भाजपा की धमक व धमाकेदार उपस्थिति से हिल गया है तृणमूल कांग्रेस का किला

 

सुरेश हिन्दुस्थानी

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की मर्यादाएं कितनी टूट रहीं हैं और कितनी संवर रही हैं, यह चिंतन का विषय हो सकता है। लेकिन जो राजनीतिक गहमागहमी का वातावरण बना है, वह निसंदेह सभी राजनीतिक दलों को आत्म मंथन करने के लिए बाध्य कर रहा है।

पश्चिम बंगाल सहित देश के पांच राज्यों में चुनावी घमासान चरम पर है। एक तरफ राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ताल ठोंककर अपने पुराने अंदाज में दिखाई दे रही हैं तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज राजनेता बंगाल में नए अवसरों की तलाश कर रहे हैं। नए अवसर इसलिए भी कहे जा सकते हैं, क्योंकि बंगाल में भाजपा के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। हालांकि लोकसभा के चुनावों में भाजपा ने प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराकर तृणमूल कांग्रेस की सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती पैदा की है। इसी कारण ममता बनर्जी के सामने कुछ असमंजस भी प्रादुर्भित हुआ है। बंगाल की राजनीति के वर्तमान हालातों को देखकर यह कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ममता बनर्जी की पार्टी किसी भी स्तर पर जाकर सत्ता को हाथ से जाने देना नहीं चाहती।

जहां तक लोकसभा चुनाव परिणामों की बात है तो यह स्वाभाविक ही है कि यह चुनाव केंद्र की सत्ता के आसपास ही घूमते हैं, कुछ अपवाद हो सकते हैं। इसी प्रकार विधानसभा चुनावों को राज्य की सत्ता प्रभावित करती है। मतदाता प्रादेशिक मुद्दों को ध्यान में रखकर मतदान करता है। इसलिए भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के दावों को कतई हल्के में नहीं लेना चाहिए। बंगाल के राजनीतिक हालात यह बताने के लिए काफी हैं कि सत्ता के शिखर पर भाजपा या ममता दोनों में से कोई एक बैठेगा।

वर्तमान में राजनीति का मार्ग लगभग परिवर्तित हो चुका है। आज भले ही केंद्र में सत्ता का सिंहासन संभालने वाली भाजपा नीत सरकार ने अपने स्तर पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने की दिशा में अभिनव प्रयास किया है, लेकिन प्रादेशिक स्तर पर इसका ज्यादा असर नहीं है। आम जनता इस भ्रष्टाचार के कारण अब इससे मुक्ति चाहती है। आज की राजनीति के बारे में यकीनन यही कहा जा सकता है कि वह जन सेवा के रास्ते से भटक चुकी है और एक प्रकार के व्यापार में परिवर्तित होती जा रही है। इसका मुख्य कारण खर्चीली चुनाव प्रणाली है, जिसमें कहने को लाखों रुपए का व्यय होता है, परंतु कहीं कहीं यह व्यय अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों में भी चला जाता है। हालांकि इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता, लेकिन यह आज की सच्चाई है। पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक कदाचरण की घटनाएं हुई हैं। आरोप तो यह भी है ममता बनर्जी ने अपने पारिवारिक सदस्यों को नीति निर्धारक की भूमिका में स्थापित कर दिया है। इसे भी राजनीतिक और लोकतंत्र की मर्यादा का चीरहरण कहा जा सकता है यानि सीधे शब्दों में यह राजनीतिक भ्रष्टाचार की कहानी को ही उजागर करने वाला है।

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की मर्यादाएं कितनी टूट रहीं हैं और कितनी संवर रही हैं, यह चिंतन का विषय हो सकता है। लेकिन जो राजनीतिक गहमागहमी का वातावरण बना है, वह निसंदेह सभी राजनीतिक दलों को आत्म मंथन करने के लिए बाध्य कर रहा है। बंगाल में भाजपा की लोकप्रियता और विरोधी दलों में संकुचन का भाव भी परिलक्षित हो रहा है। कांग्रेस और वामदलों की जुगलबंदी इसका प्रमाण है। ये दोनों दल भले ही सत्ता की पहुंच से दूर हों, लेकिन इनका इतना प्रयास जरूर रहेगा कि सत्ता के नियंत्रण की चाबी अपने पास ही रखना चाहेंगे। यानि इनका पूरा प्रयास यही होगा कि बहुमत किसी को न मिले, ऐसे में अगर त्रिशंकु जैसी स्थिति निर्मित होती है तो स्वाभाविक रूप से यह दोनों दल भाजपा को रोकने के लिए ममता को समर्थन दे सकते हैं। लेकिन यह भी तय-सा लग रहा है कि इन दोनों दलों को जो भी मत प्राप्त होंगे, उससे तृणमूल कांग्रेस को ही नुकसान होगा।

पिछले दो वर्ष से सत्ता का संचालन कर रहीं ममता बनर्जी की किले बंदी पांच वर्ष पहले जैसी नहीं है। उनके किले की दीवारों हिल चुकी हैं। उसकी महत्वपूर्ण ईंटें भाजपा की दीवार में मजबूती से फिट हो चुकी हैं। इससे यही संदेश जा रहा है कि भाजपा ने लोकसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस में जो सेंध लगाई है, उससे वह बहुत शक्तिशाली बनकर ममता के सामने एक बड़ी चुनौती बन गई है। बंगाल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठ रहा है कि घुसपैठ करके आए मुसलमान किधर जाएंगे। इन मतों को ममता बनर्जी अपनी पार्टी के लिए पक्का मानकर चल रहीं हैं, लेकिन इस मसले पर कांग्रेस और वामदल भी पीछे रहने वाले नहीं हैं। यह दोनों दल भी किसी न किसी रूप में मुसलमानों के हितैषी होने का दावा करते दिखाई देते हैं। तीसरे ओवैसी भी अपने पूरे तामझाम के साथ चुनाव मैदान में ताल ठोकने को आतुर दिखाई दे रहे हैं। इन्होंने भी बांग्लादेशी घुसपैठियों के पक्ष में अनेक बार बयान दिए हैं।

ऐसी स्थिति में बंगाल का चुनाव राजनीतिक चक्रव्यूह में उलझता जा रहा है। ममता बनर्जी की परेशानी भाजपा का बढ़ता प्रभाव तो है ही, साथ ही कांग्रेस, वाम और ओवैसी भी हैं। क्योंकि यह दल ममता को ही कमजोर करेंगे, जिसके चलते भाजपा को जबरदस्त फायदा मिल सकता है। इसके बाद सत्ता के विरोध में भी वातावरण रहता ही है, यह भी ममता के माथे पर पसीना ला रहा है। चुनाव में कौन बाजी मारेगा, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन बंगाल में चुनाव बड़ा दिलचस्प होगा।

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