पुस्तक समीक्षा : अखिल भारतीय साहित्य परिषद का इतिहास

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           यदि कुछ धार्मिक, पूजनीय, एतिहासिक ग्रंथों को छोड़ दिया जाये तो बहुत कम पुस्तकों के विषय मे यह कहा जा सकता है की यहपुस्तक व इसके लेखक एक दूजे के पर्याय है। या, यह कहा जा सकता है की यदि पुस्तक को इस लेखक ने नहीं लिखा होता तो कोई अन्य लेखक इस पुस्तक को लिख ही नहीं सकता था। इस पुस्तक “इतिहास” मे अखिल भारतीय साहित्य परिषद के आद्ध्योपांत परिचय को पढ़ने के दौरान परिषद व लेखक दोनों ही एकाकार, एकात्म व एकरस दृश्यगत होते हैं। इस पुस्तक के संदर्भ मे निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि एक सतत 20 वर्षीय कर्ता व साक्षी दोनों होने के नाते यदि श्री श्रीधर जी पराड़कर ने इस पुस्तक को नहीं लिखा होता तो कोई अन्य इस पुस्तक को इस भाव से नहीं लिख सकता था। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के जन्म उपरांत इस संस्था को जितना समय, ध्यान व समर्पण श्री श्रीधर जी ने दिया है उस दृष्टिगत स्पष्ट प्रतीत होता है कि लेखक ने इस पुस्तक के लेखनकार्य मे प्रसव पीड़ा से कुछ अधिक पीड़ा का आभास करके ही इस लेखन कार्य को पूर्ण किया होगा। 
           पुस्तक के दूसरे अध्याय मे लेखक ने पुरोवाक मे लिखा है, कार्यकर्ताओं ने जो किया है वह बताते नहीं अतः वृत्त असंभव होता है और सटीक वृत्त के बिना इस पुस्तक को लिखना दुष्कर बन पड़ा होगा यह भी स्पष्ट है। लेखक ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए लिखा है; वे उनको सौंपा हुआ कार्य अपनी ओर से अच्छे ढंग से करते हैं, सामर्थ्य व क्षमता से कहीं अधिक काम करने का प्रयास करते हैं। उनका पूरा ध्यान संस्था के विकास व भलाई पर ही रहता है। पर, अपने किए का गुणगान उनके स्वभाव मे नहीं होता। नियम कानून उनके लिए गौण होते हैं, इस कारण काम का लेखा जोखा भी वे नहीं रखते। इससे संस्था का कार्य व व्याप तो बढ़ता है किंतु उसे बताने वाला कोई नहीं होता फलस्वरूप इतिवृत्त लिखना असंभव हो जाता है। तो, लगभग 55 वर्षों के तितर, बितर, यहाँ वहाँ पड़े हुये इतिहास को लोगों से समेटना, उनसे दृश्य, श्रव्य अनुभवों को एकत्रित करना व प्रामाणिक इतिहास लिख लेना एक दुरुह, दुष्कर व दू:भर कार्य ही था जो इस पुस्तक के रूप मे संपन्न, संपादित हुआ है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक आनुषांगिक संगठन के रूप मे बीच बीच मे जितनी राजनैतिक, प्रशासनिक दबावों प्रतिबंधों को संघ ने झेला उन सभी को निश्चित ही परिषद ने भी अनूभूत किया है। आपातकाल के प्रतिबंधों, दबावों, कंटकों मे कितने ही कार्यकर्ताओं ने अपनी डायरी, वृत्त, लेखन, अनुभवों को अग्नि को समर्पित कर दिया  फस्वरूप “इतिहास” लिखने मे हुई कठिनाइयों को किसी आपदा से कम तो नहीं ही कहा जा सकता है। आपातकाल के अनुभवों के इस पक्ष से उपजी सांसारिक प्रकार की व्यथा, वेदना से इतर इस प्रकार की पीड़ा व कसक का एक अच्छा परिचय इस पुस्तक मे मिलता है। 
