वैदिक सम्पत्ति अध्याय 334 वैदिक आर्यों की सभ्यता,जड़ सृष्टि से उत्पत्ति

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(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक से सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति-देवेंद्र सिंह आर्य
(चैयर मैन- ‘उगता भारत ‘)

गतांक से आगे …

     *चेतन सृष्टि की उत्पत्ति* 

हम गत पृष्ठों में कह आये हैं कि इस सृष्टि की उत्पत्ति का प्रधान कारण जीवों के कर्म और परमेश्वर का न्याय ही है। जीव अनादि काल से कर्म करते हुए चले आ रहे हैं और परमात्मा भी अनादि काल से उनको कर्मफल देता हुआ चला था रहा है। इसीलिए प्रत्येक प्रलय के बाद नवीन सृष्टि होती है और जब सूर्य, चन्द्र और पृथिवी आदि की रचना हो जाती है, तब पृथिवी के अनुकूल हो जाने पर परमात्मा जीवों के शेष कर्मों के अनुसार उनको नाना प्रकार की योनियों में उत्पन्न करता है। मनुस्मृति में लिखा है कि-

चं तुः कर्मणि यस्मिन्स व्ययुङ्क्त प्रथमं प्रभुः । स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः ।। (मनु० १।२८)

  अर्थात् उस प्रभु परमात्मा ने सृष्टि के आदि में जिसकी जिस स्वाभाविक कर्म में योजना की, उसने उत्पन्न होकर वही स्वाभाविक कर्म किया। तात्पर्य यह कि जिसको जिस योनि के योग्य समझा उसको उसी योनि में उत्पन्न किया। इस कर्म और कर्मानुसार शरीरधारण के सिद्धान्तानुसार समस्त कर्मों और समस्त शरीरों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। अर्थात् यह कहा जा सकता है कि समस्त कर्मों के तीन वर्ग हैं, तदनुसार समस्त प्राणीशरीरों के भी तीन वर्ग हैं।
 कर्मों के तीन वर्ग सात्विक, राजस, और तामस हैं। इन्हीं को दूसरे शब्दों में आचार, अनाचार और अत्याचार कहते हैं। ये तीनो प्रकार के कर्म,बुद्धि, निर्बुद्धि और प्रमाद से किये जाते हैं। सृष्टिनियमों के अनुसार और धर्मानुकुल बुद्धिपूर्वक आचरण-व्यवहार- का नाम आचार है और वह सात्विक कर्म कहलाता है। सृष्टिनियमों को बिना जाने निर्बुदितापूर्वक कुछ न कुछ कर डालने का नाम अनाचार है और वह राजस कर्म कह‌लाता है और प्रमाद, आलस्य तथा अभिमान से किये गये सृष्टि के प्रतिकूल अधर्माचरणों का नाम अत्याचार है और वे तामस कर्म ब‌ताते है। इन्हीं तीनों प्रकार के कर्मों के अनुसार तीन प्रकार के शरीर बनते हैं।

ज्ञानयुक्त सात्त्विक कर्मों के करने से ज्ञानयुक्त मनुष्यशरीर बनता है, अज्ञानयुक्त कुछ न कुछ उलटे सीधे कामों के करने से अज्ञानयुक्त पशुशरीर बनता है और आलस, प्रमाद, तथा अभिमानयुक्त दुष्क्रमों के करने से ज्ञान और कर्महीन अन्धकारमय वृक्षशरीर बनता है। ज्ञानपूर्वक इन्द्रियों के उपयोग करने से मनुष्यों को ज्ञान और कर्म के धारण करनेवाले परिपूर्ण अङ्ग दिये गये हैं, अज्ञानवश केवल कुछ न कुछ करने से पशुओं को ज्ञानहीन केवल कुछ न कुछ कर लेनेवाले अपूर्ण अङ्ग दिये गये हैं और ज्ञान तथा कर्म दोनों का जानबूझकर दुरुपयोग करने से वृक्षों को ज्ञान और कर्म दोनों से वंचित कर दिया गया है। इस प्रकार से तीन किस्म के कर्मों के कारण तीन वर्ग के प्राणी मनुष्य, पशु और वृक्ष बने हैं। इन तीनों में मनुष्य ज्ञानयुक्त और कर्म करने में समर्थ हैं, पशु ज्ञानहीन और कर्म करने में समर्थ हैं और वृक्ष ज्ञान तथा कर्म दोनों में असमर्थ हैं।

