता से प्राप्त कर सकता है। भगवत प्राप्ति का यही सबसे सरल उपाय है।

त्यागराज तिरुवैयारू में अंबाल देवी के मंदिर में भजन गाया करते थे। यह उन की दैनिक चर्या थी कि वे भिक्षाटन के लिए जाने से पूर्व देवी की आराधना अवश्य करते थे।

उन की भगवान में श्रद्धा और भजन गायन में निष्ठा के कारण अनेक राजा महाराजा उन की सेवा करने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन त्यागराज अपना निर्वाह भिक्षाटन से ही करते थे। त्यागराजा राम भक्त थे।

कहते हैं इन्हें अनेक बार स्वप्न में भगवान राम के दर्शन हुए थे। ये भगवत प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन संगीत को मानते थे। इन्हों ने भगवान राम की भक्ति के पदों की रचना अपनी मातृ  भाषा तेलुगू में की। इन का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है – जगदानंद कारक। इस में भगवान राम के 108 नाम दिये गए हैं।

त्यागराज का जन्म तमिलनाडु के समीप तिरुवैयारू स्थान में 4 मई 1767 को हुआ था। ये स्मार्त तेलुगु ब्राह्मण थे। इन के माता पिता 17वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही विजय नगर राज्य काल में तमिलनाडु से आकर बस गए थे। 18 वर्ष की आयु में ही इन का विवाह पार्वती नाम की कन्या से हुआ था। लेकिन 5 वर्ष उपरांत ही उन का देहांत हो गया था। इस के बाद इन का विवाह पार्वती की छोटी बहन कमला से हुआ। इन के एक बेटी थी ‘सीता महालक्ष्मी’। यद्यपि इन के अपने वंश में आगे कोई संतान नहीं थी परंतु इन के शिष्यों ने, विशेष कर संगीत के शिष्यों ने, इन्हें अमरत्व प्रदान किया।

राम भक्ति का वरदान त्यागराज को अपने पिता श्री राम ब्रह्म से मिला था। इन के पिता रामायण के प्रसिद्ध विद्वान थे और उन्हें तंजावुर नरेश का संरक्षण प्राप्त था । पिता ने इन को ‘राम तारक मंत्र’ की दीक्षा दी। इस समय इन की आयु मात्र 13 वर्ष थी। इसी समय इन्होंने अपने पहले पद ‘नमो नमो राघवयः’ की रचना की। परिणाम स्वरूप त्यागराज को राम के सिवाय और कुछ सूझता ही नहीं था। ये हर समय राम नाम के यंत्र का ही जाप करते रहते थे। तेलुगु और संस्कृत में इन की विशेष रुचि थी और इन में इन्होंने विशेष दक्षता प्राप्त की थी।  अपनी माता से इन्हें पुरंदर दास तथा अन्य धार्मिक संतों के बारे में ज्ञान मिला। इन्हें स्वप्न में अनेक बार भगवान राम के दर्शन हुए।

कहते  हैं कि एक बार इन के विरोधियों ने इन के उपास्य देव भगवान राम के विग्रह को नदी में फेंक दिया। भगवान राम ने त्यागराज को स्वप्न में दर्शन दिया और बताया कि मूर्ति कहाँ है। एक बार पुद्दुकोटई के राजा ने त्यागराज की चमत्कारिक शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। उस ने सभा के मध्य में एक बुझा हुआ दिया रख दिया और कहा कि कोई इस दिये को बिना किसी दियासलाई आदि के जला कर दिखाये। त्यागराज ने कुछ क्षणों के लिए महा ऋषि नारद का ध्यान धरा और ज्योति स्वरूपिणी राग का गायन प्रारम्भ किया। यह एक चमत्कार ही था कि कुछ देर बाद दिया स्वयं ही प्रज्वलित हो गया। राजा सहित सभी उपस्थित लोग आश्चर्य चकित रह गए। त्यागराज उस समय मात्र 18 वर्ष के थे।

इसी प्रकार एक बार एक व्यक्ति तिरुपति की यात्रा से लौटते समय अचानक ही मंदिर के कुएं में गिर गया। त्यागराज ने भगवान से उस की रक्षा की याचना की और वह बच गया ।

