bangladesh-india
  • डॉ राकेश कुमार आर्य

बांग्लादेश में जब से सरकार बदली है तब से लेकर अब तक बड़ी संख्या में हिंदुओं का नरसंहार हो चुका है। अभी तक इस नरसंहार में मरने वाले लोगों की स्पष्ट संख्या तो कोई ज्ञात नहीं हो पाई है, परंतु इतना अवश्य है कि हिंदू समाज के स्त्री पुरुषों को वहां पर अप्रत्याशित अत्याचारों का सामना करना पड़ा है। मोहम्मद यूनुस ने अपनी इस्लामिक कार्य शैली का परिचय देते हुए हिंदू- स्त्री पुरुषों की चीख – पुकार को पूर्णतया उपेक्षित किया है। हमें यह मानना पड़ेगा कि मोहम्मद यूनुस के पास एक शातिर राजनीतिज्ञ का मन मस्तिष्क और चेहरा है। जिस प्रकार एक शातिर राजनीतिज्ञ अपराध करने के उपरांत भी बाहर से भोला बना रहता है, वही गुण मोहम्मद यूनुस के भीतर है । हिंदुओं पर अप्रत्याशित अत्याचार करने वाले मोहम्मद यूनुस को सब कुछ पता है, परंतु चेहरे से ऐसी मासूमियत झलकाते हैं कि जैसे उन्हें या तो कुछ पता नहीं है या हिंदुओं के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, जिसे दुखद कहा जा सके। बड़ी मासूमियत के साथ पड़ोसी देश के शासन प्रमुख मोहम्मद यूनुस कह रहे हैं कि भारत से हमारे संबंध बहुत मजबूत हैं। कुछ भ्रांतियां हैं, जिन्हें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि मोहम्मद यूनुस की कार्यप्रणाली उनके इन शब्दों के सर्वथा विपरीत रही है। उन्होंने पाकिस्तान के साथ संबंधों की निकटता बनाकर भारत को परेशान करने का हर संभव प्रयास किया है । इसके अतिरिक्त अपने देश में रहने वाले हिंदुओं पर कई प्रकार के अप्रत्याशित अत्याचार करवाए हैं। उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार हुए हैं। छोटी अवस्था की बच्चियों को भी छोड़ा नहीं गया है। इसके साथ ही हिंदुओं के धर्म स्थलों पर भी आक्रमण किए गए हैं ? मोहम्मद यूनुस की इस प्रकार की कार्यशैली के चलते आतंकी और जिहादी संगठनों को बल मिला है । नई ऊर्जा प्राप्त हुई है और उन्होंने इस प्रकार के हालात को ‘ एक अवसर’ के रूप में भुनाने का हर संभव प्रयास किया है। इसके उपरांत भी मोहम्मद यूनुस देश की सेना को अब पसंद नहीं आ रहे हैं। ऐसे अनेक समाचार प्रकाशित हो रहे हैं, जिनसे लगता है कि देश की सेना अब एक बार फिर ‘ कुछ नया’ करने जा रही है।

जहां तक भारत की बात है तो भारत ने बांग्लादेश में घटने वाली घटनाओं पर बहुत सावधानी भरी दृष्टि रखने का प्रयास किया है। भारत ने पर्दे के पीछे से कुछ ऐसे कठोर कदम उठाए हैं जिससे बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में बड़ी भारी गड़बड़ी आ गई है। हड़बड़ी में मोहम्मद यूनुस ने चाहे जो कुछ करा दिया है परंतु गड़बड़ी को देखकर उनकी हड़बड़ी भरी सोच ठिकाने पर आ गई है। कहते हैं कि जो दूसरों के घरों में आग लगाते हैं, उनके घर में आग अपने आप लग जाती है। बांग्लादेश के युवा जिस प्रकार एक सुनियोजित योजना के अंतर्गत मोहम्मद यूनुस के विरुद्ध सड़क पर आते जा रहे हैं उससे स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश का जनमानस मोहम्मद यूनुस के साथ नहीं है। भारत इन सभी घटनाओं को दूर से बैठ कर देख रहा है। जिस बांग्लादेश को भारत अपना ‘ छोटा भाई’ मानकर उसके प्रत्येक प्रकार के कष्ट-क्लेश में साथ खड़ा होता था, वही भारत इस समय तटस्थ भाव से मौन साधकर दूर खड़ा है। अपराध बोध से ग्रसित मोहम्मद यूनुस भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यह भी नहीं कह सकते कि वह बांग्लादेश में तेजी से घूमते घटना चक्र के दृष्टिगत उनकी सहायता करें ?

