वैदिक सम्पत्ति गतांक से आगे…

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इन उपदेशों को अश्लील न समझना चाहिये । आगे इसी विवाहप्रकरण में गर्भाधानसंस्कार के लिए देता है कि-

आ रोह तल्पं सुमनस्यमानेह प्रजां जनय पत्ये अस्मै।
इन्द्राणीव सुबुधा बुध्यमाना ज्योतिरगरा उषसः प्रति जागरासि । (अथर्व० 14/2/31)
देवा अग्रे न्यपद्यन्त पत्नी: समस्पृशन्त तन्वस्तनूभिः ।
सूर्येव नारि विश्वरूपा महित्वा प्रजावती पत्या सं भवेद् ॥ (अथर्व ० 14/2/32)

तां पूषञ्छिवतमामेश्यस्य यस्यां बीजं मनुष्या ३ वपन्ति ।
या न ऊरू उशती विश्रयाति: यस्यामुशन्तः प्रहरेम शेषः ।। (अथर्व०14/2/38)
प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् येन त्वाबध्नात् सविता सुशेवाः ।
उरूं लोकं सुगमत्र पन्थां कृणोमि तुभ्यं सहपत्न्यै वधु ।। (अथर्व०14/1/58)
आ रोहोरूमुप धत्स्व हस्तं परि ष्वजस्व जायां सुमनस्यमानः ।
प्रजां कृण्वाथामिह मोदमानी दीर्घ वामायुः सविता कृणोतु ।। (अयर्व०14/2/39)
यद् दुष्कृतं यच्छमलं विवाहे वहतौ च यत् ।
तत संभलस्य कम्बले मृज्महे दुरितं वयम् ।। (अथर्व०14/2/66)

अर्थात् हे वधू ! तू प्रसन्नचित होकर इस पर्यंक पर चढ़ और इस अपने पति के लिए सन्तान को उत्पन्न कर तथा इन्द्राणी को भाति हे सौभाग्यवती ! बुद्धिमानी से सूर्य निकलने के पहिले उषःकाल ही में जागना । विद्वान् लोग पहिले भी अपनी पत्नियों को प्राप्त हुए हैं और अपने शरीरों को उनके शरीरों से अच्छी तरह मिलाया है, इसलिए है बड़े ऐश्वर्यवाली और प्रजा को प्राप्त होनेवाली स्त्री ! तू भी अपने इस पति से मिल । हे पालनकर्ता परमेश्वर ! जिस स्त्री में आज बीज बोता है, उसको प्रेरित कीजिये कि जिससे वह हमारी कामना करती हुई अपनी जांघों को फैलावे और हम कामना करते हुए अपनी गुप्तेन्द्रिय का प्रहार करें। हे वधू! मैं तेरे पति के द्वारा जंघा प्रदेश के गुप्त मार्ग को सुगम करता हूँ और तुझे उस वरुणा के उत्कृष्ट बंधन से छुड़ाता हूँ, जिसको सविताने बाँधा है। हे पुरुष ! तू जाँघों के ऊपर आ जा, हाथ का सहारा दे, प्रसन्नचित होकर पत्नी को चिपका ले और हर्ष मनाते हुए तुम दोनों सन्तान को उत्पन्न करो, जिससे सविता देव तुम दोनों की आयु को बढ़ावें। इस वैवाहिक कार्य से जो मलिनता हम दोनों के द्वारा हुई है, उस कम्बल के दाग को धो डालें। इन मंत्रों में गर्भाधान क्रिया का उपदेश आयुर्वेदिक विज्ञान के अनुसार किया गया है।

सबसे पहिले मन्त्र में गर्भाधान के लिए रात्रि का समय बतलाया गया है, दिन का समय नहीं। क्योंकि कहा गया है कि उषःकाल के पहिले ही जागना। इसका यही मतलब है कि दिन के समय में लज्जा और संकोच होता है। दूसरे मंत्र में आलिङ्गन का उपदेश है। आलिङ्गन से विद्यतु परिवर्तन होता है, भय दूर होकर आनन्द का उद्रेक होता है और लज्जा का निवारण होता है, जो प्रायः प्रथम समाग्राम के समय में स्त्रियों में होती है। इसलिए तीसरे मंत्र में कहा है कि स्त्री प्रसन्नतापूर्वक इस कार्य में सम्मिलित हो । चौथे मन्त्र में बतलाया गया है कि समागम के पूर्व प्रत्येक स्त्री का गर्भमार्ग एक बारीक झिल्ली से ढका रहता है, इसलिए पुरुष को उससे सावधान रहना चाहिये और ऐसा मौका न आने देना चाहिये कि जिससे स्त्री को कष्ट हो । पाँचवें मंत्र में स्वाभाविक आसन का वर्णन किया गया है जिसका यही मतलब है कि उलटे टेढ़े आसनों का उपयोग न हो। क्योंकि अस्वाभाविक आसनों से सन्तान विकलांग उत्पन्न होती है। पाँचवें मंत्र में कार्यनि- वृत्ति के बाद सचैल स्नान करने का उपदेश है। जिसका मतलब स्वच्छता और आरोग्य रक्षा है। इन सब उपदेशों के तीन तात्पर्य हैं। पहिला यह है कि प्रथम समागम का ब्रह्मचर्ययुक्त रजवीर्य अज्ञानता के कारण व्ययं न चला जाय, किंतु गर्भ अवश्य स्थापित हो जाय। इसलिए रात्रि के समय का, आलिङ्गन का, स्त्री के प्रसन्नतापूर्वक सम्मिलित होने का उपदेश और स्वाभाविक आसन का उपदेश किया गया है। दूसरा यह है कि सन्तान सर्वाङ्गसुन्दर और उत्तम हो: इसलिए भय, लज्जा, संकोच और कष्ट का निवारण बतलाया गया है और तीसरा यह कि दम्पति की आरोग्यता कायम रहे, इसलिए आनन्द और शुद्धता का उपदेश किया गया है। सब उपदेश का मतलब यही है कि ब्रह्मचर्ययुक्त रजवीर्य से सर्वगुणसम्पन्न सन्तान उत्पन्न हो जाय और दम्पति के आरोग्य में बाधा उपस्थित न हो।
क्रमशः

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