त्यागराज को दक्षिण भारतीय संगीत का जनक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि देव ऋषि नारद ने इन्हें शास्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार के लिए ‘स्वरार्णव’ नाम का एक ग्रंथ भेंट किया था। एक बार त्यागराज के द्वार पर एक वृद्ध व्यक्ति आया। उस ने कहा, “मैं तुम से कुछ भजन सुनने के लिए आया हूँ। कहते हैं तुम्हें भगवान राम के दर्शन हुये हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से तुम्हें देखने के लिए आया हूँ।“ त्यागराज ने इस व्यक्ति को आदर सहित बैठाया और पूरी भक्ति से भजन गाया। वृद्ध व्यक्ति चला गया। उसी रात्रि में त्यागराज को उसी बूढ़े व्यक्ति ने स्वप्न में दर्शन दिये और पूछा, “मुझे पहचानते हो? मैं नारद हूँ। मैं तुम से अत्यधिक प्रसन्न हूँ। मैं यह ग्रंथ तुम्हें भेंट देता हूँ। तुम अपनी प्रसिद्धि के चरम उत्कर्ष पर पहुँचोगे।“

इन्हें संगीत की जानकारी बचपन में ही अपने पितामह से हो गई थी। उन को ही इन्होंने अपना आदि गुरु मान लिया था। इन की संगीत के प्रति रुचि देख कर इन के पिता ने इन्हें उस समय के संगीताचार्य वेंकटरमनेया के चरणों में सौंप दिया। इस समय इन की आयु 16 वर्ष की थी। गुरु जी भी ऐसा शिष्य पा कर अत्यंत प्रसन्न थे जिस ने एक वर्ष की अल्प अवधि में ही अपनी संगीत की शिक्षा पूरी कर ली। अतः 17 वर्ष की आयु से ही इन्होंने छोटी छोटी कृतियों की रचना शुरू कर दी थी । 21 वर्ष की आयु में इन्होंने संत राम कृष्णा नंद से ‘राग षडाक्षरी’ मंत्र की दीक्षा ली। सन 1802 में गुरु वेंकटरमनेय्या ने संगीत विद्वानों की उपस्थिति में इन का अरंगत्रेम कराया। त्यागराज ने इस समय अपनी कृति राग बिलाहारी में प्रस्तुत की।

पद की पहली पंक्ति थी – ‘क्या हरी दर्शन संभव हैं?’ गायन की समाप्ति पर गुरु अपने शिष्य की प्रस्तुति पर भाव विभोर हो गए। पद के भाव थे –

– क्या संगीत और भक्ति से भी अधिक पावन मार्ग कोई और है?

– रे मन सप्त स्वरों के आराध्य को नमन कर।

– रे मन मुझे ईश्वर और समष्टि के प्रसाद की ओर ले चल।

 

इन के संगीत की ख्याति चारों ओर हो गई थी। इन्हें न तो किसी प्रकार के धन की इच्छा थी न किसी पद प्रतिष्ठा की। ये निर्धन ही बने रहना चाहते थे।

एक बार तंजावुर के महाराजा सरोबा जी ने त्यागराज के पास संदेश भेजा। संदेश वाहक ने कहा, ‘कृपया महाराज की प्रशस्ति में एक दो रचनाएँ कर दें। इस के बदले में महाराज आप को दस एकड़ भूमि और भरपूर स्वर्ण मुद्रा देंगे।‘ त्यागराज ने कहा, ‘मैं अपने संगीत का उपयोग ऐसे अधम काम के लिए क्यों करूँ जब कि मुझे मालूम है कि राजा एक भ्रष्ट व्यक्ति है।‘ संदेश वाहक खाली हाथ लौट गया। इसी घटना के संदर्भ में त्यागराज ने एक पद की रचना की –‘निधि चलम सुखम’ अर्थात आप को अधिक प्रसन्नता कहाँ मिलती है? धन ऐश्वर्य में अथवा राम भक्ति में?’

इसी प्रकार त्रावणकोर के महाराजा ने भी एक संदेश भेजा।

संदेशवाहक ने कहा, ‘ आप को महाराजा ने बुलवाया है।

त्यागराज – क्यों किस लिए ?

