हिंदू धर्म के दिग्विजय व्याख्याता युगद्रष्टा विवेकानंद और उनका हिंदुत्व दर्शन-4

दिनेश चंद्र त्यागी
गतांक से आगे…
शून्य और 1 से 9 तक की गिनती सर्वप्रथम भारत में ही आविष्कृत हुई। यहां से यह गणित विज्ञान अरब देशों में गया जहां इन्हें आज भी हिंदसा कहा जाता है। दशमलब प्रणाली का आविष्कार भारत में ही हुआ। रूस वालों को कभी गिनती का ज्ञान नही था इसलिए I, II, III, IV, V, X, L, C  की सहायता से गिनतियों को अभिव्यक्ति दी गयी।
भारत में करोड के बाद अरब, खरब, नील, दस नील, पद्म, दस पद्म, शंख, दस शंख तक गिनतियां लिखी जाती हैं। पश्चिम वाले बनाएं आज भी उन पर क्या गणना है? लाख से दस लाख Millon, Billion and full stop.
पाइथागोरस का सिद्घांत सांख्य दर्शन से लिया गया। यूरोपियन गोरों के पूर्वज जंगलों में पेड़ों के पत्तों से तन ढककर रहते थे, कच्चा मांस खाते थे, तब भी उससे हजारों साल पहले यहां भारत में सभ्यता के सूर्य का पूर्ण प्रकाश उद्भासित हो चुका था। डेढ़ दो हजार वर्ष पुराना है यहूदी मजहब। यह है तुम्हारा इतिहास, इससे पहले का तुम्हारे पास कोई शब्द भी नही बन सका। बस Pre-historic Era कहकर संतोष करना पड़ा। हमारे पास सृष्टिï का १, ९७, २९, ४९०, ९७ वर्ष का एक एक दिन का हिसाब है।
यदि हमारे ऋषियों को अंतरिक्ष ज्ञान नही था तो तुमने Telescope के आविष्कार के बाद सूर्य की परिक्रमा करने वाली पृथ्वी के 12 तारा क्षेत्रों की राशियों (मीन, मेष, आदि) के नाम आज तक क्यों नही बदले?
तुम बाइबिल में 350 वर्ष पहले तक सूर्य को पृथ्वी के चारों ओर घुमाते रहे और जब गैलीलियो ने कहा बाईबिल गलत है, सूर्य स्थिर है, पृथ्वी घूमती है, तो तुमने उसे पत्थर मार मार कर मौत के घाट उतार दिया। यह है तुम्हारी आधुनिक वैज्ञानिकता। (बंगाल के सर जगदीश चंद्र बसु ने खोजा था बेतास का तार) Wireless तुमने चोरी करके मार्कोनी को नोबुल पुरस्कार दिलाया।
आज का विज्ञान प्राचीन भारतीय वैदिक धर्म की प्रतिच्छवि मात्र है। उपनिषदों का सूक्ष्म और स्थूल, व्यक्त और अव्यक्त अणोरणीयान महते महीयान के अनुसार विज्ञान की सभी खोजों से परे है, अकाट्य है। Law of Conservation of Energy (ऊर्जा संरक्षण का नियम) का सिद्घांत बताता है सृष्टि और स्रष्टा की दो समानान्तर अनादि अनंत शक्तियों का महत्व।
स्वामी जी के भाषण के चालीस वर्ष पश्चात Einstein आईस्टीन ने भी इसी सिद्घांत का प्रतिपादन किया-
Matter can be transformed inot  energy and energy can be transformed into mater  (द्रव्य का ऊर्जा तथा ऊर्जा का द्रव्य में रूपान्तरण संभव है)
भारतमाता, भारतीय दर्शन और विश्वधर्म
विश्व के सार्वभौम धर्म की स्थापना का शंखनाद जिस शिकागो सम्मेलन में हुआ, उसके लिए सर्वथा उपयुक्त मानव मात्र के लिए कल्याणकारी विचारों का जनक स्वामी जी ने हिंदू धर्म शास्त्रों एवं उसकी धरित्री भारत भूमि को ही उद्घोषित किया। इसीलिए उन्होंने आहवान किया कि भारत रहेगा तो हिंदू धर्म रहेगा, हिंदू धर्म रहेगा, तो विश्व धर्म के सिद्घांत भी सदैव सुरक्षित रहेंगे।
स्वामी जी ने अपने युवा संन्यासियों को आत्मनो मोक्षार्थ जगदहिताय च का आदर्श प्रस्तुत किया। मोक्ष के लिए मत जियो। दीन, दुखी, अज्ञानी, दरिद्र यही हमारे आराध्य देव हैं यही हमारे नारायण हैं। इनके लिए जियो।
विश्व भर में वेदांत का अद्वैत दर्शन नर की सेवा ही नारायण की सेवा के रूप में स्वामी जी ने प्रतिष्ठित किया जिसके लिए उन्होंने आह्वान किया एक हजार बलिदानी युवकों का जो अपना सर्वस्व इन शाश्वत सिद्घांतों के प्रचार में स्वाहा कर दें।
सीखते जाओ, सिखाते जाओ, उठो, जागो और तब तक मत रूको जब तक तुम्हारे लक्ष्य की प्राप्ति न हो यह था उनका पावन संदेश।
धन्य है यह भारत भूमि जिसने उनको जन्म दिया है धन्य है वे मनुष्य जो उस समय इस पृथ्वी पर जीवित थे, धन्य हैं वे कुछ लोग, धन्य, धन्य, धन्य जिन्हें उनके पादपद्मों में बैठने का सौभाग्य मिला था और धन्य है यह हिंदू धर्म जिसने संपूर्ण मानवता को एक अजेय धर्म सम्राट प्रदान किया।
(समाप्त)

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