गर्भिणी या मां बनने के कष्ट

प्रत्येक कन्या जिसका विवाह हो गया है उसे जीवन के तीन भागों में गुजरना पड़ता है। वह गर्भवती होगी जिस अवस्था में उसे गर्भवती होने के कष्ट में से गुजरना होगा, उसके शिशु होगा, उसे तथा उवके शिशु को शैशव बढक़र बालक बनेगा, बालक को बचपन के कष्ट में से गुजरना होगा। इन तीन कष्ट का होम्योपैथी से कैसे मुकाबला किया जा सकता है। इस विषय पर पुस्तक का यह भाग लिखा जा रहा है।
होम्योपैथी का दावा है कि होम्योपैथिक-चिकित्सा से मां शिशु तथा बालक-इनके कष्टï, बिना कष्ट के सहे जा सकते हैं, ये कष्टï ही प्रतीत नहीं होते। सर्वसाधारण जनता का भी यही विश्वास है। किसी होम्योपैथ के क्लिनिक में जाकर देखिये। गर्भवती युवतियां अपनी समस्याओं को लेकर वहां बैठी होंगी, शिशु को गोद में लिये मांगे उनका इलाज कराने वहां बैठी होंगी या बालक की मां या पिता बालक को लेकर उसके रोग का इलाज कराने वहां बैठे होंगे।
ऐलोपैथिक डॉक्टरों की फीस तथा उनकी दवाईयों का मूल्य भरते भरते मां बाप परेशान हो जाते हैं, रोग वैसे का वैसा बना रहता है, अगर माता पिता होम्योपैथी का साधारण सा अध्ययन कर लें, तो अपने आप वे अपने कष्ट को दूर कर सकते हैं। इस पुस्तक में इसी दिशा में प्रकाश डाला जा रहा है।
मां बनने के शारीरिक कष्टï
(क) कष्ट रहित प्रसव की तैयारी-सबसे पहली समस्या जो विवाहिता स्त्री के सम्मुख उपस्थित होती है यह है कि प्रसव के कष्टï को वह कैसे सहन करेगी। प्रसव एक बडे भारी ऑपरेशन के समान है। इस प्रकृति दत्त स्वाभाविक ऑपरेशन को सहज कैसे बनाया जा सकता है? बच्चे के उत्पन्न होने के समय मां को अत्यंत पीड़ा होती है, इसे प्रसव वेदना कहते हैं। यह वेदना न हो तो बच्चा बाहर नहीं आता। यह वेदना हो और इसे आराम से सहा जा सके-इसके लिए होम्योपैथी में एक औषधि है जिसका नाम है कॉलोफाइलम इस औषधि की 30 शक्ति की चार मीठी मीठी गोलियां प्रसव से महीना भर पहले शुरू कर देने से प्रसव सहज हो जाता है। हमने इस औषधि का अन्य औषधियों से पहले उल्लेख इसलिए किया है, क्योंकि यह औषधि अन्य सब औषधियों से अधिक उपयोगी है और इसके लेते रहने से प्रसव के सबसे महान कष्टï का सामना किया जा सकता है।
(ख) गर्भावस्था में उल्टी आने का उपद्रव-गर्भ धारण करने के बाद प्राय: गर्भवती को उल्टी आया करती है। अगर उल्टी का उपद्रव बढ जाए तो कभी कभी जच्चा तथा बच्चा दोनों का जीवन संकट में पड सकता है। एलोपैथी के पास तो इस अवस्था का इलाज सिर्फ इतना है कि मां को बिस्तर में लेटे रहने दें, वह आराम करन्े, खाना कम खाए, भूखी रहे या ग्लूकोज लेती रहे, परंतु इससे बेहद कमजोरी हो जाती है। होम्योपैथी के अनुसार इपिकाक की 30 शक्ति की चार चार गोलियां प्रत्येक उल्टी के बाद देते रहने से यह अवस्था आश्चर्यजनक तौर से वश में आ जाती है। लगातार मितली और वमन, मुंह में पानी भर आना, सब तरह के भोजन में अरूचि इन लक्षणों में सिम्फो रन्ीकारपस को 200 शक्ति में दो बार प्रतिदिन दें।
(ग) पेशाब में एलब्यूमिन आना –