संदेश वाहक – आप को सम्मानित करने के लिए और आप को एक अच्छा पद देने के लिए।‘ त्यागराजा – ‘मैं तो राम भक्त हूँ, राम ने मुझे पहले से ही सम्मानित किया हुआ है उस के सामने महाराजा के मान सम्मान क्या अर्थ।‘

संदेश वाहक – ‘आप को राज्य की ओर से पद प्रतिष्ठा दी जाएगी”।

त्यागराज  – ‘मेरे लिए धन मनुष्य की प्रगति में एक बाधक तत्व है। इस से मनुष्य को कोई सुख नहीं मिलता। बैठो, मैं तुम्हें एक पद सुनाता हूँ।‘

इस के बाद त्यागराज ने ‘पदवी नी सदभक्ति’ नाम का शलक भैरवी राग में निबद्ध एक पद सुनाया। मन की वह स्थिति जिस में आप राम के प्रति पूर्णतया समर्पित हो जाएं, वही वास्तविक पदवी है। इस के बाद त्यागराज ने संदेश वाहक के सामने कुछ प्रश्न रखे –

दुनिया में ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो वेदों शास्त्रों और पुराणों को तोते की भांति रट लेते हैं। लेकिन इन ग्रन्थों की अंतर्निहित भावनाओं से विमुख रहते हैं । क्या आप उन्हें वास्तविक साधक मानेंगे।
इसी प्रकार इस संसार में अनेक व्यक्ति ऐसे हैं जिनके पास अथाह संपत्ति, पत्नी, बच्चे और भौतिक सुख के साधन हैं। वे महाराजा के मित्र भी हो सकते हैं। क्या आप उन्हें वास्तविक साधक मानते हैं ?
इसी  प्रकार इस संसार में ऐसे भी अनेक व्यक्ति हैं जो समाज के प्रतिष्ठित पदों पर आसीन हैं लेकिन उन के जीवन में अत्यधिक कलुषता है, अज्ञानता है, विरोधाभास है। क्या आप उन्हें वास्तविक साधक मानेंगे?
आप अपने स्वास्थ्य के लिए क्या पसंद करेंगे? मानसी गंगा में डुबकी लगाना अथवा भ्रष्टाचार के कीचड़ में लिप्त होना? क्या आप एक धनिक व्यक्ति की प्रशस्ति करना चाहेंगे अथवा सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, परम अनुग्रही ईश्वर का दासत्व?
संदेशवाहक बिना कुछ कहे चला गया।

त्यागराज गृहस्थ होते हुए भी राम भक्ति के प्रति समर्पित थे। 21 वर्ष तक इन्होंने सतत राम षडक्षरी का जाप किया और 1808 तक राम नाम का जाप 96 करोड़ बार हो चुका था। इस घटना के पीछे भी एक घटना प्रसिद्ध है। एक बार जब त्यागराज भगवत भजन में लीन थे तो उन के द्वार पर सन्यासी राम कृष्णानंद आए। त्यागराज दंपति ने उस समय घर में उपलब्ध फलाहार से उन का यथोचित सत्कार किया। सन्यासी ने उन्हें आशीष वचन कहे। त्यागराज ने सन्यासी से आने का उद्देश्य पूछा। उन्होंने कहा, ‘योगी राज आप जैसे महान सन्यासी किसी गृहस्थ के घर निरुद्देश्य नहीं जाते। और कुछ नहीं तो आप मुझे गुरु मंत्र ही दे दें जिस से मुझे इस संसार में कुछ दिशा निर्देश मिल सके।‘  सन्यासी रामाकृष्णानंद ने कहा, ‘राम मंत्र का जाप एक करोड़ बार करो। श्री राम तुम्हारा कल्याण करेंगे।‘

त्यागराज ने प्रति दिन 1,25,000 बार जाप करने का निश्चय किया। 38 वर्ष तक की आयु तक उन्होंने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया। राम की कृपा से उन्हें वचन सिद्धि हो गई थी अर्थात वे जो कुछ भी कहें, वह सत्य हो जाता था। रात्रि में सोते समय भी इन के मुख से राम का ही नाम निकलता था। संगीत इन की साधना थी। सरगम के सात स्वरों में इन्हें भगवद् दर्शन होते थे। इन का कहना था, ‘संगीत के स्वर मुझे ईश्वर के दर्शन कराते हैं। मैं शंकर के प्रति नत मस्तक हूँ जो नाद के अधिष्ठाता हैं। मैं सब वेदों में सामवेद को सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।‘ त्यागराज भक्त प्रह्लाद भक्त ध्रुव राम भक्त हनुमान और ऋषिवर नारद के भी उपासक थे क्योंकि इन के माध्यम से इन्हें भगवद् भक्ति का मार्ग मिला। ये सब सभी देवों के सच्चे उपासक थे। ‘मैं इन की भक्ति का प्रसाद चाहता हूँ।‘

