क्या ‘एक मौत’ गृहयुद्ध करवा सकती है, सरकारें बदल सकती है???

26 जनवरी को एक कथित किसान नवनीत सिंह की मौत हो गयी। मीडिया ने हल्ला मचाया कि पुलिस ने गोली मार दी, लेकिन CCTV फुटेज से पता लगा कि नवनीत साहब तो स्टंट कर रहे थे, तेजी से ट्रेक्टर चला कर बैरिकेड्स पर चढ़ा दिया, जिससे ट्रेक्टर पलटा और उसकी मौत हो गई।

लेकिन इस एक अदद हिस्से में आई मौत को विपक्ष और मीडिया, येन केन प्रकारेण…..पुलिस के अत्याचार से जोड़ने में लगी रही। फिर चाहे वो The Wire की फर्जी स्टोरी हो, जिसमे एक डॉक्टर ने कथित रूप से कहा कि ‘our hands are tied’ , मतलब सरकार ने दबाव बना रखा है…..कुल मिलाकर ये दिखाया जा रहा था कि मौत गोली मारने से ही हुई है। बाद में रामपुर के CMO ने बाकायदा बयान दिया और स्टेटमेंट जारी किया कि मौत एक्सीडेंट से ही हुई, शरीर से कोई गोली नही मिली।

लेकिन गिद्धों ने तो आतंक मचा दिया, सोशल मीडिया पर पोस्ट्स, Wire के आर्टिकल्स घूम रहे थे। फिर FIR हुई और अब सरकार एक्शन लेगी और कथित ‘सेक्युलर-लिबरल’ गैंग का रोना धोना शुरू हो जाएगा।

यहां सवाल ये है, कि इस एक्सीडेंट से हुई मौत को क्यों पुलिस द्वारा गोली मारने पर जोर दिया जा रहा है? क्या इस मौत से माहौल बदल सकता है? क्या इससे गृहयुद्ध छिड़ सकता है? क्या सरकार जा सकती है?

इन सबके उत्तर हैं……हाँ

चलिए आपको एक कहानी सुनाते हैं…..शायद तब समझ आये कि आखिर चल क्या रहा है आपके आस पास

इस कहानी की शुरुआत होती है 17 दिसंबर 2010 को, जिस दिन ट्यूनीशिया के एक आम नागरिक मुहम्मद बुज़ीजी ने अपने आपको आग लगा ली थी। वो काफी हद तक जल गए थे, और 4 जनवरी 2011 को उनकी मौत हो गयी।

आग क्यों लगाई??
मुहम्मद बुजीजी एक आम नागरिक थे, नौकरी चली गयी, काम धंधा मिला नही, इसलिए एक सब्जियों की दुकान लगा ली। नगरपालिका वाले आये और रिश्वत मांगने लगे, नही देने पर उनका सारा सामान उठा कर ले गए। इस घटना से दुखी हो कर उन्होंने आग लगा ली, और बाद में उनकी मृत्यु हो गयी।

अब थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं….मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के जितने भी इस्लामिक देश हैं, कुछ एक को छोड़ कर सभी मे तानाशाही/राजशाही थी या फिर किसी एक ही शासक का राज चल रहा था। लोग वहां के शासन से परेशान थे। कानून व्यवस्था ठीक थी, लेकिन कामगारों के कानून और नौकरियों को लेकर काफी समस्याएं थी।

इजिप्ट हो, अल्जीरिया हो, ट्यूनीशिया हो, वेस्टर्न सहारा इलाका हो, यमन हो, जॉर्डन हो…इन सभी देशों में कहीं ना कहीं सत्ता विरोध पनप रहा था। इसके पीछे मुख्य कारण गरीबी, नौकरियों की कम संख्या, हड़ताल, लंबे समय से सत्ता का ‘एक’ ही हाथ मे होना था।

इन सभी देशों में 2004 से ही छोटे मोटे प्रदर्शन होते रहे, लेकिन सरकारें सुरक्षित थी। छोटे मोटे उपद्रव होते रहे….लेकिन ऊपर की सतह पर सब शांत ही दिखता था।

2009-2010 में स्थिति बदली….सोशल मीडिया पैर जमा चुका था…भारत मे लोग तब ट्विटर से अनजान थे, और फेसबुक को दोस्तो से जुड़ने का एक माध्यम मात्र माना जाता था। लेकिन मिडिल ईस्ट में यही सोशल मीडिया अगले 1-2 साल में एक बहुत बड़ी सुनामी लाने वाला था।

अब वापस आते हैं बुजीजी कि मौत पर। जिस दिन बुजीजी ने अपने आपको आग लगाई, ट्यूनिशिया में एकाएक बवाल शुरू हो गया। ऐसा लगा कि शायद जिस घटना का इंतज़ार था, वो घट गई है। पूरे ट्यूनिशिया में जबरदस्त सत्ता विरोध होने लगा। देखादेखी आस पास के देशों में भी उपद्रव शुरू हो गए।

