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राजनीति में कूटनीति और कूटनीति में रणनीति का होना बहुत आवश्यक होता है। जिस राजनीति में कूटनीति और रणनीति ना हो वह राजनीति लूली लंगड़ी हो जाती है। प्रत्येक देश की विदेश नीति में इन तीनों चीजों का ही समन्वय होना बहुत ही आवश्यक होता है। जहां तक चीन के साथ भारत की विदेश नीति का संबंध है तो यदि नेहरू काल की विदेश नीति की समीक्षा करें तो पता चलता है कि हम खतरे को देखकर भी उसे खतरा घोषित नहीं कर रहे थे । यह हमारी राजनीतिक भूल होने के साथ-साथ कूटनीतिक पराजय और रणनीतिक असफलता को दर्शाने वाली स्थिति थी। यद्यपि नेहरू के साथी सरदार पटेल उन्हें चीन के प्रति खतरे से सावधान कर रहे थे। इसके साथ ही साथ। वीर सावरकर भी नेहरू को खतरे के प्रती बार-बार सचेत करते थे।
चीन भारत के प्रति भी कभी भी ‘उदार’ नहीं रहा है। उसकी विस्तारवादी नीतियों के चलते भारत पहले दिन से उसके निशाने पर रहा है। हम सभी जानते हैं कि तिब्बत कभी भारत का एक अंग हुआ करता था । जब वह एक ‘बफर स्टेट’ के रूप में अस्तित्व में आया तो चीन ने उसे अपना हिस्सा घोषित करना आरंभ किया । एक समय आया कि वह अपने विस्तारवादी चिंतन और नीतियों के चलते तिब्बत को हड़पने में सफल हो गया। चीन ने अपनी इसी विस्तारवादी नीति के चलते भारत के साथ लगी सीमा पर छेड़छाड़ करनी आरंभ की और जबरन काल्पनिक सीमा विवाद पैदा करने की चेष्टा करने लगा। अपनी इस प्रकार की नीतियों को सफल बनाने के लिए चीन ने पहले दिन से पाकिस्तान के प्रति अपना झुकाव प्रकट करना आरंभ किया। इसी के चलते उसने दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को बिगाड़ने के किसी भी अवसर को छोड़ा नहीं । उसने पाकिस्तान को थपकी मारकर उसे भारत के विरुद्ध उकसाने का हर संभव प्रयास किया। भारत को चारों ओर से घेरने की अपनी नीति पर चलते हुए चीन ने पाकिस्तान के अतिरिक्त भारत के अन्य पड़ोसी देशों यथा नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और बंगलादेश को भी अपनी भारत विरोधी नीतियों का समर्थक बनाया।
नेहरू के समय में हम अपनी ढुलमुल विदेश नीति के चलते चीन के हाथों 1962 में पराजित हुए। उसके पश्चात हमारी आंखें खुली, पर तब तक बहुत अधिक देर हो चुकी थी। अरुणाचल प्रदेश की ओर का लगभग सवा लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल चीन हमसे छीन कर ले गया । इसके अतिरिक्त कश्मीर में भी उसने भारत के भूभाग को पाकिस्तान से लेकर या अपना अवैध अतिक्रमण कर भारत को अपमानित और खंडित करने का प्रयास किया। तब भारत ने चीन के साथ कठोरता का प्रदर्शन करते हुए अपने सभी संबंध तोड़ने का निर्णय लिया। फलस्वरूप इंदिरा गांधी के शासनकाल में चीन के प्रति हम पूर्णतया दूरी बना कर रहे।
यह प्रसन्नता का विषय है कि आज हमारे देश की सेना और सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल के सैनिकों का मनोबल बढ़ा हुआ है और वे चीन की आंखों में आंख डालकर बात करने की स्थिति में खड़े हुए दिखाई देते हैं। पूरे देश का राजनीतिक और नैतिक समर्थन अपनी सेना और सैनिकों के साथ है । इससे परिस्थितियां बहुत अधिक अनुकूल बनी हैं। आज का चीन भली प्रकार यह जानता है कि भारत अब 1962 का भारत नहीं है। यह सच है कि वर्तमान मोदी सरकार ने चीन को उसकी औकात बताने में सफलता प्राप्त की है। इसके उपरांत भी हमें समझना चाहिए कि केंद्र की मोदी सरकार इस समय अपने परीक्षा कक्ष में है। किसी भी सरकार या किसी भी शासक को सफल या असफल होने का प्रमाण पत्र तभी दिया जाता है जब उसका कार्यकाल पूर्ण हो चुका होता है या वह सत्ता से बाहर हो चुका होता है ।
