उठो उठो जवां उठो सुधीर कारवां उठो

उठो उठो जवाँ उठो सुधीर कारवाँ उठो

हुकाँर के उठो उठो जवाँ उठो जवाँ उठो
सुनो पुकार मात की दहाड़ के बढे चलो
नदी पड़े फलाँग लो पहाड़ पे चढ़े चलो
सुगम्य राह की भला रखो न आश ही कभी
कुपंथ पंथ चाह को रखो न पास भी कभी
तजो सभी मलाल को विराट हो अड़े चलो
भजो शिवा कराल को बढे चलो बढे चलो
जहाँ कहीं चलो सदा उमंग में कमी न हो
महान हो जवान चक्षु में कभी नमीं न हो
चले हवा विरोध की सुधीर हो झुको नहीं
जवान हो जवान हो जवान हो रुको नहीं
भुजंग तो पड़े रहें सदा सुगंधि छाँव में
अनीति संग जो चले तपे सदा कुठाँव में
अधर्म साथ जो चला सुखी कभी रहा नहीं
धरा उसे पुकारती अनीति जो सहा नहीं
सुधीर वीर देश के प्रताप से महान हो
शिवा समान शौर्य शक्ति भीम के समान हो
बनो मिशाल एक रौशनी खिली सदा रहे
कटार एक हाँथ में व एक में गदा रहे
हुँकार जो उठो कभी पहाड़ डोलने लगें,
बड़े बड़े सुभट्ट आय हाँथ जोड़ने लगें,
ज्वलंत नेत्र तेज से धरा जलायमान हो,
लगे समीर सूखने परास्त आसमान हो,
अदम्य शक्तिपुंज भी भरा प्रचण्ड सा रहे,
ललाट में सदैव तेज मार्तण्ड सा रहे,
करों विराट युद्ध गिद्ध स्वाद लूटने लगें,
गिरे हुए शरीर से फुहार फूटने लगे,
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कवि ‘चेतन’ नितिन खरे
सिचौरा, महोबा ( बुन्देलखण्ड)
मो. + 91 9582184195

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