गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए समय सर्वथा अनुकूल चल रहा है। इसलिए उनकी हर बात को प्रमुखता मिल रही है। जब लोग किसी उदीयमान व्यक्तित्व के गुणों की चर्चा और अवगुणों की उपेक्षा करने लगें तब मानना चाहिए कि प्रारब्ध की कोई बदरी जमकर बरसना चाहती है और यह भी कि यह व्यक्ति अभी अपनी आभा और प्रतिभा से हमें और भी अधिक प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ऐसे व्यक्ति के विषय में मानना चाहिए कि इसके अभी सुदिन चल रहे हैं। इसी प्रकार जब व्यक्ति के दुर्गुणों की चर्चा और सद्गुणों की उपेक्षा होने लगे तो मानना चाहिए कि ये व्यक्ति अब डूब रहा है और निरंतर आभाहीन होता जा रहा है। सुबह का सूर्य सबकी नमस्कार पाता है जबकि सायंकाल का ढलता सूर्य किसी की नमस्ते का पात्र नही बन पाता। दुर्गुणों की चर्चा होने का अर्थ है कि अब दुर्दिनों का दौर चल पड़ा है। नरेन्द्र मोदी गुजरात में विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने प्रत्येक गुजराती का बीमा कराने की बात कही है। इसमें भी उन्होंने अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता दर्शाई है। इसमें कोई जातीय भेदभाव नही, कोई साम्प्रदायिक दुर्भाव नही। इसलिए उनके इस चुनावी घोषणा पत्र को कोई भी असंवैधानिक नही कह सकता। गुजरात इस बार महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहा है। गुजरात की भूमि से इतिहास करवट लेने जा रहा है। पहली बार लोगों की आवाज बन रही है कि गुजरात से मुख्यमंत्री नही प्रधानमंत्री निकलने वाला है। भाजपा ने समय रहते वक्त की नब्ज को समझा है, देश की आवाज को समझा है और वह धीरे धीरे नरेन्द्र मोदी के पीछे लामबंद होती जा रही है। भाजपा की वरिष्ठ नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का सफलता पूर्ण दायित्व संभाल रहीं श्रीमति सुषमा स्वराज ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य बताकर भाजपा की बयार को एक दिशा देने का प्रयास किया है। इसी बयार को भाजपा के वरिष्ठ नेता और अब तक ‘पीएम इन वेटिंग’ रहे लालकृष्ण आडवाणी ने भी अगले ही दिन लगभग अपनी सहमति दे दी है। श्रीमती सुषमा स्वराज ने वक्त की नब्ज को सही रूप से पहचाना है और उन्होंने अपनी टिप्पणी से यह भी सिद्घ करने का प्रयास किया है कि भाजपा अपने नेता के बढ़ते कदम और कद से उचित सामंजस्य रखना जानती है। श्रीमती सुषमा स्वराज को हालांकि शिवसेना के दिवंगत नेता बाल ठाकरे ने प्रधानमंत्री पद की अपनी पसंदीदा उम्मीदवार कहा था। जिससे भाजपा के भीतर के बनते बिगड़ते समीकरणों की ओर देश की जनता का ध्यान जा रहा था और लग रहा था कि श्रीमती स्वराज एक गंभीर प्रत्याशी पीएम पद की हैं। इसलिए उनका नरेन्द्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार स्वीकार करना एक गंभीर अर्थ रखता है। राजनीति का अभिप्राय कुटिलताओं का चक्रव्यूह खड़ा करना नही होता है, बल्कि कुटिलताओं के चक्रव्यूह से सरलता से निकल जाने की युक्ति का नाम होता है। वेद का मंत्र ओउम अग्ने नय सुपथा…में आया शब्द नय भी नीति का ही पर्यायवाची है। इसमें सुपथा शब्द साथ लगा है, जिसका अर्थ सरल सा अच्छा मार्ग ही है। राजनीतिज्ञों की कुटिल चालों के कारण राजनीति को गंदगी का और बुराईयों का या कुटिलताओं का पर्यायवाची मान लिया गया है। जबकि राजनीति तो वास्तव में ही सहज, सरल और सीधे रक्षोपायों का नाम है। श्रीमती सुषमा स्वराज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उद्भट प्रस्तोत्री है और उनके हाथ में राष्ट्र के मूल्य सुरक्षित रहते से जान पड़ते हैं। इसलिए वह यह भली प्रकार जानती हैं कि राजनीति में शब्दों का मोल क्या होता है? अत: उनके शब्दों की गंभीरता पर देश के लोगों ने भरोसा किया है। नरेन्द्र मोदी ने अपनी पहचान