देवधर मंदिर समीक्षा — (क्या देवघर मंदिर ही देवताओं का निवास है ? )

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डॉ डी के गर्ग

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पौराणिक मान्यता : बैद्यनाथ धाम द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक है. इस द्वादश ज्योतिर्लिंग विश्व का इकलौता शिव मंदिर है, जहां शिव और शक्ति एक साथ विराजमान हैं. इसलिए इसे शक्तिपीठ भी कहते है। यहाँ आसपास अनेकों मंदिर हैं। पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि यहां माता सती का हृदय कट कर गिरा था इसलिए इसे हृदय पीठ भी कहते है।हर सावन में यहाँ लाखों शिव भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यहाँ भारत के विभिन्न भागों से तीर्थयात्री और पर्यटक आते ही हैं, विदेशों से भी पर्यटक आते हैं। इन भक्तों को ‘काँवरिया’ कहा जाता है।ये शिव भक्त बिहार में सुल्तानगंज से गंगा नदी से गंगाजल लेकर 105 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर देवघर में भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं। शिव पुराण में लिखा है ये मंदिर श्मशान में है। मान्यता के अनुसार देवघर शब्द का निर्माण देव + घर हुआ है। यहाँ देव का अर्थ देवी-देवताओं से है और घर का अर्थ निवास स्थान से है।

विश्लेषण : आपको जगह -जगह प्राचीन मंदिर मिलेंगे चाहे कोई दस साल पहले बनाया हो क्योकि प्राचीन मंदिर कह देने से भक्त आकर्षित जल्दी होते है । सत्य ये है की ये प्राचीन मंदिर नहीं है। क्योकि यहाँ घर शब्द जो बताया है वह फ़ारसी का है , हिंदी में निवास ,आवास
,गृह आदि है। मुग़ल काल के बाद हमारी भाषा में उर्दू, फ़ारसी और अरबी का प्रयोग बढ़ गया और इन शब्दों को हम हिंदी के रूप में प्रयोग करने लगे।
२ दूसरी बात ,यदि ये शिव का निवास है तो फिर आसपास अन्य मंदिरों की जरुरत क्यों है ?
३ देव कौन है ,देवता किसे कहते है ?–ये समझना जरुरी है और इस अज्ञानता से बहार निकलो।
भारतवर्ष में देवों का वर्णन बहुत रोचक है । देवों की संख्या तैंतीस करोड़ बतायी जाती है और इसमें नदी, पेड़, पर्वत, पशु और पक्षी भी सम्मिलित कर लिये गये है । ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्यक है कि शास्त्रों के वचन समझे जाएँ और वेदों की वास्तविक शिक्षाएँ ही जीवन में धारण की जाएँ । शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार देवता 33 प्रकार के होते हैं । यहाँ कोटि का अर्थ प्रकार है । कोटि का एक अन्य अर्थ करोड़ भी होता है, किन्तु यहाँ प्रकार अर्थ है ।
तैंतीस ‘कोटि‘ के देव —
‘कोटि‘ शब्द के दो अर्थ हैं -‘प्रकार‘ और ‘करोड़‘ । विश्व में तैंतीस कोटि के देव अर्थात तैंतीस प्रकार के देव हैं, तैंतीस करोड़ नहीं । अथर्ववेद -१०/७/२७ में कहा गया है- ‘‘ यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे ।तान् वै त्रयास्त्रिंशद् देवानेके ब्रह्मविदो विदुः ।। ‘‘