 संसार का यह नियम है कि जो ज्ञान में और कर्म करने में पूर्ण होता है, वह ज्ञानशून्य का भोक्ता होता है और ज्ञानशून्य उसका भोग्य होता है। इसी तरह जो कर्म कर सकता है, यह ज्ञान और कर्मशून्य. का भोक्ता होता है और ज्ञानकर्मशून्य उसका भोग्य होता है। इसके सिवा संसार का दूसरा यह भी नियम है कि पहिले भोग्य उत्पन होता है, तब भोक्ता पैदा होता है। जिस प्रकार पहिले दूध उत्पन्न हो जाता है, तब बच्च पैदा होता है, उसी तरह जब पशुओं के भोग्य वृक्ष पहिले उत्पन्न हो जाते हैं, तब पशु उत्पन्न होते हैं और जब मनुष्यों के भोग्य वृक्ष और पशु उत्पन्न हो जाते हैं, तब दोनों का उपभोग करनेवाला मनुष्य उत्पन्न होता है। इसी नियम के अनुसार इस चेतन सृष्टि में सबसे पहिले वृक्ष उत्पन्न हुए, वृक्षों के बाद पशु उत्पन्न हुए और पशुओं के बाद मनुष्य उत्पल हुए। वेद में चेतन सृष्टि की उत्पत्ति इसी क्रम से लिखी है। यजुर्वेद में लिखा है कि-

सम्मृतं पृषदाज्यम् । पशूशुत्तांके वायव्यागारण्या पाण्याच ये ।।

बाह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य पद्ध श्वः पचा सूडो अजायत । (घ० ३१.)

अर्थात् पहिले पृषद नामक भक्ष्यान्न वनस्पतियाँ उत्पन्न हुई फिर उड़नेवाले, अरण्य में चरनेवाले और ग्रामों में रहनेवाले पशु उत्पन्न हुए और इनके बाद ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सूद्र अर्थात् मनुष्य उत्पत्र हुए। इस तरह में समस्त चेतन सृष्टि की उत्पत्ति हुई और स्वाभाविक स्थिति में स्थिर हुई। किन्तु सृष्टि उत्पत्ति का एक ऐसा अस्वाभाविक क्रम और है, जिसका प्रयोग आपत्ति के समय ही होता है। इस नियमका सिद्धान्त यह है कि जो जिसको सताता है बह उससे सताया जाता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार जिस समय समस्त मनुष्यसमाज अनाचारी, अत्याचारी, कामुक, बेहिसाब सन्तति का विस्तार करनेवाला, मांसाहारी और युद्धकारी होकर प्राणियों का संहार करता है और जिस समय मनुष्यसमाज जंगलों को काटकर पहाड़ों समुद्रों और भौगर्भिक उथला पथलो को कर के संसार में प्राकृतिक विल्पवो (Disturbances) की उत्पत करके भी प्राणियों का संहार कर देता है, उस समय सृष्टिके स्वाभाविक नियम बिगड़ जाते हैं और प्राणियों को कष्ट होता है, अतः उन नियमों की रक्षा करने के लिए सृष्टि कानियामक अत्याचारी प्राणियों की वृद्धि कर देता है। अर्थाद मांसाहारी मनुष्यों को बकरों और गौ आदिको में और बकरों तथा गौ आदिकों को भेड़ियों और सिहं आदि हिंस्र पशुओं में उत्पन्न कर देता है। इसी तरह अनेक पीड़ित प्राणियों को बीमारी के कृमियों (Germs) में और अनेक पीड़ा देनेवालों को कीटपतङ्गों में उत्पन्न कर देता है। फल यह होता है कि जहाँ सीधे सादे मनुष्यों और पशुओं को अत्याचारी सताते हैं और बेजा तौर से स्वार्थसाधन करते हैं, वहाँ पीड़ित प्राणी भी अपना बदला लेकर पीड़कों को भी पीड़ा पहुँचाते हैं। अर्थात् जिन्होंने जिनको मारकर खाया है वे भी उनको मारकर खा जाते हैं। यही सृष्टि के दोनों प्रशस्त क्रम हैं और इन्हीं क्रमों के अनुसार स्वाभाविक और आपत्कालिक सृष्टि उत्पन्न होती है। यह स्वाभाविक क्रम अनादि हैं। जब जब इस प्रकार के मनुष्य उत्पन्न होते हैं, तब तब इसी प्रकार की सृष्टि होती है। इसी नियम के अनुसार इस वर्तमान सृष्टि में भी दोनों प्रकार के प्रारणी उत्पन्न हुए। स्वाभाविक नियमानुसार खड़े, आड़े और उलटे शरीर की योनियाँ उत्पन्न हुई और आपत्कालिक नियमानुसार मकड़ी, बक और बतक आदि थोड़ी सी ऐसी भी योनियाँ सृष्टप्रारम्भ ही में उत्पन्न हुई, जो स्वभावतः दूसरे प्राणियों का नाश करने लगीं। परन्तु सृष्टप्रारम्भ के बहुत दिन बाद जब मनुष्यों में महा अत्याचारियों की अधिकता हुई, तब परमात्मा ने उन सिहब्याआदि हिंस्त्र पशुओं में भी प्राणियों को मारकर खानेवाले उत्पन्न कर दिये, जो पहिले मृतक मांस को खाकर केवल संसार की सफाई ही करते थे और जिन्दा जानवर को मारकर नहीं खाते थे। यही इस वर्तमान चेतन सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य है। किन्तु प्रश्न यह है कि प्रथम कही हुई जड़ सृष्टि के साथ इस चेतन सृष्टि का सम्बन्ध क्या है ?

आलोक – आने वाले अंक में -जड़ सृष्टि से चेतन सृष्टि का सम्बन्ध के बारे में बतलाइगे ….

क्रमशः

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