4 जनवरी 2011 को बुजीजी की मौत हुई, और पिछले 19 दिनों से ‘एक मौत’ के इंतज़ार में बैठे गिद्ध अब काम मे लग गए। सोशल मीडिया का जम कर इस्तेमाल हुआ। ढेरो ट्वीट्स, पोस्ट्स, फोटो, वीडियो शेयर होना शुरू हुए। उंस समय तो Fake News का कांसेप्ट भी लोगो को समझ नही आता था…..लेकिन गिद्धों को इस सोशल मीडिया की ताकत का पता था। कुछ ही घंटों में पूरे मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में लाखों वीडियो और पोस्ट, जिनमे सरकारी अत्याचार दिखाया जा रहा था (सच और झूठ) हर इंसान के फ़ोन में पहुँचा दिए गए।और उसके बाद जो हुआ, उसकी कल्पना भी नही की थी किसी ने।

अरब स्प्रिंग – Arab Awakening
जनवरी 2011 से दिसंबर 2012 तक, मिडिल ईस्ट ,अरब और अफ्रीका के देशों ने एक अचंभित करने वाला कृत्य देखा और महसूस किया। बुजीजी की मौत ने पिछले 5-7 साल से चले आ रहे गुस्से को नफरत के विस्फोट में बदल दिया, और ये पूरा रीजन एक भयावह स्थिति में पड़ गया।

इजिप्ट, सीरिया, ट्यूनिशिया, यमन, लीबिया, बहरीन, कुवैत, सूडान, सऊदी अरब, मोरक्को, इराक़ जैसे कई देश इस आग की चपेट में आ गए। सत्ता विरोध शुरू हुआ और इसका अगला प्रतीक बना इजिप्ट का ‘तहरीर चौक’ जिसे Tahrir Square कहा जाता है। लाखो लोगो ने एक sqaure पर इकट्ठे हो कर धरना दिया और सरकारों को झुकने पर मजबूर कर दिया।

तौर तरीके जो इस्तेमाल किये गए
इस पूरे घटनाक्रम में पुराने तरीको के अलावा कुछ नए और अनजाने तरीके भी इस्तेमाल किये गए।

नीचे कुछ शब्द दे रहा हूँ, इन्हें कृपया अपनी डिक्शनरी में ढूँढिये,पढिये और समझिए। भारत मे भी अब आपको ये शब्द आसानी से सुनने को मिल रहे हैं, मिलते रहेंगे।

Political activism, Civil Disobedience, Civil Unrest, Protest, Defection, Insurgency, Media Activism, Social Media Activism, Riots, Self Immolation, Mutiny, Defection, Internet Activism, Urban Warfare, Silent Protests, Silent Uprising, Revolution and last but not the least ‘Huriya’…that means आज़ादी।

रातों रात सैकड़ो फेसबुक पेज बने, हजारो ट्विटर हैंडल बनाये गए। लोगो को mobilize करने का काम शुरू हुआ। लोगो को इकट्ठा करना अब काफी आसान था, फिर चाहे शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट्स हो, पत्थरबाजी करनी हो…ये सब अब एक ट्वीट या एक फेसबुक पोस्ट से संभव था। सरकार विरोधी ब्लॉग्स और वेबसाइट की बाढ़ आ गयी, आज़ादी और ह्यूमन राइट्स के किस्से कहानी सुना कर लोगो को भड़काना शुरू किया गया। ट्यूनिशिया में एक सर्वे किया गया था, जिसमे 90% लोगो ने कहा कि इस uprising में उनका मुख्य टूल था सोशल मीडिया। सोशल मीडिया को रोकना आसान नही था, क्योंकि तब तक इसके प्रभाव के बारे में सत्ता में रहने वाले लोगो को अंदेशा ही नही था। सत्ता केवल मीडिया पर रोक लगा सकती है, यहां तो स्मार्टफोन रखने वाला हर इंसान एक पत्रकार की भूमिका निभा सकता था।

अरब स्प्रिंग से हासिल क्या हुआ?
लोगो को भड़काया गया, उन्हें ये दिखाया गया कि तुम्हारी जिंदगी बर्बाद है, आइये इस गुलामी से, इस गुरबत की ज़िंदगी से आज़ादी लेते हैं। सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा लोगो को भड़काया गया। मोहम्मद बुजीजी की मौत, उसके जलने के दृश्य, अस्पताल में उसकी तस्वीरों से हर स्मार्टफोन को भर दिया गया। जाहिर है, जब आपको एक ही तरह का कंटेंट मिलेगा, तो भड़कना लाजिमी है। और आप किसी को भी कहें कि आपकी जिंदगी में में दुख है, कमी है, आप पर अत्याचार हो रहा है….तो 99.9% लोग किसी न किसी रूप में सहमति जता ही देंगे। लोग अमूमन अपनी जिंदगी से खुश नही हैं।