अर्थात वेदज्ञ लोग जानते हैं कि तैंतीस प्रकार के देवता संसार का धारण और प्राणियों का पालन कर रहे हैं । इस प्रकार तैंतीस करोड़ देव कहना मिथ्या और भ्रामक है । वैदिक संस्कृति में तैंतीस कोटि के अर्थात तैंतीस प्रकार के अर्थात तैंतीस देव हैं। इनकी गणना निम्न प्रकार है —
(१) यज्ञ एक देव है, क्योंकि इससे वर्षा होकर प्राणियों को सुख मिलता है । गीता -३/१४ में कहा गया है-‘‘ अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद् भवः।।‘‘ अर्थात प्राणी अन्न से , अन्न बादल से और बादल यज्ञ से उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार यज्ञ प्राणियों के जीवन और सुख का आधार है ।
(२) इंद्रः चूंकि उनका शस्त्र बिजली है, इसलिए इन्हें ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। विद्युत् एक देव है, क्योंकि यह ऐश्वर्य का साधन है । इससे गति, शक्ति, प्रकाश, समृद्धि और सुख के साधन प्राप्त होते हैं । बृहदारण्यक उपनिषद – ३/१/६ के अनुसार —
‘‘कतम इन्द्रः ? अशनिरिति । ‘‘
इन्द्रदेव अर्थात ऐश्वर्य का साधन कौन है ? विद्युत ही इन्द्रदेव अर्थात ऐश्वर्य का साधन है ।
(३) आठ वसु: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य और नक्षत्र, ये आठ सबका निवास स्थान होने से वसु कहलाते हैं। ये आठ वसु समस्त प्राणियों को आश्रय देने से देव हैं।
(४) १२ आदित्य जो सूर्य के प्रतीक हैं। जैसे जैसे समय आगे बढ़ता गया, इन्हें महीनों का प्रतीक माना गया। वर्ष के बारह मास हैं – चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन । इन्हें आदित्य भी कहते हैं । ये बारह आदित्य प्राणियों को आयु देने से देव कहलाते हैं। यदि इन मासों के नाम जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई, जून, जुलाई, अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर बताये जाएँ तो भी इनका देवपन यथावत रहता हैं क्योंकि इस स्थिति में भी इनका आयु देना सार्थक है और इन नामों से भी ये बारह आदित्य कहलायेंगे ।
एक अन्य प्रश्न: १२ वसु यानि १२ माह को ३३ कोटि के देवता क्यों कहा गया है ?
इसका उत्तर बहुत आसान है ,भारत ऋतुओं का देश है। हर महीने में अमावस्या ,पूर्णिमा आती है और ईश्वर प्रकृति के माध्यम से अलग-अलग प्रकार की सुगन्धित तापमान और वातावरण प्रदान करता है, कभी महा गर्मी, कभी वर्षा, कभी शरद ऋतु और बसंत ऋतु। इसी ऋतुओं के अनुसार खाद्, फसल, वन और वृक्षों की बुवाई होती है, इसी अलोक में हर माह किसी न किसी फसल के लिए निर्धारित होता है और तरह-तरह के फल और सब्जियाँ हमको ऋतु के अनुसार प्राप्त होते हैं जो मनुष्य को उस ऋतु में स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। इसीलिए ईश्वर को माता ,परम पिता और दयालु, सबका पालनहार कहा गया है और इन १२ माह को १२ आदित्य यानि १२ देवता की संज्ञा दी गयी है ।
(५) ११ रूद्र में यदि जीवात्मा को अलग कर दे तो प्राण और प्राण के १० कार्य है जो जीव के अस्तित्व (सर्वाइवल) के लिए अत्यंत आवश्यक है। संक्षेप में इनका वर्णन इस तरह से है –
मुख्य प्राण ५ बताए गए है जिनके नाम इस प्रकार है ,
१. प्राण , २. अपान, ३. समान, ४. उदान ५. व्यान
पहला: प्राण
प्राण किसे कहते है ?