गर्भावस्था में कभी कभी गर्भिणी के पेशाब में एलब्यूमिन आने लगता है। प्रसव विशेषज्ञों की संपत्ति में यह गर्भिणी के लिए खतरे की घंटी है। इसका अभिप्राय यह है कि गर्भावस्था का मां पर अत्यंत बां पड रहा है, मां पर बोझ पडने का अर्थ है-भ्रूण पर मां के भीतर परवरिश पा रहे बच्चे पर। इस प्रकार पेशाब में एलब्यूमिन जाने का परिणाम गर्भिणी को अकडन आदि हो सकते हैं। गर्भिणी को एलब्यूमिन जाने के अकडन पडने लगना चिकित्सक केे लिए चिंता का विषय है। एलोपैथी में इसका इलाज यही है कि किसी अंग पर बोझ न पडने दिया जाए और द्रव पदार्थों का प्रयोग करके शरीर में से विषाक्त पदार्थों को निकालने का प्रयत्न किया जाए। डॉ डगलस बोरडन का अनुभव है कि होम्योपैथिक टेरिअन्यीना 6 शक्तियों का प्रयोग करते रहने से पेशाब में से एलब्यूमिन जाना रूक जाता है और दस्तों की दवा देने की आवश्यकता नहीं रहती, रोगिणी भोजन भी पहले की तरह ही खा सकती है। अगर एलब्यूमिन जाने से शरीर में शोथ दिखलाई दे तो ऐपिस 30 का प्रयोग किया जा सकता है। इस रोग में प्लम्बम अथवा एसिड फॉस का प्रयोग भी लक्षणानुसार किया जाता है। (घ) कब्ज – गर्भावस्था में कब्ज हो जाना भी प्राय: पाया जाता है। देर तक कब्ज रहना गर्भिणी तथा भ्रूण दोनेां के लिए अहितकर है क्योंकि इससे भीतरन् ही भीतर विषाक्त पदार्थ उत्पन्न होकर दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं। कब्ज को दूर करने के लिए जहां भोजन को नियंत्रित करना आवश्यक है, वहां होम्यो चिकित्सा में नक्स वोमिका 30 ओपियम 200 अथवा एलमीना 200 उपयोगी है।
क्रमश:
गर्भिणी या मां बनने के कष्टï
प्रत्येक कन्या जिसका विवाह हो गया है उसे जीवन के तीन भागों में गुजरना पड़ता है। वह गर्भवती होगी जिस अवस्था में उसे गर्भवती होने के कष्टïों में से गुजरना होगा, उसके शिशु होगा, उसे तथा उवके शिशु को शैशव बढक़र बालक बनेगा, बालक को बचपन के कष्टïों में से गुजरना होगा। इन तीन कष्टïों का होम्योपैथी से कैसे मुकाबला किया जा सकता है। इस विषय पर पुस्तक का यह भाग लिखा जा रहा है।
होम्योपैथी का दावा है कि होम्योपैथिक-चिकित्सा से मां शिशु तथा बालक-इनके कष्टï, बिना कष्टï के सहे जा सकते हैं, ये कष्टï ही प्रतीत नहीं होते। सर्वसाधारण जनता का भी यही विश्वास है। किसी होम्योपैथ के क्लिनिक में जाकर देखिये। गर्भवती युवतियां अपनी समस्याओं को लेकर वहां बैठी होंगी, शिशु को गोद में लिये मांगे उनका इलाज कराने वहां बैठी होंगी या बालक की मां या पिता बालक को लेकर उसके रोग का इलाज कराने वहां बैठे होंगे।
ऐलोपैथिक डॉक्टरों की फीस तथा उनकी दवाईयों का मूल्य भरते भरते मां बाप परेशान हो जाते हैं, रोग वैसे का वैसा बना रहता है, अगर माता पिता होम्योपैथी का साधारण सा अध्ययन कर लें, तो अपने आप वे अपने कष्टïों को दूर कर सकते हैं। इस पुस्तक में इसी दिशा में प्रकाश डाला जा रहा है।
मां बनने के शारीरिक कष्टï