           अश्विन शुक्ल द्वादशी विक्रमी संवत 2023 तदानुसार 27 अक्टूबर 1966 को स्थापित अखिल भारतीय साहित्य परिषद के इतिहास नामक इस पुस्तक मे जितना कथ्य है उससे कहीं बहुत अधिक, शतगुणित अकथ्य भी है,जो पुस्तक को पढ़ने के दौरान पाठक के मन-मानस मे किसी चलचित्र की भांति सतत चलता रहता है। कथ्य पर अकथ्य के भारी पड़ने के कारण ही इस पुस्तक को पढ़ने हेतु केवल एक पाठक की दृष्टि की आवश्यकता नहीं पड़ती अपितु उससे कहीं बहुत अधिक एक परिवार भाव की दृष्टि से और एक स्वयंसेवक की दृष्टि से पढ़े बिना इस पुस्तक के अंतर्तत्व को समझना असंभव हो जाता है। 
             वर्ष 1964 मे श्री जीतसिंह जीत व आनंद जी आदीश द्वारा बनाई गई भूमिका से जन्म की ओर अग्रसर संस्था अखिल भारतीय साहित्य परिषद का इतिहास लिखने मे संभवतः लेखक ने प्रत्येक महत्वपूर्ण ज्ञात व्यक्ति का इसमें नाम लिखा है, अज्ञात का स्मरण किया है व लाखों कार्यकर्ताओं का मनस्वी स्मरण किया है। संस्था के दायित्ववानों की चर्चा के अतिरिक्त महत्वपूर्ण घटनाओं की बात की है। सतत, निरंतर होते संस्थागत आरोह, अवरोह; बनती, सुधरती परम्पराएं, कार्यक्रम, यात्राक्रम, संगोष्ठियाँ, विदेश यात्राएं, प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रकाशन,  सम्मेलन, सम्मान, अधिवेशन, बैठकें, प्रस्ताव आदि सभी का अवधूत रूपी चिंतन, स्मरण इस पुस्तक मे है। कहना न होगा कि एक स्वयंसेवक के रूप मे पढ़ने पर यह संस्था, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, हम कार्यकर्ताओं के लिए एक संस्था से बढ़कर एक यती, मुनि, साधक, वृती, अवधूत के रूप मे स्थापित होती चली जाती है। 
             आधी सदी के संस्थागत इतिहास को लिखते लिखते लेखक श्री श्रीधर जी अपने 20 वर्षीय राष्ट्रीय संगठन मंत्री के कार्यकाल को लिखने जैसा कार्य भी करना पड़ा है। लेखक ने यह कार्य बड़ी ही निस्पृहता से कर दिया है। लेखक ने अपने 20 वर्षीय साथी कार्यकर्ताओं की “श्री” का वर्णन तो माध्यम होने के भाव से किया है किंतु “श्रीधर” को श्री नहीं धरने दिया है। श्रीधर जी संघ के वरिष्ठतम प्रचारको मे से एक हैं अतः यह अपेक्षित तो था किंतु 20 वर्षीय कार्यकाल वाले राष्ट्रीय संगठनमंत्री की कुछ अधिक ही उपेक्षा उन्होने इस पुस्तक मे की है। इस उपेक्षा को परिषद पर लिखी जाने वाली किसी अन्य पुस्तक मे कोई अन्य लेखक पूर्ण करेगा, जिसकी प्रतीक्षा रहेगी। 
            एक बात जिसे अवश्य ही लिखना होगा की इस पुस्तक का लेखन भाव एक पिता द्वारा अपनी माँ का परिचय अपने बच्चों से कराने जैसा है। श्री श्रीधर जी अपने सम्पूर्ण लेखन मे परिवार भाव से अपने बच्चों (कार्यकर्ताओं) का परिचय अपनी माँ (अभासाप) से गरिमामयी रीति नीति से कराते चले जाते हैं। 
               अभासाप द्वारा की गई संगोष्ठियों, प्रकाशनों, यात्राओं व व्याख्यानों की श्रीचर्चा बड़ी दीर्घ व विस्तार वाली है। यद्द्पि इस पुस्तक का  परिचय इन श्रंखलाबद्ध नियमित कार्यक्रमों के बिना अधूरा ही माना जाना चाहिए तथापि संगठन के परिवार भाव की चर्चा से इस समीक्षा को यहाँ पूर्ण माना भी जा सकता है। इति, इतिहास।

– प्रवीण गुगनानी    

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