एक दूसरे के पूरक हैं

खुलापन और खुला दिल

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

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व्यक्ति का अन्तर्मन और परिवेश हर मामले में साम्यता रखता है। जिस किसी का मन जिन विचारों और वस्तुओं को पसंद करता है उसी के अनुरूप रूप-रंग और वैचारिक धरातल वह बाहर चाहता है। कई बार बाहरी उद्दीपनों से प्रभावित होकर मन में कल्पनाओं का निर्माण होता है लेकिन ऎसा बहुधा कम ही होता है।

आम तौर पर होता यही है कि आदमी जो कुछ करता है, जो कुछ देखना, दिखना या दिखाना चाहता है वह उसके मन के भीतर समाहित कल्पनाओं के अनुरूप ही होता है। कुछेक लोेग ही ऎसे हुआ करते हैं जो सभी दृष्टियों से मुक्त होते हैं उनके लिए यह बंधन नहीं होता। लेकिन अधिकांश लोगों की मनोवृत्तियां, व्यवहार और लक्ष्य उनके मन में संचित वैचारिक बीजों के अनुकूल ही होते हैं और ऎसे में उनके हर कार्य में मन के भावों को आकार लेते हुए सहज ही देखा जा सकता है।

आदमी वही बोलता, खाता-पीता और पहनता तथा लोक व्यवहार करता है जैसी उसकी मौलिकता होती है। यही कारण है कि हर व्यक्ति के रहन-सहन का ढंग जुदा-जुदा होता है और उसे सुकून भी वहीं मिलता है जहाँ उसके मन के अनुरूप सब कुछ हो, अन्यथा वह कुढ़ने लगता है और मनमाफिक स्थितियों को पाने के लिए निरन्तर प्रयासों में जुटा रहता है।

जहाँ कहीं उसे मनोनुकूल स्थिति प्राप्त हो जाती है वहाँ वह स्थायित्व पाने की कोशिश में बना रहता है। कुछ लोगों को खास प्रकार का खान-पान, परिधान, जीने की स्टाईल रंग-रूप और बिम्ब ही पसंद आते हैं और उन्हें ये नहीं मिलें तो वे कुलबुलाने की स्थिति में आ जाते हैं। इसी प्रकार व्यक्ति के स्वभाव के अनुरूप उसकी पूरी जीवनचर्या ढल जाती है।

संकीर्ण और संकुचित सोच तथा दायरों के आदी लोगों की पसंद संकीर्ण स्थानों, अंधेरे कमरों तथा अपने आप में सिमटे रहने की होती है जबकि जो खुले दिल के होते हैं उन्हें बंद कमरों की बजाय खुले स्थान ज्यादा पसंद आते हैं और उनको कक्ष में सूरज की रोशनी का आवाहन भी ज्यादा पसंद होता है। जो भी लोग बंद कमरों में ही बने रहने के आदी होते हैं वे अपने आप में संकीर्ण मानसिकता के होते हैं।

किसी भी व्यक्ति के रहने और काम करने के स्थान को देखकर उसके मन की कल्पनाओं और वैचारिक धरातल के मुक्त व्यवहार को अच्छी तरह भाँपा जा सकता है। प्रथम दृष्टया किसी भी व्यक्ति के आवास या कार्यस्थल को देखकर उसके दिल के खुलेपन और मुक्तजीवी व्यक्तित्व के सारे पहलुओं को जाना जा सकता है। किराये के मकान, दूसरों के दफ्तर या पराश्रित जीवन जीने वाले लोगों के लिए विवशता हो सकती है लेकिन खुद के मकान, प्रतिष्ठान आदि को देखकर उन्हें बनाने वाले या उनमें रहने वाले लोगों के बारे में अंदाज लगाना मुश्किल नहीं होता।

जो लोग भीतर से मुक्त और खुले हुए तथा खाली होते हैं वे हमेशा खुलापन चाहते हैं और उन्हें अपने आस-पास खुला स्थल पसंद होता है। खुले दिल के लोगों को छोटे-छोटे कमरे, परिसर और संकीर्णताएं कतई पसंद नहीं आती और वे संकीर्ण स्थलों में रहते हुए खूब कुलबुलाते हैं और जब कभी मौका मिलता है खुले स्थल में आने-जाने और रहने को उत्सुक रहते हैं। इन लोगों को भ्रमण करते रहना खूब प्रिय होता है।

इसी प्रकार परिवेश में जहाँ जिन इलाकों में या जिन लोगों के मकानों के आगे या आस-पास अपेक्षा के अनुरूप खुली जगह हुआ करती है वहाँ के लोगों में एक अलग ही प्रकार का खुलापन और मस्ती दिखाई देती है। आजकल जमीन पाने, रखने और बेचने के मोह में न कहीं खाली जगह बची है न गली-कूचे का कोई नुक्कड़। ऎसे में हालात ये हो गए हैं कि सभी जगह से खुलापन गायब दिखता है, और इसी अनुपात में खुले दिल के लोगाें की कमी होती जा रही है।

इस स्थिति का सर्वाधिक खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ रहा है जो जन्मजात एवं मौलिक रूप से खुले दिल के हैं और विस्तृत परिसर में रहना और काम करना चाहते हैं लेकिन आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक कारणों से उन्हें उनके मुताबिक परिवेश प्राप्त नहीं हो पाया है। जो लोग जीवन का वास्तविक आनंद पाना चाहते हैं उनके लिए यह जरूरी है कि वे खुले दिल वाले और खाली रहें।

यह तभी संभव है जबकि हमारी दृष्टि परिधि संकीर्ण दायरों में बंधी न रहे और हम ऎसे स्थान पर काम करें या रहें जहाँ हमारे आस-पास खुले परिसर की कोई कमी नहीं रहे। यही कारण है कि आदमी को सुकून पाने के लिए आजकल संकीर्ण बस्तियों से दूर खुली जगहों पर जाना पड़ता है। यह इस बात को इंगित करता है कि इंसान को हमेशा खुलापन चाहिए और जहाँ उसे खुलापन मिलेगा, वह स्वयं के खुले और मुक्त होने का आनंद प्राप्त करेगा।

खुला दिल रखें या अपने आस-पास खुली जगह रखना पसंद करें, इन दोनों में से एक होने पर जीवन का आनंद अपने आप मिलने लगेगा। दीवारें हमें दायरों में बाँध कर खुलेपन की स्थितियों को समाप्त करती हैं। आजकल चारों तरफ जो मानवी संकीर्णताएं दिखाई दे रही हैं उन सभी का मूल कारण हमारे आवासीय एवं वाणिज्यिक परिसरों की दीवारों का सटा-सटा होना ही है।

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