आर्य संस्कृति का एक महान ग्रंथ महाभारत

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महाभारत

महाभारत आर्य संस्कृति का एक महान ग्रंथ है। इसमें मुख्य रूप से कौरव-पांडवों के संघर्ष की कथा है। इसके रचयिता भगवान वेदव्यास माने जाते हैं, जो कौरव-पांडवों के समकालीन थे। यह ज्ञान का भंडार है। कहा जाता है कि जो महाभारत में है वह कहीं नहीं है। इसलिए बहुत से विद्वान इसे “पाँचवाँ वेद” कहते हैं। इसमें अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि महाभारत ज्ञान का एक विराट कोष है।

महाभारत को लिखे गये पाँच हज़ार वर्ष से अधिक हो गये हैं, लेकिन इसमें भारत के भूगोल और बहुत मात्रा में इतिहास का जो वर्णन है वह आज भी लगभग सारा सत्य है। आश्चर्यजनक रूप से इसकी भाषा सरल संस्कृत है, जो सबकी समझ में आने वाली है। इसकी भाषा बहुत सीमा तक वाल्मीकि रामायण की भाषा से मिलती-जुलती है, जिसे लगभग ९ हज़ार वर्ष पूर्व लिखा हुआ माना जाता है।

इस महाकाव्य का नाम प्रारम्भ में “जय” था और कहा जाता है कि इसमें केवल ८ हज़ार श्लोक थे। बाद में इसी का विस्तार करके “भारत” महाकाव्य लिखा गया, जिसमें २४ हज़ार श्लोक थे। इसके रचयिता वैशम्पायन व्यास थे, जो कृष्ण द्वैपायन व्यास (वेदव्यास) से भिन्न थे। बाद में अन्य विद्वानों ने भी इसका विस्तार किया और इसमें लगभग एक लाख श्लोक हो गये। इसका नाम भी “महाभारत” रख दिया गया। अब यही प्रचलित है और इस पूरे महाकाव्य को भगवान वेदव्यास की ही रचना माना जाता है।

वर्तमान में गीता प्रेस गोरखपुर ने जो “महाभारत” महाकाव्य प्रकाशित किया है, उसमें ९३ हज़ार से अधिक श्लोक हैं, जिनमें साढ़े ६ हज़ार के लगभग दाक्षिणात्य पाठ के श्लोक हैं। शेष उत्तर भारतीय पाठ के हैं। इन श्लोकों को १८ पर्वों में व्यवस्थित किया गया है और उनको ६ खंडों में ६६२० पृष्ठों में प्रकाशित किया गया है। प्रत्येक पर्व में अनेक अध्याय हैं। सभी १८ पर्वों में कुल २१०७ अध्याय है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि महाभारत में भी वाल्मीकि रामायण की तरह प्रक्षेपकारों ने मनमानी मिलावट की है और महाभारत की मूल कथा से हटकर बहुत से आख्यान और उपाख्यान जोड़े गये हैं। “वाल्मीकि रामायण” के नायक जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम हैं, वहीं “महाभारत” के नायक वासुदेव श्री कृष्ण हैं। महाभारत में श्री कृष्ण की कथा भी बहुत अंशों में दी गयी है।

हम इस महाकाव्य का अध्ययन क्रमशः अध्यायों के अनुसार करेंगे और प्रत्येक अध्याय का सारांश प्रस्तुत करेंगे। हम उन अध्यायों को छोड़ते चलेंगे, जिनका कौरव-पांडवों और श्री कृष्ण से सीधा सम्बन्ध नहीं होगा। इसके अलावा परस्पर विरोधी बातें होने पर हम उनका परीक्षण करके सुसंगत बातों को ही स्वीकार करेंगे। हमारा उद्देश्य केवल कौरव-पांडवों की कथा प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि इसमें उपलब्ध ज्ञान के मोती चुनना भी रहेगा।

मेरे द्वारा लिखित “वाल्मीकि रामायण” शृंखला को बहुत सी देवियों और सज्जनों ने पसन्द किया और “महाभारत” को भी इसी प्रकार प्रस्तुत करने का आग्रह किया, इसीलिए मेरा साहस यह कार्य प्रारम्भ करने का हुआ है। प्रभु कृपा और आप सबके आशीर्वाद से यह कार्य भी सम्पन्न होगा, इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है।

जय श्री कृष्ण ! 🙏😊

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
आषाढ़ शु. ४, सं. २०८० वि. (७ जून, २०२३)

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