अरब स्प्रिंग की वजह से कई देशों में सत्ता पलट गई। ट्यूनिशिया, लीबिया, यमन, इजिप्ट जैसे देशो में बड़े ही हिंसक तरीके से सत्ता बदली गयी। लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को लोगो ने अपने हाथों से मार दिया। सीरिया में असद के खिलाफ Civil war शुरू हो गया। अरब, कुवैत, बहरीन जैसे देशों ने इस अरब स्प्रिंग को ताकत से कुचल दिया। मोरक्को, जॉर्डन और फिलिस्तीन में वहां के सत्ताधीशों ने जरूरी बदलाव किए और जान बचाई।

कुल मिलाकर 61,000 लोगो की अपनी जान गंवानी पड़ी। सीरिया में सिविल वॉर की वजह से ISIS का उद्भव हुआ और वो धीरे धीरे सिरिया से होते हुए इराक़ और अन्य इलाकों तक पहुच गया। उसके द्वारा हुई कत्ल ए आम को जोड़ दें, तो ये संख्या लाखो में पहुचेगी।

गिद्धों ने जनता को एक छद्म लोकतंत्र और आज़ादी का लॉलीपॉप दिया, जनता मासूम थी और पड़ गयी इस चक्कर मे। सत्ता भी गयी, देश भी जल गया…..आज तक ये देश संभल नही पाए हैं। कोई भी चाहे तो इन देशों की इकनोमिक, न्याय व्यवस्था, आम नागरिक के जीवन स्तर, काम धंधे, आम जनजीवन के स्तर के बारे में तथ्यात्मक आंकलन करे, तो ये पता लगेगा कि 2010 से पहले और 2010 के बाद इन सभी इंडीकेटर्स में जबरदस्त गिरावट आई है।

तो सवाल है कि आखिर मिला क्या? उत्तर है ‘कुछ नही’

अब घूम फिर कर भारत पर आते हैं। किसानों का आंदोलन चल रहा है…..उससे पहले दलितों का आंदोलन चला, CAA के नाम पर मुसलमानों का आंदोलन चला, कभी जाट आंदोलन चलता है, कभी गुज्जर आंदोलन चलता है। ये सब हमारी ‘Fault Lines’ हैं…जैसे जमीन के अंदर fault lines होती हैं…उनके हिलने डुलने से भूकंप आता है…..वैसे ही ये सब हमारे देश की फाल्ट लाइन्स है। समय समय पर इनकी testing होती है। इस बार माहौल एकदम गर्म था। खालिस्तानियों द्वारा इसको हवा दी गयी, मासूम किसानो को भड़का कर दिल्ली के मुहाने पर लाया गया। 2 महीने की घेराबंदी के बाद 26 जनवरी को चुना गया Action Day के लिए।

वो हर कोशिश की गई, जिससे पुलिस या सरकार को भड़काया जाए। वो हर काम किया गया जिससे किसी का भी खूब उबाल मारे और बदले में हाथ उठा दिया जाए। लेकिन एक गोली नही चली, एक भी जान नही गयी।

क्या होता अगर एक भी मौत होती?
लाल किला ‘तहरीर स्क्वायर’ में बदल जाता…..सोशल मीडिया, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय घेराबंदी होती, देश भर में दंगे होते, सरकार को किसान विरोधी और सिख विरोधी बताया जाता….और emotional stories से मीडिया को पाट दिया जाता। उसमे हम आप जैसे ‘भक्त’ भी फंस जाते। और फिर शुरू होता India Spring या Indian Uprising….. जिसका परिणाम होता भारत मे लोकतंत्र का खात्मा। ये गिद्ध वो सब काम कर रहे थे जो arab spring के समय किये गए। आप ऊपर जा कर पढिये, और अरब की जगह भारत सोचिए….क्या ये सब अब भारत मे नही किया जा रहा?

आज गिद्ध परेशान हैं, जान बूझकर एक एक्सीडेंट की मौत को सत्ता द्वारा की गई हत्या साबित नही कर पा रहे। इन्हें दुख है कि नवनीत सिंह को मुहम्मद बुजीजी नही बनाया जा सके। इन्हें दुख है कि लाल किले तक इनके लोग पहुच गए, फिर भी सरकार ने एक भी गोली क्यों नही चलाई। इन्हें दुख है कि हजारो करोड़ की फंडिंग फूंकने के बाद भी इनके हाथ कुछ नही लगा।

चलिए गिद्धों के तो दुख है…..लेकिन आम जनता का क्या…..क्या आपको पता भी है कि पर्दे के पीछे खेल क्या चलते हैं? पैटर्न्स समझना सीखिए, घटनाओं को सही context में देखना सीखिए…..चीजें जो होती हैं, अमूमन वैसी दिखती नही। कभी कभी Inaction ही सबसे बड़ा Action होता है…..think strategically……else you will be doomed very soon……Vultures are here to stay for long…buckle up and brace for more such attacks….all they need is 1 bloody dead body.

प्रस्तुति : मां राजलक्ष्मी (अमेरिका)

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