युवा शक्ति  को दिशाहीन होते देखकर देश के ‘कर्णधारों’ को चिंता क्यों नहीं ?

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लक्ष्मीकांता चावला

जबसे शिक्षा-दीक्षा के साथ संबंध जुड़ा, तब से यही सुना है कि विद्यार्थी देश का भविष्य हैं। जवानी देश की वर्तमान भी है भविष्य भी। युवा शक्ति के लिए यह भी कहा जाता है कि जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है। आज समझ नहीं आ रहा कि जवानी को दिशाहीन होते देखकर देश के कर्णधारों को चिंता क्यों नहीं। सच तो यह है कि जवानी दिशाहीन नहीं, जिन्होंने जवानी को दिशा देनी है उनका लक्ष्य केवल सत्ता और धन है।

पिछले दिनों तीन विशिष्ट व्यक्तियों के मुख से सुना कि अब अपने देश में बच्चों का भविष्य क्या है। ये तीनों वे हैं, जिनकी युवाओं का भविष्य बनाने में भूमिका है। देश के युवकों को देश में ही रहने की प्रेरणा देते हैं। जिन व्यक्तियों से ये निराशाजनक वाक्य सुने, उनमें से एक वर्तमान सांसद, एक वर्तमान विधायक और वर्तमान सरकार का वरिष्ठ अधिकारी भी है। इन तीनों से ही जब उनके बेटे-बेटियों की बात की गई तो एक ने बड़ी शान से कहा आइलेट पास कर लिया है बेटी ने, विदेश जाएगी। एक सांसद बड़े निराश थे कि लॉकडाउन के कारण विदेश से वापस आए बेटे जा नहीं पा रहे। आखिर तो उन्हें जाना ही होगा। यहां जवानी का भविष्य क्या है। एक उच्चाधिकारी बहुत प्रसन्न थे कि उनके दोनों बेटे दुनिया के शक्तिशाली देश में रोटी-रोजी बड़ी शान से कमा रहे हैं। बिना सिफारिश ही उन्हें वहां नौकरी मिल गई।

सबसे कष्टदायक वाक्य वह रहता है जब उच्चाधिकारी, जनप्रतिनिधि और आम जन भी यह कहते हैं कि देश का सिस्टम खराब है। इसलिए यहां कोई तरक्की नहीं कर सकता या रिजर्वेशन के कारण बहुत से बच्चे आगे बढ़ने से वंचित रह जाते हैं।

हाल ही में जब पंजाब सरकार ने विधायकों के बेटों को ही सरकारी नौकरी में बिना किसी साक्षात्कार लिखित परीक्षा के सीधे अफसर बना दिया, तो व्यापक जनाक्रोश के चलते मनमाफिक मंसूबों पर आंच आई। पंजाब कैबिनेट में कुछ मंत्रियों ने भी इसका विरोध किया। सवाल तो यह है कि जब यह खुला पक्षपात देश की जवानी के साथ किया जाता है तो शेष युवक-युवतियों अपना भविष्य इस सिफारिशी सिस्टम से दूर दुनिया के विभिन्न देशों में देखते हैं। हर वर्ष देश के हजारों बेटे-बेटियां निश्चित ही भारी मन से अपनी मातृभूमि से दूर जाकर कहीं वैध तरीके से और कहीं अवैध तरीके से दूसरे देशों में धक्के भी खाते हैं, बस भी जाते हैं। जिनके बच्चों को वहां का स्थायी निवासी मान लिया जाता है, उनके माता-पिता बच्चों के वियोग की पीड़ा सहते हैं।

आज देश में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सिफारिश तंत्र से सताए देश के बच्चे हजारों मील पार ही अपना भविष्य सुरक्षित समझते हैं। राजनीति की दुकानें सजाने के लिए बहुत से राजनेता नशों के सौदागरों का संरक्षण करते हैं और यही नशे देश के बच्चों को दलदल में फंसाकर अपराधों की दुनिया में ले जाते हैंै। आवश्यकता तो यह है कि आज की सरकारें भी महलों की दुनिया से बाहर निकलकर अपनी आंखों से अपने देश के लोगों की हालत को देखें। जिस देश के शासक कभी नशों की दलदल में फंसी नई पीढ़ी के नजदीक जाकर उनकी व्यथा को नहीं समझेंगे और नशा तस्करों को संरक्षण देंगे, वहां युवा पीढ़ी नशे से कैसे मुक्त हो सकेगी? कैसे भारत का वर्तमान और भविष्य बन सकेगी?

कुछ वर्ष पूर्व नशा तस्करों और नशेड़ियों को पकड़ने की मुहिम चलाई गई। हजारों लोग नशे बेचने का आरोप लगाकर जेलों में धकेल दिए गए। प्रतिदिन नशेड़ियों को पकड़ने का एक निश्चित कोटा भी दिया गया, फलत: वे लोग भी कानून के पंजे में जकड़े गए जिन्होंने कभी नशा खरीदा बेचा और खाया भी न था। चुनाव आने पर ऐसे मुद्दों की चिंता चुनावी समर के योद्धा करते हैं और सत्तासीन होते ही वादे भूल जाते हैं। विडंबना है कि जो देश के बच्चे पहली बार अपराध करते हैं उनको सुधारना, सही दिशा देना नेताओं का दायित्व नहीं बनता।

स्वतंत्र भारत में आचार्य विनोबा और जय प्रकाश नारायण ने बड़े डाकुओं को भी आत्मसमर्पण करवाकर डाकू समस्या का हल करने में सहयोग दिया था। मगर आज की राजनीति समस्या पैदा करने और उसके नाम पर वोट लेने की है, सुलझाने की नहीं। अफसोस है कि देश की राजनीति से कोई आशा की किरण दिखाई नहीं दे रही। देश के बुद्धिजीवियों और जो सचमुच दूसरों की पीड़ा समझने वाले संत और गांधीजी की परिभाषा के अनुसार वैष्णव जन हैं उन्हें ही यह अभियान संभालना है, कि देश की जवानी को भ्रष्टाचार, अनाचार, सिफारिश तंत्र से बचाया जाये। ताकि भारत के बेटे-बेटियां भारत में ही विश्वास के साथ रह सकें। वैध-अवैध तरीकों से विदेश जाने की होड़ में न लगें। शिक्षा और धन प्राप्ति के लिए विदेश जाने की चर्चा हमारे ग्रंथों में है, पर जो यह कहकर जाएगा कि वह भ्रष्ट-सिफारिश तंत्र से दुखी होकर जा रहा है, वह यहां कैसे आएगा? वे कैसे गाएंगे—ए मेरे प्यारे वतन तेरे दामन से जो आएं उन हवाओं को सलाम।

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