हमने बहुत बार अपने जीवन में व्यवहारिक रूपसे “प्राण” शब्द का उपयोग किया है, परंतु हमे प्राण की वास्तविकता के बारे मे शायद ही पता हो, हम भ्रांति से यह मानते है कि प्राण का अर्थ जीव या जीवात्मा होता है, परंतु यह सत्य नहीं है। प्राण वायु का एक रूप है। जब हवा आकाश में चलती है तो उसे वायु कहते है, परन्तु ये साधारण वायु नहीं है । इसे प्राण वायु कहते है। जब यही वायु हमारे शरीर में 10 भागों में काम करती है तो इसे “प्राण” कहते है। वायु का पर्यायवाची नाम ही प्राण है ।
कोरोना के समय जब सांस लेने में दिक्कत हुई तब शुद्ध वायु की मांग तेजी से बढ़ गयी थी। ऐसे समय में कृत्रिम वायु जैसे पंप द्वारा श्वास देने के सभी प्रयास विफल रहे थे।
मूल प्रकृति के स्पर्श गुण-वाले वायु में रज गुण प्रदान होने से वह चंचल, गतिशील और अदृश्य है । पंच महाभूतों में प्रमुख तत्व वायु है । वात्, पित्त कफ में वायु बलिष्ठ है, शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र -श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ तथा अन्य सब अवयव -अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर समस्त कार्यों का संपादन करते है। वह अति सूक्ष्म होने से सूक्ष्म छिद्रों में प्रविष्टित हो जाता है । प्राण को रुद्र और ब्रह्म भी कहते हैं ।
प्राण से ही भोजन का पाचन, रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य, रज, ओज, आदि धातुओं का निर्माण, फल्गु ( व्यर्थ ) पदार्थो का शरीर से बाहर निकलना, उठना, बैठना, चलना, बोलना, चिंतन-मनन-स्मरण-ध्यान आदि समस्त स्थूल व् सूक्ष्म क्रियाएँ होती है.प्राण की न्यूनता-निर्बलता होने पर शरीर के अवयव ( अंग-प्रत्यंग-इन्द्रियाँ आदि ) शिथिल व रुग्ण हो जाते है। प्राण के बलवान होने पर समस्त शरीर के अवयवों में बल, पराक्रम आते है और पुरुषार्थ, साहस, उत्साह, धैर्य, आशा, प्रसन्नता, तप, क्षमा आदि की प्रवृति होती है।
शरीर के बलवान्, पुष्ट, सुगठित, सुन्दर, लावण्ययुक्त, निरोग व दीर्घायु होने पर ही लौकिक व आध्यात्मिक लक्ष्यों की पूर्ति हो सकती है। इसलिए हमें प्राणों की रक्षा करनी चाहिए अर्थात् शुद्ध आहार, प्रगाढ़ निंद्रा, ब्रह्मचर्य, प्राणायाम आदि के माध्यम से शरीर को प्राणवान् बनाना चाहिए।
प्राण के संयोग से जीवन और प्राण के वियोग से मृत्यु होती है। जीव का अंन्तिम साथी प्राण है।
मुख्य प्राण:-
१.प्राण:- इसका स्थान नासिका से ह्रदय तक है। नेत्र, श्रोत्र, मुख आदि अवयव इसी के सहयोग से कार्य करते है। यह सभी प्राणों का राजा है। जैसे राजा अपने अधिकारियों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिये नियुक्त करता है, वैसे ही यह भी अन्य अपान आदि प्राणों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिये नियुक्त करता है।
२.अपान:- इसका स्थान नाभि से पाँव तक है, यह गुदा इन्द्रिय द्वारा मल व वायु को उपस्थ ( मुत्रेन्द्रिय) द्वारा मूत्र व वीर्य को योनी द्वारा रज व गर्भ का कार्य करता है।
३. समान:- इसका स्थान ह्रदय से नाभि तक बताया गया है। यह खाए हुए अन्न को पचाने तथा पचे हुए अन्न से रस, रक्त आदि धातुओं को बनाने का कार्य करता है।
४.उदान:- यह कण्ठ से सिर ( मस्तिष्क ) तक के अवयवों में रहेता है, शब्दों का उच्चारण, वमन ( उल्टी ) को निकालना आदि कार्यों के अतिरिक्त यह अच्छे कर्म करने वाली जीवात्मा को अच्छे लोक ( उत्तम योनि ) में, बुरे कर्म करने वाली जीवात्मा को बुरे लोक ( अर्थात सूअर, कुत्ते आदि की योनि ) में तथा जिस आत्मा ने पाप – पुण्य बराबर किए हों, उसे मनुष्य लोक ( मानव योनि ) में ले जाता है ।
