ईश्वर की प्राप्ति के लिए करो धर्म का आचरण

images (17)

हम प्रतिक्षण अपने चारों ओर सृष्टि में परिवर्तन होते देखते हैं ।हम अपने जीवन में भी बचपन से युवावस्था युवावस्था से वृद्धावस्था में पहुंचते हुए परिवर्तन को देखते हैं तो हमको अनुभव होता है यह संसार क्षणभंगुर है । जो था वह नहीं रहा और जो है वह नहीं रहेगा । बस केवल एक मृग मरीचिका में हम जीवन जी रहे हैं । सच यही है कि मृत्यु हमारी ओर भागी हुई नहीं आ रही बल्कि हम ही मृत्यु की ओर भागे जा रहे हैं ।जन्म पर खुशी, वृद्धावस्था पर क्षुब्धता और मृत्यु पर शोक मनाते रहते हैं। कवि भर्तृहरि ने कितना अच्छा कहा है :–

परिवर्तनशील संसारे मृतः को वा न जायते ।
सा जातो येन जातेन याति वंश: समुन्नतिम ।।

इस परिवर्तनशील संसार में कौन उत्पन्न नहीं होता अथवा कौन मृत्यु को नहीं प्राप्त होता ? वस्तुतः वही मनुष्य जन्मा है जिसके उत्पन्न होने से कुल की उन्नति हुई है ,अर्थात कुल के यश की उन्नति हुई है ।
सचमुच जन्म उसी का सार्थक है जिस के पैदा होने से उसके परिवार ने, राष्ट्र ,समाज ने ,तथा स्वयं ने उन्नति की हो।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति प्रतिपल सृजन और विनाश के खेल में लगी रहती है जो जन्मता है उसका विकास अर्थात युवावस्था और फिर उसका विनाश अर्थात वृद्धावस्था के बाद मृत्यु निश्चित है।
अब इस परिवर्तन को कौन कर रहा है ? – प्रतिक्षण, इस नश्वर संसार का सृजन करता कौन है ?
जैसे माला के मनकों को धागा संभालता है , वैसे ही ईश्वर सृष्टि को संभालता है।
परमात्मा को चिन्मय अर्थात ज्ञान स्वरूप परब्रह्म कहते हैं। उस शक्ति को मरणमय कहते हैं , क्योंकि सृष्टि मरणशील है, विनाशवान है।
परंतु चिन्मय मरणमय को धारण किए हुए हैं। अर्थात उस चैतन्य रूपी चिन्मय का वास सर्वत्र है। यहां यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि सारे परिवर्तन मरणमय रूपी परिधि पर ही होते हैं , जबकि भीतर विद्यमान चिन्मय सदैव स्थिर रहता है।
इस तथ्य को परिपक्व व्यक्ति ही समझ सकता है कि चिन्मय अंदर विद्यमान हैं और मरणमय शरीर का एक दिन अंत होना है। क्योंकि मृत्यु अवश्यंभावी है। सामान्यत यह आत्मज्ञान मानव में विशेष वैचारिक लहर उत्पन्न नहीं करता, लेकिन गहनता से सोचने पर मृत्यु के अनुभव मानव को मौन बनाकर असहायता के भावों से भर देते हैं ।जीवन और मृत्यु मानव के लिए संसार के सबसे बड़े आश्चर्य हैं । जो कुछ व जैसी भी सब सारी गतिविधियां हैं ,सब जीवन के बीच में हैं।
जीवन के सभी क्रियाकलाप मृत्यु के भयभाव में अत्यंत तुच्छ लगने लगते हैं। जीवित व्यक्ति के परिपक्व विचारों में सर्वश्रेष्ठ सत्य मृत्यु ही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि एक मनुष्य जीवन भर इसी वैराग्य दर्शन में स्थिर रहे , परंतु मृत्यु और जीवन की क्षणभंगुरता का अनुभव सकारात्मकता के साथ मनुष्य की स्मृति में अवश्य रहना चाहिए। इस कटु सत्य के सतत चिंतन से मनुष्य में मानवीय गुण स्वाभाविक रूप से निरूपित होते हैं। व्यक्तित्व विस्तार के लिए ऐसा मानसिक व वैचारिक अभ्यास अवश्य होना चाहिए ।

