14 मार्च 1888 को मेरठ में दिए गए अपने भड़काऊ भाषण में सर सैयद अहमद खान ने स्पष्ट कर दिया था कि हिंदू-मुस्लिम मिलकर इस देश पर शासन नहीं कर सकते । अपने भाषण में उन्होंने कहा- “सबसे पहला प्रश्न यह है कि इस देश की सत्ता किसके हाथ में आनेवाली है ? मान लीजिए, अंग्रेज़ अपनी सेना, तोपें, हथियार और बाकी सब लेकर देश छोड़कर चले गए तो इस देश का शासक कौन होगा ? क्या उस स्थिति में यह संभव है कि हिंदू और मुस्लिम कौमें एक ही सिंहासन पर बैठें ? निश्चित ही नहीं। उसके लिए आवश्यक होगा कि दोनों एक दूसरे को जीतें, एक दूसरे को हराएँ । दोनों सत्ता में समान भागीदार बनेंगे, यह सिद्धांत व्यवहार में नहीं लाया जा सकेगा।”

उन्होंने आगे कहा- “इसी समय आपको इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि मुसलमान हिंदुओं से कम भले हों मगर वे दुर्बल हैं, ऐसा मत समझिए। उनमें अपने स्थान को टिकाए रखने का सामर्थ्य है। लेकिन समझिए कि नहीं है तो हमारे पठान बंधु पर्वतों और पहाड़ों से निकलकर सरहद से लेकर बंगाल तक खून की नदियाँ बहा देंगे। अंग्रेज़ों के जाने के बाद यहाँ कौन विजयी होगा, यह अल्लाह की इच्छा पर निर्भर है। लेकिन जब तक एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को जीतकर आज्ञाकारी नहीं बनाएगा तब तक इस देश में शांति स्थापित नहीं हो सकती।”
उन्होंने कहा कि भारत में प्रतिनिधिक सरकार नहीं आ सकती , क्योंकि प्रतिनिधिक शासन के लिए शासक और शासित लोग एक ही समाज के होने चाहिए।”

हिन्दुओं ने हमें गुलाम बनाया है

सर सैयद अहमद खान को इस बात पर सदा गर्व रहा कि मुसलमानों ने हिंदुस्तान को गुलाम बनाया है। इसके साथ ही उन्हें इस बात पर भी गर्व था कि अब हम पर शासन करने के लिए अंग्रेज कौम यहां आई है। उन्हें इस बात पर कष्ट होता था कि आज हिंदू समाज हमें गुलाम बनाए हुए हैं। कितनी उल्टी बात है कि जो उस समय हमको गुलाम बनाए हुए लोग थे अर्थात अंग्रेज उन पर तो सर सैयद अहमद खान गर्व करते थे और जो देश की आजादी के लिए काम करने वाले लोग थे उन हिंदुओं पर उन्हें शर्म आती थी। वे उस समय हिंदुओं के बारे में मिथ्या प्रचार करते थे कि उन्होंने हमको गुलाम बनाया हुआ है।
यही कारण था कि सर सैयद अहमद खान ने अपने उपरोक्त भाषण में मुसलमानों को उत्तेजित करते हुए कहा- “जैसे अंग्रेज़ों ने यह देश जीता वैसे ही हमने भी इसे अपने आधीन रखकर गुलाम बनाया हुआ था। …अल्लाह ने अंग्रेज़ों को हमारे शासक के रूप में नियुक्त किया हुआ है। …उनके राज्य को मज़बूत बनाने के लिए जो करना आवश्यक है , उसे ईमानदारी से कीजिए ( अर्थात ऐसे काम करिए कि जिससे अंग्रेज भारत को छोड़ न सकें क्योंकि उनका यहां बने रहना ही मुसलमानों के हित में है ) । …आप यह समझ सकते हैं मगर जिन्होंने इस देश पर कभी शासन किया ही नहीं, जिन्होंने कोई विजय हासिल की ही नहीं, उन्हें (हिंदुओं को) यह बात समझ में नहीं आएगी। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि आपने बहुत से देशों पर राज्य किया है । आपने 700 साल भारत पर राज किया है। अनेक सदियाँ कई देशों को अपने आधीन रखा है। मैं आगे कहना चाहता हूँ कि भविष्य में भी हमें किताबी लोगों की शासित प्रजा बनने के बजाय (अनेकेश्वरवादी) हिंदुओं की प्रजा नहीं बनना है।”