५. व्यान:- यह सम्पूर्ण शरीर में रहेता है । हृदय से मुख्य १०१ नाड़ियों निकलती है, प्रत्येक नाड़ी की १००-१०० शाखाएँ है तथा प्रत्येक शाखा की भी ७२००० उपशाखाएँ है । इस प्रकार कुल ७२७२१०२०१ नाड़ी शाखा- उपशाखाओं में यह रहता है । समस्त शरीर में रक्त-संचार , प्राण-संचार का कार्य यही करता है तथा अन्य प्राणों को उनके कार्यों में सहयोग भी देता है ।
उपप्राण:- उपप्राण भी पाँच बताये गए है,
१. नाग २. कुर्म ३. कृकल ४. देवदत ५. धनज्जय
१. नाग:-यह कण्ठ से मुख तक रहता है । उदगार (डकार ), हिचकी आदि कर्म इसी के द्वारा होते है ।
२.कूर्म:- इसका स्थान मुख्य रूप से नेत्र गोलक है, यह नेत्र गोलकों में रहता हुआ उन्हे दाएँ -बाएँ, ऊपर-नीचे घुमाने की तथा पलकों को खोलने बंद करने की किया करता है । आँसू भी इसी के सहयोग से निकलते है ।
३. कूकल:- यह मुख से ह्रदय तक के स्थान में रहता है तथा जृम्भा ( जंभाई =उबासी ), भूख, प्यास आदि को उत्पन्न करने का कार्य करता है ।
४. देवदत्त:- यह नासिका से कण्ठ तक के स्थान में रहता है । इसका कार्य छिंक, आलस्य, तन्द्रा, निद्रा आदि को लाने का है ।
५. धनज्जय:- यह सम्पूर्ण शरीर में व्यापक रहता है, इसका कार्य शरीर के अवयवों को खीचें रखना, माँसपेशियों को सुंदर बनाना आदि है । शरीर में से जीवात्मा के निकल जाने पर यह भी बाहर निकल जाता है, फलतः इस प्राण के अभाव में शरीर फूल जाता है । जब शरीर विश्राम करता है, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती है, मन शांत हो जाता है । तब प्राण और जीवात्मा जागता है ।
११ वां जीवात्मा -जीवात्मा का स्वरूप क्या है? क्या जीवात्मा निराकार है? निराकार होने का अर्थ निर्गुण होना नहीं है।जीवात्मा में भी अनेक गुण नहीं है इसलिये जीवात्मा भी निर्गुण व सगुण दोनों है।
ईश्वर प्राण को जीवात्मा के उपयोग के लिए प्रदान करता है। ज्यों ही जीवात्मा किसी शरीर में प्रवेश करता है, प्राण भी उसके साथ शरीर में प्रवेश कर जाता है तथा ज्यों ही जीवात्मा किसी शरीर से निकलता है, प्राण भी उसके साथ निकल जाता है। सृष्टि की आदि में परमात्मा ने सभी जीवो को सूक्ष्म शरीर और प्राण दिया जिससे जीवात्मा प्रकृति से संयुक्त होकर शरीर धारण करता है सजीव प्राणी नाक से श्वास लेता है, तब वायु कण्ठ में जाकर विशिष्ठ रचना से वायु का दश विभाग हो जाता है।शरीर में विशिष्ठ स्थान और कार्य से प्राण के विविध नाम हो जाते है ।
उपयोग के देव —
इन तैंतीस कोटि देवों में केवल जीवात्मा चेतन है । यह अन्यों का उपयोग करता है और स्वयं भी अन्य जीवात्माओं के उपयोग में आता है । जैसे – गाय दूध देकर, भेड़ ऊन देकर , कुत्ता रखवाली करके और बैल हल खींचकर उपयोग में आते हैं । मनुष्य सेवक, पाचक, सैनिक आदि बनकर उपयोग में आता है और कृषक, व्यापारी, उपभोक्ता, स्वामी, राजा आदि बनकर अन्यों से उपयोग लेता है । जीवात्मा के अतिरिक्त शेष बत्तीस देव ‘जड़‘ हैं और ‘उपयोग के देव‘ कहलाते है । ये सदैव चेतन के उपयोग में आते हैं और जड़ होने के कारण स्वयं किसी का उपयोग नहीं कर सकते ।
सन्दर्भ –शतपथ ब्राहमण के 14 वें कांड के अनुसार इन 33 देवताओं का स्वामी परमपिता परमात्मा ( महादेव ) ही एकमात्र उपासनीय है । जिसका सर्वोत्तम नाम ” ओ३म है ।

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