एक विकास पुरूष के रूप में बनायी है। उन्हें ब्रिटेन ने भी इसी रूप में मान्यता दी है और अमेरिका ने भी उनके प्रति अपने दृष्टिïकोण में परिवर्तन किया है। विदेशों में वह एक छाया नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं। जिसकी कमी एक लंबे समय से देश में अनुभव की जा रही थी, उसे नरेन्द्र मोदी ने एक प्रांत में बैठकर पूरा किया है। यह पहली बार हो रहा है कि देश की राजधानी से बाहर देश के भावी नेता को लोग एक प्रांत की राजधानी में ढूंढ़ रहे हैं। यद्यपि प्रदेश की राजधानी से (बंगलौर) उठकर जाने वाले एक व्यक्ति ने जब देश के पीएम का पद संभाला था तो उसने अपनी प्रांतीय स्तर की सोच को उस पद पर बैठकर जिस तरह से बार बार प्रदर्शित किया था तो लोगों को उससे निराशा ही हाथ लगी थी। लेकिन इस उदाहरण को लोग अलग रखकर मोदी को ‘पर्सन विद डिफरेंस’ मानते हुए ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का नेता बना रहे हैं। भाजपा के आम कार्यकर्ता की पुकार को पार्टी के नेतृत्व ने मानना शुरू कर दिया है तो इससे पार्टी को ‘मोटा माल’ अर्थात बड़ा लाभ मिल सकता है।
नरेन्द्र मोदी ने 2002 से 2012 तक अग्नि परीक्षा से सिद्घ किया है कि वह आग लगाने वाले ‘विनाश पुरूष’ नही है, अपितु विकास और शांति की बयार बहाने वाले विकास पुरूष हैं। उन्होंने वीर सावरकर के उस आदर्श को स्थापित किया है कि हमारे स्वतंत्र भारत में तुष्टिकरण किसी का नही होगा, धार्मिक आधार पर आरक्षण किसी को नही मिलेगा और कानून के सामने सबको समानता का अधिकार होगा। कानून शांति की स्थापना के लिए सख्ती से अपना काम करेगा और किसी भी वर्ग को किसी दूसरे वर्ग या संप्रदाय को नाहक तंग व परेशान करने का कोई अधिकार नही होगा। राष्ट्रहित शासन के लिए सर्वोपरि होगा। शासन की नीति का और शासक की कृति का मूल केन्द्र बिंदु जनहित होगा, राष्ट्र होगा। वास्तव में इसी सावरकर वादी विचारधारा ने नरेन्द्र के व्यक्तित्व को ऊंचाईयां दी हैं। वह स्थापित हो गये हैं एक अनुकरणीय शासक प्रशासक के रूप में, और कई अवसर आये कि उनके विरोधियों ने भी उनके कार्यों की सराहना की है। गुजरात दंगों को लेकर नरेन्द्र पर कांग्रेस ने जितनी कीचड़ उछाली मोदी उतने ही पाक साफ होते चले गये। जनता उनके साथ जुड़ती चली गयी और यहां तक कि मुस्लिम समाज ने भी उनके साथ रहना ही श्रेयस्कर समझा। फिर भी नरेन्द्र मोदी के लिए अभी प्रफुल्लित होने का समय नही है। उन्होंने समय को पकड़ तो लिया है और समय ने अपने हाथ में कलम लेकर उनके लिए प्रशस्ति पत्र लिखना भी आरंभ कर दिया है लेकिन फिर भी सत्ता में पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ लाना तथा कांग्रेस और सपा जैसे धर्मनिरपेक्ष पार्टियों की कुटिलताओं पर पानी फेंकना उनके लिए अग्नि परीक्षा का एक और सोपान है जो उन्हें पार करना है। यदि कहीं पर भी प्रमाद आड़े आ गया तो पांसा पलट भी सकता है। वैसे उन्हें यह मानकर चलना होगा कि व्यक्ति संघर्ष में तो अकेला होता है पर विजय के क्षणों में जमाना उसके साथ होता है। वह संघर्ष में एक दो और दो से चार उसी प्रकार होते जा रहे हैं जिस प्रकार शुक्ल पक्ष का चंद्रमा अपनी कलाएं बढ़ाता जाता है। यह उनके लिए शुभ संकेत है। देश का बहुसंख्यक समाज उन्हें पूनम का चांद बनाना चाहता है। श्रीमति स्वराज ने उन्हें अपने एक वक्तव्य से विजयदशमी का चांद तो बना ही दिया है। मानो गुजरात फतह हो गया है और अब पांच कदम चले तो दिल्ली भी फतह हो जाएगी, लेकिन सावधान दिल्ली के लिए ये पांच कदम बड़े फूंक फूंककर रखने हैं। हर कदम पर बारूदी सुरंगे….हर कदम पर धोखे….हर कदम पर छल प्रपंच….क्या-क्या नही मिलेगा? लेकिन फिर भी उम्मीद की जाती है कि वह पूनम का चांद बनेंगे।

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