जातीय अहंकार हावी था सर सैयद अहमद खान पर

इस प्रकार स्पष्ट है कि सर सैयद अहमद खान हिंदुओं और हिंदुस्तान के उस गौरवशाली इतिहास को पूर्णतया उपेक्षित करके चलते थे जो यह स्पष्ट करता था कि कभी संपूर्ण भूमंडल पर इन आर्यों का शासन हुआ करता था। इतिहास की विकृत परिभाषा और भाषा के कारण ही सर सैयद अहमद खान जैसे लोग भारत के बारे में यह कहने में कोई संकोच नहीं करते थे कि इन लोगों ने अर्थात हिंदुओं ने कभी शासन किया ही नहीं। यदि उनके भीतर हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियत की तनिक सी भी भावना होती तो वह निश्चय ही भारत के गौरवशाली वैदिक इतिहास का अध्ययन करते। वे जातीय अहंकार में सड़े हुए थे।
2 दिसंबर 1887 को वह लखनऊ में मुस्लिम समाज के सामने यह बताते हुए स्पष्ट करते हैं कि किस तरह लोकतंत्र निरर्थक है ? वे कहते हैं- “कांग्रेस की दूसरी माँग वाइसरॉय की कार्यकारिणी के सदस्यों को चुनने की है। समझो ऐसा हुआ कि सारे मुस्लिमों ने मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट दिए तो हर एक को कितने वोट पड़ेंगे ? यह तो तय है कि हिंदुओं की संख्या चार गुणा ज़्यादा होने के कारण उनके चार गुणा ज़्यादा सदस्य आएँगे, मगर तब मुस्लिमों के हित कैसे सुरक्षित रहेंगे। …अब यह सोचिए कि कुल सदस्यों में आधे सदस्य हिंदू और आधे मुसलमान होंगे और वे स्वतंत्र रूप से अपने-अपने सदस्य चुनेंगे। मगर आज हिंदुओं से बराबरी करनेवाला एक भी मुस्लिम नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा- “पल भर सोचें कि आप कौन हैं? आपका राष्ट्र कौन सा है? हम वे लोग हैं जिन्होंने भारत पर छः-सात सदियों तक राज किया है। हमारे हाथ से ही सत्ता अंग्रेज़ों के पास गई। हमारा (मुस्लिम) राष्ट्र उनके खून का बना है जिन्होंने सऊदी अरब ही नहीं, एशिया और यूरोप को अपने पाँवों तले रौंदा है। हमारा राष्ट्र वह है जिसने तलवार से एकधर्मीय भारत को जीता है। मुसलमान अगर सरकार के खिलाफ आंदोलन करें तो वह हिंदुओं के आंदोलन की तरह नरम नहीं होगा। तब आंदोलन के खिलाफ सरकार को सेना बुलानी पड़ेगी, बंदूकें इस्तेमाल करनी पड़ेंगी।जेल भरने के लिए नए कानून बनाने होंगे।”
इस प्रकार अपने मुस्लिम पूर्वजों की वकालत करते हुए सर सैयद अहमद खान यही स्पष्ट कर रहे थे कि हमने छः सात सौ वर्ष हिंदुस्तान पर शासन किया है और अनेक संस्कृतियों को अपने पांव तले रौंदने का कीर्तिमान स्थापित किया है। जिस व्यक्ति को अपनी जाति की क्रूरता और बर्बरता पर भी प्रसन्नता की अनुभूति हो रही हो, उससे आप न्याय संगत व्यवहार करने की अपेक्षा नहीं कर सकते।
हमीद दलवई ने उनके बारे में कहा था- “1887 बद्रुदीन तैयबजी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। उनसे कुछ मुद्दों पर सर सैयद के मतभेद थे। तब तैयबजी को लिखे पत्र में सर सैयद ने कहा था- “असल में कांग्रेस नि:शस्त्र गृहयुद्ध खेल रही है। इस गृहयुद्ध का मकसद यह है कि देश का राज्य किसके (हिंदुओंं या मुसलमानों) हाथों में आएगा? हम भी गृहयुद्ध चाहते हैं, मगर वह नि:शस्त्र नहीं होगा। यदि अंग्रेज़ सरकार इस देश के आंतरिक शासन को इस देश के लोगों के हाथों में सौंपना चाहती है तो राज्य सौंपने से पहले एक स्पर्धा परीक्षा होनी चाहिए। जो इस स्पर्धा में विजयी होगा , उसी के हाथों में सत्ता सौंपी जानी चाहिए। लेकिन इस परीक्षा में हमें हमारे पूर्वजों की कलम इस्तेमाल करने देनी चाहिए। यह कलम सार्वभौमत्व की सनदें लिखने वाली असली कलम है (यानी तलवार)। इस परीक्षा में जो विजयी हो, उसे देश का राज दिया जाए।”

सावरकर जी का विरोध क्यों ?