मजहब के आधार पर पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों एक ही हैं। 14 अगस्त 1947 में जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया था तो उस समय भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन संप्रदाय के आधार पर किया गया था। कुछ काल उपरांत बांग्लादेश के लोगों के साथ पाकिस्तान के लोगों ने अत्याचार करने आरंभ किये। जिसका परिणाम यह हुआ कि बांग्लादेश को अपनी पहचान बनाए रखने के लिए पाकिस्तान के अत्याचारों से मुक्त होना पड़ा । जिसमें भारत की मुक्तिवाहिनी सेना ने विशेष भूमिका निभाई थी। जिस बांग्लादेश को अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करने के लिए भारत की मुक्तिवाहिनी सेना का सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ था , वही बांग्लादेश आज भारत को आंखें दिखाने का दुस्साहस कर रहा है। बांग्लादेश के इस प्रकार के आचरण से भारत के हिंदू समाज को शिक्षा लेनी चाहिए। विशेष रूप से तब जबकि भारत के मुस्लिम समाज के द्वारा इस नारे को बार बार दोहराया जा रहा हो कि जो कुछ बांग्लादेश में हो रहा है, वही भारत में भी होगा। यह नारा वास्तव में एक धमकी है। जिसे भारत के नेतृत्व को हल्के में नहीं लेना चाहिए। मोहम्मद यूनुस को इस समय समझना चाहिए कि 21वीं शताब्दी में कोई भी देश अपनी सरकार के सांप्रदायिक विद्वेष भरे हावभाव से नहीं चल सकता। इस प्रकार की सोच किसी न किसी वर्ग अथवा अल्पसंख्यक समुदाय पर अत्याचार करने वाली होती है , जिसे किसी भी सभ्य समाज के द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता। संसार के अन्य देशों के साथ अपने आप को प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ाने के लिए शासन और शासक की नीतियों में मानवता होनी चाहिए। बांग्लादेश अपनी जीडीपी को 2026 तक जिस प्रकार 6 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए संकल्पित होकर आगे बढ़ रहा था, उस संकल्पवान बांग्लादेश के लिए सांप्रदायिक संकीर्णता एक बीमारी हो सकती है, बीमारी का उपचार नहीं।

यदि कोई देश बीमारी को उपचार मानकर अपनी नीति रणनीति बना रहा हो तो समझिए कि उसका भविष्य उज्जवल नहीं है। अब जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कह दिया है कि बांग्लादेश से किस प्रकार निपटना है ? इस पर भारत स्वयं निर्णय ले सकता है अर्थात बांग्लादेश को उन्होंने भारत के लिए छोड़ दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस प्रकार के वक्तव्य के पश्चात बांग्लादेश के नेता मोहम्मद यूनुस ने समझ लिया है कि इस वक्तव्य का अर्थ क्या है ? और भारत इस समय क्या-क्या करने की स्थिति में है ?
वर्तमान समय में बांग्लादेश को समझना चाहिए कि वह भारत की मौलिक संस्कृति से इस्लाम स्वीकार करने के उपरांत भी दूर नहीं हो पाया है। आज भी हमारी कई सांझी परंपराएं हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि हमारा इतिहास सांझा है । हमारे पूर्वज साँझे हैं। हमारे इतिहास के नायक सांझे हैं। इन सबको बांग्लादेश कभी दूर नहीं कर सकता।

हां, उसका अपना संकीर्ण सांप्रदायिक दृष्टिकोण निजी हो सकता है। उसकी सोच की यह संकीर्णता उसके स्वयं के लिए आत्मविनाश का कारण बन सकती है।
इधर भारतीय नेतृत्व को इस बात के प्रति सावधान रहना होगा कि भारत के पड़ोस में बसने वाला पाकिस्तान और बांग्लादेश जब-जब अपनी भीतरी समस्याओं से त्रस्त हुए हैं, तब – तब इन्होंने अपने देशवासियों का ध्यान भंग करने के लिए भारत के साथ कटुता पैदा की है । पाकिस्तान तो एक से अधिक युद्ध भी भारत के साथ कर चुका है। यह अलग बात है कि उसने प्रत्येक युद्ध में मुंह की खाई है। परंतु पराजित होने के उपरांत भी भारत को दु:खी करना पाकिस्तान की मूल प्रकृति का तकाजा है। यही स्थिति बांग्लादेश की मानी जा सकती है। क्योंकि दोनों का सांप्रदायिक दृष्टिकोण लगभग एक ही जैसा है अर्थात हिंदू विरोधी। हिंदू विरोध का अर्थ है काफिर और कुफ्र के विरुद्ध अपनी सारी बातों को भूलकर एक साथ उठ खड़े होना। इसी के लिए पाकिस्तान का नेतृत्व अपने देश के लोगों को भारत के विरुद्ध उठ खड़े होने का आवाहन करता आया है। जिसे वहां के जनमानस ने हर बार लगभग भरपूर समर्थन दिया है। इसी बात को बांग्लादेश के संदर्भ में भी समझना चाहिए। इसलिए भारतीय नेतृत्व को प्रत्येक स्थिति के लिए गंभीरता से तैयार रहना चाहिए।

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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