मृत्यु संबंधी चिंतन मनन इसलिए भी होना चाहिए क्योंकि मानवता के शिखर पर इसी एकमात्र विचारधारा की सहायता से पहुंचा जा सकता है ।इसमें कमी आते ही हम निम्न स्तरीय जीवन और इसके निरर्थक विचारों से ओतप्रोत हो जाते हैं ।जीवन और मृत्यु का चिंतन हम यह सोचकर नहीं छोड़ सकते कि इससे जीवन हीनता व् दीनता से भर जाएगा। हम किसी की मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार में व्यस्त होते हैं। यह संस्कार मृत्यु उसकी कटुता को भूलने का ही एक भागवत उपाय है। इसका उद्देश्य है कि जीवित मानव अपने मानवीय धार्मिक कर्म करते हुए अपने जीवन के बारे में विचार करें। जीवन की नश्वरता और मृत्यु की शाश्वतता पर प्रत्येक मनुष्य को स्वयं केंद्रित होना चाहिए या उसे किसी धार्मिक जागरण के माध्यम से इस कार्य के लिए संकेंद्रित बनना चाहिए। इस संसार में व्याप्त हिंसा , वीभत्सता सहित समस्त जैविक दुर्गुणों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। जगत कल्याण के लिए मानवता , प्रेम , अहिंसा से संपोषित सामूहिक भावना की आवश्यकता हमेशा से रही है ।मृत्यु के विचार पर गंभीरता से आकर्षित होकर अहिंसा , प्रेम और परस्पर सद्भाव तीव्रता से फैल सकता है ।
धर्म ग्रंथों का उद्घोष है कि मनुष्य मात्र की उत्पत्ति आनंद के लिए हुई है तो मनुष्य को सुख पाने की अभिलाषा छोड़नी होगी और आनंद की तलाश करनी होगी। इसी आनंद और शांति की खोज के लिए मनुष्य भटकता है। जबकि आनंद स्वयं के अंदर ही है ।उसी के अवलोकन से वास्तविक आनंद प्राप्त होता है , क्योंकि सांसारिक पदार्थों का भोग और अनुभूति मात्र छलावा है , इसलिए परमानंद की प्राप्ति की तड़पन है। जिसको शाश्वत आनंद कहते हैं। शाश्वत आनंद की प्राप्ति के लिए ईश्वर की अनुभूति करनी आवश्यक है।
वेद के अनुसार जब ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा होगी तभी ब्रह्म की खोज संभव है । क्योंकि जैसे हाथी का मन हथनी की ओर, सती का मन पति की ओर, कृपण का मन धन की ओर और विषयी का मन विषय की ओर होता है उसी प्रकार जिस समय हमारा मन ईश्वर की ओर होगा उसी समय ईश्वर की अनुभूति एवं प्राप्ति होगी।
ईश्वर की प्राप्ति के लिए धर्म का आचरण करना होगा और धर्म केवल शुद्ध आत्मा में ठहरता है। परंतु शुद्ध आत्मा का दूसरा नाम अपने स्वभाव में रमण करना और स्वयं से स्वयं का साक्षात करना कहा गया है। ऐसा करके ही हम मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर से साक्षात्कार कर सकते हैं। अपने भीतर के पट खोल कर अपनी आत्मा में उत्तरोत्तर व्यापक परमात्मा के शुद्ध स्वरूप को जान लेना ही एक सफल व्यक्ति का कार्य है। एक सफल व्यक्ति को परमात्मा तत्व और परमात्मा सत्ता और परमात्मा शक्ति इन तीनों की पहचान करते हुए मुक्ति का मार्ग प्राप्त करना होता है।
वास्तव में परमात्मा कहां रहता है ? कैसा है ? इसका उत्तर तो यह है कि वह सर्वव्यापी है और इस प्रकृति की जो ऊर्जा या चेतना शक्ति, वास्तव में वही परमात्मा है। वही एक चेतन तत्व है। जो इस संपूर्ण सृष्टि के चराचर को अपनी उर्जा प्रदान कर सौंदर्य पूर्ण और गतिशील बनाए रखता है। नदी , नालों , तालाबों, पत्थरों व पहाड़ों में भी है। चेतन तत्व या प्राण ऊर्जा प्रवाह मान है। अगर ऐसा नहीं होता तो नदी नालों का प्रवाह नहीं होता। नदियों में कल-कल ध्वनि भी सुनाई नहीं दे पाती। इस चेतना के बगैर पत्थर भला चमकीले कैसे हो सकते हैं ,और पहाड़ इतने अस्थाई कैसे बने रह सकते हैं ? इसीलिए हमारे शास्त्रों में इन निर्जीव पदार्थों और वस्तुओं की पूजन और आराधना का भी उल्लेख मिलता है। हमारे इसका तात्पर्य यह है कि यह प्राण ऊर्जा प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है जिसका मुख्य स्रोत सूर्य और निहारिका माना जाता है। हमारा यह सुंदर शरीर भी इन्हीं प्राकृतिक तत्वों से निर्मित हुआ है । अर्थात यही परमात्म तत्व हमारे शरीर में विद्यमान हैं।