सावरकर जैसे महान विचारक और इतिहास की गहरी समझ रखने वाले नेता ने सर सैयद अहमद खान की इस विचारधारा का पहले दिन से विरोध करना आरंभ किया । सावरकर जी के इस प्रकार के विरोध को ही गांधीवादी लेखकों ने भारत विभाजन के लिए उनकी एक प्रकार की कार्यशैली के रूप में इंगित किया।  जबकि कांग्रेस अपनी तुष्टिकरण की नीति के अंतर्गत सर सैयद अहमद खान को शिक्षा क्षेत्र के महारथी और एक उदारवादी महान नेता के रूप में स्थापित करती रही।

अलीगढ़ संस्थान के 1 अप्रैल 1890 के राज-पत्र में सर सैय्यद ने भविष्ययवाणी की थी- “यदि सरकार ने इस देश में जनतांत्रिक सरकार स्थापित की तो इस देश के विभिन्न धर्मों के अनुयायियों में गृहयुद्ध हुए बिना नहीं रहेगा।”
1893 में एक लेख में उन्होंने धमकी दी थी- “इस राष्ट्र में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं लेकिन इसके बावजूद परंपरा यह है कि जब बहुसंख्यक उन्हें दबाने की कोशिश करते हैं तो वे हाथों में तलवारे ले लेते हैं। यदि ऐसा हुआ तो 1857 से भी भयानक आपत्ति आए बिना नहीं रहेगी।”
कहने का अभिप्राय है कि सर सैयद अहमद खान जनतांत्रिक सरकार के स्थान पर इस्लाम की बादशाहत को स्थापित करने के पक्षधर थे। उन्हें हिंदुओं पर अत्याचार करने वाली सरकार की आवश्यकता थी और वह भी यदि मुगलिया अंदाज की सरकार हो तो इससे उत्तम कोई बात उनके लिए हो ही नहीं सकती थी।
उन्होंने खुली धमकी दी थी कि यदि इस्लामिक बादशाहत के स्थान पर जनतांत्रिक सरकार को स्थापित करने का प्रयास भारतवर्ष में किया गया तो 1857 की क्रांति से भी बुरी स्थिति देश में हो जाएगी अर्थात ऐसी स्थिति में देश में हिंदुओं को थोक के भाव काटा जाएगा।
सर सैयद अहमद खान की इसी अलगाववादी और द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत की जनक विचारधारा ने आगे चलकर जिन्नाह का निर्माण किया। जिसने धर्म के आधार पर इस देश का विभाजन करवाया और कांग्रेस ने उसे अपनी सहमति व स्वीकृति प्रदान कर देश के साथ अपघात किया।
सावरकर जी ने सर सैयद अहमद खान और इन जैसे अलगाववादी नेताओं की चालों को बहुत पहले समझ लिया था । वह नहीं चाहते थे कि देश का किसी भी आधार पर बंटवारा हो। इतने स्पष्ट प्रमाणों के होने के उपरांत भी य9 सावरकर जी को भारत विभाजन का दोषी माना जाता है तो मानना पड़ेगा कि इतिहास को पूर्ण सत्यता के साथ लिखने का समय आ गया है। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब चोर बादशाह बन जाएगा और बादशाह चोर बन जाएगा।
वैसे इतिहास के तथ्यों की बात करने वाले लोगों को यह तथ्य ध्यान रखना चाहिए कि भारत में द्विराष्ट्रवाद की बात करने वाले सर सैयद अहमद खान जब 1887 में अपने भड़काऊ भाषण दे रहे थे , उस समय सावरकर जी मात्र 4 वर्ष के थे।
हमारे गांधीवादी लेखकों को इन तथ्यों की समीक्षा अवश्य करनी चाहिए।

(25 मई 2023)

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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