1827 में इन के साठ साल की आयु के अवसर पर इन के शिष्यों ने इन की षष्ठी पूर्ति का समारोह आयोजित किया।

अप्रैल 1830 में त्यागराज तिरुपति के दर्शन के लिए गए। जब ये वहाँ पहुँचे तो मंदिर के कपाट बंद हो चुके थे। उदास मन से इन्होंने वहाँ बैठ कर पद गायन शुरू कर दिया। इन के गायन को सुन ने के लिए भीड़ एकत्रित हो गई। लोगों ने देखा कि मंदिर के कपाट स्वयं ही खुल गए। इन का मन अत्यधिक भाव विभोर हो गया और इन्होंने ‘वेंकटेश नीणु सेविय’ पद गाया ।

तिरुवैयारू लौटते समय ये चेन्नई के कोवुर मठ में ठहरे। यहाँ ये कोवुर सौन्दर्य मुदालियर के साथ रहे। इस के बाद इन्होंने विरजा कुप्पियर के साथ रहते हुए ‘तिरुवेत्रीयूर पंचरत्न’ की रचना की। अपने शिष्य लाल गुड़ी रमेय्या के अनुरोध पर इन्होंने ‘लाल गुड़ी पंचरत्न’ की रचना की। ऋषि नारद की स्तुति में इन्होंने पाँच कृतियों की रचना की। अक्तूबर 1839 में ये अपनी यात्रा समाप्त कर तिरुवैयारू पहुँचे। वहाँ इन से मिलने गोपाल कृष्ण भारती आए।

कहते हैं 27 दिसंबर 1846 की मध्य रात्रि में भगवान राम इन के स्वप्न में आए और इन से दस दिन बाद अपने धाम आने की बात कही। दूसरे दिन एकादशी भजन चर्चा में इन्होंने यह बात अपने शिष्यों से कही। तदनुसार 6 जनवरी 1847 का दिन इन के लिए मोक्ष प्राप्ति का दिन माना गया। 5 जनवरी को इन्होंने विधिवत सन्यास की घोषणा कर दी। इन्होंने अपना नाम ‘नाथ प्रेमयान्तर’ घोषित किया। 6 जनवरी को इन्होंने अपनी महायात्रा के लिए प्रयाण किया। इन का अंतिम संस्कार एक सन्यासी के अनुसार कावेरी नदी के तट पर किया गया। उस स्थान पर वृन्दावन धाम की स्थापना हुई और वहीं पर एक तुलसी पौधे का रोपण किया गया। यह स्थान तंजावुर से केवल सात मील दूर है।

संत त्यागराज ने अनेक कृतियों की रचना की। यश गान की शैली में इन्होंने दो नाटक भी लिखे। अपनी पदावली की रचना में इन्होंने लगभग 200 रागों का उपयोग किया। पंचरत्न कृतियाँ इन की सर्वाधिक प्रिय कृतियाँ हैं। दिव्य नाम और उत्सव संप्रता कृतियाँ मधुर गायन की कृतियाँ हैं। इन के लिए संगीत नाद उपासना जैसा था।

त्याग राज ने दक्षिण भारत के सांस्कृतिक विकास में विशेष योगदान दिया। विभिन्न रागों में निबद्ध इन की कृतियाँ आज भी संगीत साधकों के लिए अमूल्य धरोहर हैं। तिरुवैयारू में जनवरी – फरवरी मास में त्यागराज की स्मृति में ‘त्यागराज आराधना’ के नाम से वार्षिक संगीत मनाया जाता है। इस में कर्नाटक पद्धति के देश के शीर्षस्थ संगीतज्ञ भाग लेते हैं। आकाशवाणी से इस प्रकार त्यागराज की स्मृति में हर वर्ष संगीत समारोह आयोजित होता है।

राम वंदना में गोस्वामी तुलसी दास कहते हैं –

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥

(भावार्थ:-जगत में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलों की सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ ॥ श्री राम चरित मानस – बाल कांड ।।)

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