इसी की वजह से प्रकृति में प्राण ऊर्जा अनंत मात्रा में उपलब्ध है ।जब कभी इस फैले हुए विशाल ब्रह्मांड से उर्जा का संग्रह किया जाता है और किसी एक स्थान पर उसे केंद्रित कर दिया जाता है तो वह स्थान दिव्य बन जाता है। इन्हीं दिव्य स्थानों पर दिव्य आत्माओं का अवतरण होता है। इसलिए ऐसे स्थानों को दिव्य भूमि या तीर्थ स्थान कहा जाता है। संसार में जहां कहीं भी पवित्र स्थान माने गए हैं उन स्थानों पर दिव्य आत्माओं का आविर्भाव होता है ।
परमात्मा सभी सत्ताओं में व्यक्त और अव्यक्त रूप से विद्यमान है ।इसी स्वाभाविकता के कारण भी सभी सत्ताओं में अपरिवर्तनीय रूप से विराजमान रहते हैं। इस परम एकता की अवस्था में जब हम उन्हें देखने जाते हैं तो सारे वस्तु भेद मिट जाते हैं ।यह ईश्वरीय सत्ता स्थाई रूप से सभी वस्तुओं में स्थित है । इसलिए उन्हें देखने के लिए स्वयं को सूक्ष्मतम में प्रतिष्ठित करना पड़ेगा। गहरे से गहरे में जाना होगा ।वे अंतर तम के बिंदु पर अधिष्ठित हैं ,और परम ज्ञाता के रूप में मूल बुद्धि के पीछे भी वही है। इसीलिए बुद्धि से ईश्वर को जानने के लिए हमें सीधे और सरल पथ से अपने अंतर में जाना पड़ेगा अपने विचारों को सूक्ष्म से सूक्ष्म करते जाओ। इसी आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर जिस आनंद को प्राप्त करेंगे वही शाश्वत आनंद , ब्रह्मानंद एवं परमानंद है। अस्थाई और काल बद्ध वस्तुएं चाहे शरीर हो चाहे सृष्टि में कोई और वस्तु हो यह आएंगी और चली जाएंगी ।कभी वह हमें सुख देंगी ,तो कभी दुख देंगी। कभी हसाएंगी तो कभी रुलाएंगी ।यह सब कालबद्ध वस्तुएं कितनी भी प्रिय क्यों न हों एक दिन वे निश्चित और असंदिग्ध रूप से हमें छोड़कर एक झटके के साथ हमें अकर्मण्य बनाकर चली जाएंगी। किंतु ईश्वर हमें विलाप नहीं करने देंगे क्योंकि वह शाश्वत चिरंतन हैं ।अपरिवर्तनीय सत्ता है।
यम कहते हैं नचिकेता परम पुरुष के साम्राज्य का महा द्वार तुम्हारे सामने खुला हुआ है ।जिसने संपूर्ण रूप से मानस तत्व ज्ञान प्राप्त कर लिया है ,उसने विनाशशील और अविनाशी का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया है। मानव भी अलग-अलग प्रकृति के होते हैं । कुछ पद , प्रतिष्ठा , धन, मांग , ऐश्वर्य , सुख प्राप्ति की दौड़ में लगे हैं तो कुछ लोग मोक्ष और स्वर्ग की प्राप्ति की कामना में लीन हैं , जो लोग धन , पद और प्रतिष्ठा के लिए दौड़ रहे हैं उनके कर्म चाहे बेशक अच्छे न हों लेकिन उनकी इच्छा भी यह रहती है कि वह अच्छा प्राप्त करें और मोक्ष को प्राप्त करें।
लेकिन ईश्वर को हमारी सारी जानकारी है । वह हमारे कर्म के अनुसार फल देता है , अगर वह ऐसा नहीं करें तो उसको न्याय कारी नहीं कहा जा सकता है।
फिर भी देखिए ईश्वर ने यह संसार एक व्यवस्था से बनाया व चलाया है। ईश्वर ने संसार इसी लिए बनाया है और मनुष्य को भी इसलिए बनाया है कि सब यात्रा करें । इस संसार में और यात्रा करते हुए इस संसार और शरीर को साधन बनाते हुए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करके ईश्वर तक पहुंचे। यही संसार का सार है।
यही इस शरीर को देने का उद्देश्य है। क्योंकि मनुष्य योनि ही परम योनि और योग्य होनी है।
प्रत्येक व्यक्ति की यात्रा श्मशान घाट पर जाकर समाप्त हो जाती है , अब यदि यात्रा ही करनी है तो ऐसी यात्रा क्यों न की जाए जो आप प्रारंभ करें और ईश्वर पर जाकर के समाप्त हो जाए ? यह संसार कर्म क्षेत्र भी है और धर्म क्षेत्र भी है।
मोक्ष का तात्पर्य मोह का क्षय होना है ,अर्थात मोह का क्षरण होना है। जैसे ही मनुष्य के अंदर के मोह आदि विकार समाप्त होंगे जैसे ही उसकी इच्छाएं समाप्त होंगी तो वह अपने मूल स्वरूप में आने लगेगा और यहीं से उसकी मुक्ति का मार्ग शुरू होगा।
इसलिए विकारों का विनाश आवश्यक है । जैसे कीचड़ में गिरने के बाद कीचड़ से निकलना आवश्यक होता है। ऐसे ही मानव जीवन को प्राप्त करने के बाद दुख और विपत्तियों में पड़ने के बाद योग साधना द्वारा योग के 8 अंगों को धारण करके विकारों को नष्ट करते हुए मोक्ष के रास्ते पर चलें ।मुक्ति के रास्ते को प्राप्त करें। इसी से प्रत्येक मनुष्य का आत्मकल्याण संभव है और जब प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार से कार्य करेगा तो ऐसा समाज बनेगा जिसे सर्व आत्म कल्याण कहा जा सकता है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betebet giriş