इसके उपरान्त भी हमारी वर्तमान विदेश नीति के संकेत बड़े साफ हैं और उन्हें देखकर कहा जा सकता है कि हम एक मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित हो रहे हैं। अभी हाल ही में संपन्न हुई शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से अलग केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीन के रक्षा मंत्री जनरल ली शांग फू की भेंट हुई। हमारे देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत की ओर से चीन को कड़ा संदेश देने में सफलता प्राप्त की है। रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि चीन ने मौजूदा समझौतों का उल्लंघन कर द्विपक्षीय संबंधों के पूरे आधार को समाप्त कर दिया है। जिसे बड़ी सूक्ष्मता से परख व समझकर हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीन को बता दिया कि आज का भारत जागा हुआ है। चीन को अपना छद्म वेश उतारना होगा और उसे सही पोशाक पहनकर भारत के सामने आना होगा। भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि गलवान और पैगौंग झील के समय भारत और चीन के सैन्य कमांडरों के बीच चली 18 दौर की वार्ता का जो हश्र हुआ था उसमें चीन की छद्मवादी सोच ही काम कर रही थी। हम सभी यह भली प्रकार जानते हैं कि चीन जहां एक ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाता है वहीं हमारे सैनिकों के साथ वह सीमा पर छेड़खानी करता रहता है।
हमारे विदेश मंत्री एस0 जयशंकर जिस सावधानी और समझदारी के साथ देश का पक्ष अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रख रहे हैं उसकी जितनी सराहना की जाए उतनी कम है। उनके शब्दों में संतुलन के साथ-साथ दृढ़ता और सरलता का बड़ा ही आश्चर्यजनक समन्वय होता है। यदि चीन हमारी सीमाओं से लगते हुए अपने क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियों को बढ़ा रहा है या विकास कार्यों के नाम पर ऐसी स्थिति बना रहा है जो उसके लिए युद्ध के समय अनुकूल हो तो भारत भी इस समय अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में इसी प्रकार की गतिविधियों में लगा हुआ है।
हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीन के साथ हाथ न मिलाकर उसे स्पष्ट और कड़ा संदेश दे दिया है कि जब तक सीमाओं पर शांति नहीं तब तक उसके साथ हाथ मिलाने का कोई लाभ नहीं।
यह इस बात का भी संकेत है कि भारत अपनी रक्षा तैयारियों को करता रहेगा और प्रत्येक प्रकार की आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए किसी भी प्रकार की असावधानी नहीं बरतेगा।
यह पहली बार है कि टकराव के मूड में दीखता हुआ चीन भारत से सीधे टकराव से बचता हुआ भी दिखाई दे रहा है। वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर या भारत के लिए अन्य दूसरे क्षेत्रों में तनाव पैदा करने की नीति पर तो काम कर रहा है पर अपने आप सीधा भिड़ना नहीं चाहता। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और शुभ संकेत है कि अमेरिका ने भी इस समय यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग मानता है। इसका सीधा संकेत है कि अमेरिका इस समय भारत के समर्थन में है और वह चीन की किसी भी प्रकार की विस्तार वादी नीति का समर्थन नहीं करता है। चीन इस समय भारत से युद्ध करने से पहले एक बार नहीं सौ बार सोचेगा। उसे जिस प्रकार विदेशी शक्तियां घेरने और चुनौती देने का काम कर रही हैं उसके दृष्टिगत वह जानता है कि यदि भारत से युद्ध आरंभ हो गया तो उसे चौतरफा हमले झेलने पड़ेंगे। तब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सत्ता भी जा सकती है और चीन का बिखराब भी हो सकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं भारत को समझो अभियान के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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