(क) कष्टï रहित प्रसव की तैयारी-सबसे पहली समस्या जो विवाहिता स्त्री के सम्मुख उपस्थित होती है यह है कि प्रसव के कष्टï को वह कैसे सहन करेगी। प्रसव एक बडे भारी ऑपरेशन के समान है। इस प्रकृति दत्त स्वाभाविक ऑपरेशन को सहज कैसे बनाया जा सकता है? बच्चे के उत्पन्न होने के समय मां को अत्यंत पीड़ा होती है, इसे प्रसव वेदना कहते हैं। यह वेदना न हो तो बच्चा बाहर नहीं आता। यह वेदना हो और इसे आराम से सहा जा सके-इसके लिए होम्योपैथी में एक औषधि है जिसका नाम है कॉलोफाइलम इस औषधि की 30 शक्ति की चार मीठी मीठी गोलियां प्रसव से महीना भर पहले शुरू कर देने से प्रसव सहज हो जाता है। हमने इस औषधि का अन्य औषधियों से पहले उल्लेख इसलिए किया है, क्योंकि यह औषधि अन्य सब औषधियों से अधिक उपयोगी है और इसके लेते रहने से प्रसव के सबसे महान कष्टï का सामना किया जा सकता है।
(ख) गर्भावस्था में उल्टी आने का उपद्रव-गर्भ धारण करने के बाद प्राय: गर्भवती को उल्टी आया करती है। अगर उल्टी का उपद्रव बढ जाए तो कभी कभी जच्चा तथा बच्चा दोनों का जीवन संकट में पड सकता है। एलोपैथी के पास तो इस अवस्था का इलाज सिर्फ इतना है कि मां को बिस्तर में लेटे रहने दें, वह आराम करन्े, खाना कम खाए, भूखी रहे या ग्लूकोज लेती रहे, परंतु इससे बेहद कमजोरी हो जाती है। होम्योपैथी के अनुसार इपिकाक की 30 शक्ति की चार चार गोलियां प्रत्येक उल्टी के बाद देते रहने से यह अवस्था आश्चर्यजनक तौर से वश में आ जाती है। लगातार मितली और वमन, मुंह में पानी भर आना, सब तरह के भोजन में अरूचि इन लक्षणों में सिम्फो रन्ीकारपस को 200 शक्ति में दो बार प्रतिदिन दें।
(ग) पेशाब में एलब्यूमिन आना –
गर्भावस्था में कभी कभी गर्भिणी के पेशाब में एलब्यूमिन आने लगता है। प्रसव विशेषज्ञों की संपत्ति में यह गर्भिणी के लिए खतरे की घंटी है। इसका अभिप्राय यह है कि गर्भावस्था का मां पर अत्यंत बां पड रहा है, मां पर बोझ पडने का अर्थ है-भ्रूण पर मां के भीतर परवरिश पा रहे बच्चे पर। इस प्रकार पेशाब में एलब्यूमिन जाने का परिणाम गर्भिणी को अकडन आदि हो सकते हैं। गर्भिणी को एलब्यूमिन जाने के अकडन पडने लगना चिकित्सक केे लिए चिंता का विषय है। एलोपैथी में इसका इलाज यही है कि किसी अंग पर बोझ न पडने दिया जाए और द्रव पदार्थों का प्रयोग करके शरीर में से विषाक्त पदार्थों को निकालने का प्रयत्न किया जाए। डॉ डगलस बोरडन का अनुभव है कि होम्योपैथिक टेरिअन्यीना 6 शक्तियों का प्रयोग करते रहने से पेशाब में से एलब्यूमिन जाना रूक जाता है और दस्तों की दवा देने की आवश्यकता नहीं रहती, रोगिणी भोजन भी पहले की तरह ही खा सकती है। अगर एलब्यूमिन जाने से शरीर में शोथ दिखलाई दे तो ऐपिस 30 का प्रयोग किया जा सकता है। इस रोग में प्लम्बम अथवा एसिड फॉस का प्रयोग भी लक्षणानुसार किया जाता है। (घ) कब्ज – गर्भावस्था में कब्ज हो जाना भी प्राय: पाया जाता है। देर तक कब्ज रहना गर्भिणी तथा भ्रूण दोनेां के लिए अहितकर है क्योंकि इससे भीतरन् ही भीतर विषाक्त पदार्थ उत्पन्न होकर दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं। कब्ज को दूर करने के लिए जहां भोजन को नियंत्रित करना आवश्यक है, वहां होम्यो चिकित्सा में नक्स वोमिका 30 ओपियम 200 अथवा एलमीना 200 उपयोगी है।
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