धर्म,संस्कृति और संस्कार

भारतीय संकृति का आर्थ प्राचीनकाल से चले आ रहे संस्कारों के पालन से है। संकृति शब्द का आधुनिक अर्थ प्राचीनकाल के आचार-सदाचार, मान्यताओं एंव रीति-रितीरिवाजों से भी है। एक अर्थ में मनुष्य की आधिभौतिक, आधिदैविक एंव आध्यात्मिक उन्नति के लिये की गई भारतीय परिवेश की सम्यक चेष्टाये ही संकृति हैं। भारतीय संस्कृति किसी एक वर्ण की न होकर चारों वर्णों की मूलभूत विरासत है। यदि यह कहा जाय कि भारत में रहने वाले प्राचीन ऋषियों द्वारा निर्धारित मान्ताओं के अनुरूप चलना भारतीय संस्कृति है तो कोई दोष नहीं। वेद या अन्य धर्मग्रंन्थों के आचार-विचार में भारतीय संस्कृति का स्वरूप निहित है। भारतीय संस्कृति में सामाजिक, आर्थिक,राजनैतिक,कला-कौशल,ज्ञान-विज्ञान,उपासना अदि समस्त परिवेश आ जाता है। संस्कृति एक प्रकार से संस्कारों का समुच्चय है।सनातन-परम्परा के अनुरूप संस्कृारित की हुई पद्घति ही संस्कृति है। सभ्याता संस्कृति से भिन्न है। संस्कृति के किसी एक भाग को सभ्यता कहका जाता है। क्योंकि सभ्यता काल व परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है जैसे -रामायण-कालीन सभ्यता, महाभारत-कालीन सभ्यता, मुगल-कालीन सभ्यता आदि विदेशी प्रभाव भी सभ्यता पर पड़ता है। किन्तु संस्कृति शाश्वत परम्परा से चलती रहती है। सभ्यता शरीर है तो संस्कृति उसका आत्मा। संस्कृति अनुभवजन्य ज्ञान के और सभ्यता बुद्घिजन्य ज्ञान के आधार पर निर्भर है। सभ्यता से सामाजिा व आर्थिक जीवन प्रभावित होता है जबकि संस्कृति से आध्यात्मिक जीवन। संस्कृति जीवन की राह बता कर व्यक्ति को जीवनपथ पर आगे बढ़ाती है। भारतीय संस्कृति प्रत्येक जाति,प्रत्येक व्यक्ति को स्वधर्मानुसार चलने की स्वतंत्रता देती है। इसी लिए इसका स्वधर्मे निधन श्रेय: सिद्घान्त रहा है। मानव जीवन के कार्य-कलापों को भारतीय संस्कृति ने चार आश्रामों में बांटा है। मनुष्य की आयु 100 वर्ष की मानी गई है थाी।

1. ब्रम्हाचर्याश्रय:-
इसमें 25 वर्षों तक विद्याध्ययन का प्रावधान रखा गया हैर। गुरूकुल यो विद्यालय में गुरू के
सानिध्य में विद्या ग्रहण की जाती थी।
2. गृहस्थाश्रम:-
इसमें 50 वर्षों तक की आयु मानी है। गृहस्थधर्म का पालन करने का इसमें प्रावधान है। परिवार, समाज व देश के प्रति उत्तरदायित्व का भान व्यक्ति को होना चाहिए।
3. वानप्रस्थाश्रम:-
इसमें सांसारिक झंझटों से मुक्त होकर धर्मपरायण होकर समाजसेवा व ईश्वराराधना को
समय देना इसका उद्देस्यहै। यह 50 वर्ष 75 वर्ष का काल है।
4. संन्यासाश्रम:-
इस काल में सासारिक कार्यों व झंझटों से मुक्त होकर मार्ग अपनाना चाहिऐ। 75 वर्ष से 100 वर्ष के बीच का यह समय है।इस अवस्था में धर्म अध्यात्म-चिन्तन पर विशेष बल दिया गया है। संस्कृति और धर्म का परम्परा घनिष्टï सम्बन्ध है। किन्तु वह धर्म पाखण्ड व दकियानूसी विचारों से मुक्त होना चाहिए। धर्म का सामान्य अर्थ कत्र्तव्य से लिया जाता है वैसे धर्म शाब्दिक अर्थ धारण करने से है। महार्षि कणाद ने कहा है:- यतो भ्युदयनि:श्रोयससिद्घि: स धर्म:।
जिससे इस लोक में उन्नति और परलोक में कल्याण या मोक्ष की प्राप्ति हो, वह धर्म है। मनु धर्म की परिभाषा तो नही करते दीखते हैं, किन्तु वेद को धर्म का मूल मानते हुए कहते हैं-
वेदोखिलोधर्ममूलम्। ( मनुस्मृति 2-6) धर्म की परिभाषा इस प्रकार भी की गई है। वेदविहितत्वम् अर्थात् जो वेद में कहा गया वह धर्म है।धार्यते अनेन इति धर्म:, अर्थात जो धारण करने योग्य है वह धर्म है। सच्चे अर्थों में धर्म सर्वजनहितकारी सत्प्रवृत्तियों का आदर व उनका प्रसार करना सिखाता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी हैं 32 प्रकार के धर्मों का उल्लेख किया है। धर्ममय कर्म ही संस्कृति के अंग हो सकते हैं। यद्यपि धर्म तथा संस्कृति में पर्याप्त अंतर है पर धर्म जिन पर आधारित है संस्कृति भी उनसे ही संबंधित रहती है। सभी राष्ट्रों की अपनी-अपनी संस्कृति प्यारी रही है किन्तु उनमें भारत की संस्कृति प्राचीनतम है। उसका मुख्य कारण है आध्यात्यमिकता के प्रति प्रेम, अध्यात्म में आस्था भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।

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