यूरोप में मानवाधिकारों की संकल्पना भारत से गयी है। जबकि तथाकथित प्रगतिशील लेखकों और इतिहासकारों ने हमें कुछ इस प्रकार समझाने का प्रयास किया है कि यूरोप से चलकर मानवाधिकार की संकल्पना भारत पहुंची है। यूरोप ने 15 जून 1215 को अपने ज्ञात इतिहास की ऐसी पहली तिथि स्वीकार किया है जब मानवाधिकारों की ओर बढऩे के लिए आज के ब्रिटेन ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की थी। इस दिन वहां के सम्राट जॉन से उसके सामंतों ने अपने लिए कुछ अधिकार प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी। ब्रिटेन के इतिहास में इस  घटना को ‘मेग्नाकार्टा’ के नाम से जाना जाता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि इससे पूर्व ब्रिटेन के राजा के सामंतों को भी कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे। जबकि भारत में जब से राज्य और राजा की उत्पत्ति हुई तभी से राजा के स्वेच्छाचारी न होने, राजा के विद्वान होने, अपने सामंतों, अधिकारियों, भृत्यों और प्रजाजनों के प्रति पिता जैसा हृदय रखने और पितृवत व्यवहार करने की अनिवार्यता स्थापित की गयी थी। इसका अभिप्राय है कि भारत में मानवाधिकारों की संकल्पना सृष्टि प्रारंभ से ही रही है और राज्य और राजा के रहते हुए भी मानव के अधिकारों और विशेष बल दिया गया। वैसे जब राज्य और राजा के बनाने की बात आयी थी तो उसके लिए भी ऐसे स्पष्ट प्रमाण हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने दुष्टजनों के प्रकोप से सज्जनों को बचाने के लिए ही राज्य और राजा की उत्पत्ति की।
इसके विपरीत ब्रिटेन में प्रजाजनों को अपने लिए अधिकार लेने में बहुत लंबा संघर्ष करना पड़ा। 15 जून 1215 की उपरोक्त घटना के पश्चात भी सदियों तक प्रजाजनों को वह अधिकार नहीं दिये जो वहां के सामंतों को मिल गये थे। सन 1689 में जाकर प्रजाजनों को राजा की ओर से कुछ अधिकार प्रदान किये गये। इससे पूर्व सन 1600 में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी भारत में आ चुकी थी। वह कंपनी ब्रिटिश राजा की एक संपत्ति थी, उसे अपने लिए कुछ करने के सीमित अधिकार थे। परंतु इस कंपनी के संचालक भारत में एक कुसंस्कार लेकर प्रविष्ट हुए थे कि अपने शासन में प्रजा को कोई अधिकार नहीं देने, और उन्होंने भारत मां का जब यहां की राजनीति की दुर्बलताओं का लाभ उठाकर अपना राज्य स्थापित करने की दिशा में पहल की तो उन्होंने अपने प्रजा के अर्थात भारतवासियों के प्रति ऐसा ही व्यवहार करना आरंभ किया-जैसे कि उनके कोई अधिकार न हों। 
फ्रांस की राज्यक्रांति सन 1789 में हुई। इससे पूर्व 4 जुलाई 1776 को अमेरिका ने ब्रिटेन से आजादी प्राप्त की। तब अमेरिका ने भी प्रत्येक व्यक्ति की जन्मना स्वतंत्रता की बात को स्वीकार किया। अमेरिका ने 1791 में बनाये गये अपने संविधान में अपने व्यक्ति के कुछ मौलिक अधिकारों की घोषणा की। उधर फ्रांस में 1789 में हुई राज्यक्रांति नेपोलियन बोनापार्ट के स्वेच्छाचारी और निरंकुश शासन में जाकर फंस गयी। जिससे उस समय के यूरोप में लाखों लोगों को असामयिक मृत्यु का दंश झेलना पड़ा और मानवाधिकारों के नाम पर ही हुई राज्यक्रांति ने भी लाखों लोगों की प्राणाहुति ले ली। इतना ही नहीं नेपोलियन बोनापार्ट के समय यूरोप में जिस राजनीतिक विद्वेष भावना का विकास हुआ वह अंत में एक शताब्दी बाद प्रथम विश्वयुद्घ के एक भारी विस्फोट के रूप में प्रकट हुई। जिसने फिर लाखों लोगों की मौत का सौदा कर लिया। इसी प्रथम विश्वयुद्घ में विजेता राष्ट्रों ने 1919-20 में वार्साय की संधि जर्मनी के साथ की, जिसमें उस स्वाभिमानी देश पर बहुत सी अपमानजनक शर्तें लाद दी गयीं। इन शर्तों को जर्मनी के हिटलर ने स्वीकार करने से इंकार कर दिया और अपने देश का शासक बन बैठा। यदि जर्मनी पर विजेता  राष्ट्र अपमानजनक शर्तें न लादकर उसके साथ बराबरी का व्यवहार करते तो बहुत संभव था कि हिटलर का निर्माण न होता और फिर उसके द्वारा किये गये लाखों करोड़ों लोगों के नरसंहार को भी देखने के लिए यह विश्व अभिशप्त न होता। इसके विपरीत भारत ने कभी भी दूसरे राज्य के राजा को पराजय के क्षणों में अपमानित किया। इसका कारण यही था कि यहां का राजनीतिक चिंतन पूर्णत: लोकतांत्रिक था। हमारे राजनैतिक मनीषी इस बात को जानते थे कि दूसरे राजा को अपमानित करने का अभिप्राय वहां की जनता से शत्रुता मोल लेना होता है। यही कारण था कि रामचंद्रजी ने लंका विजय के पश्चात रावण से राजनीति का पाठ सीखा और उसका राज्य उसी के भाई विभीषण को लौटा दिया। इसी प्रकार कृष्णजी ने कंस का वध किया परंतु कंस का राज्य उसके पिता और अपने नाना उग्रसेन को दे दिया। यदि राज्यहंता बनना भारत की राजनीति का एक अंग होता तो भारत कब का मिट गया होता। ये सारी बातें स्पष्ट करती हैं कि भारत मानवाधिकारों के प्रति प्रारंभ से ही संवेदनशील रहा। 
भारत के वेदों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात कही है। इसका अभिप्राय है कि सारी वसुधा के प्राकृतिक संसाधनों पर मानव का स्वाभाविक और जन्मना समान अधिकार है। इस अधिकार को कोई छीन नहीं सकता। परंतु आज विश्व में जितने भी राष्ट्र अथवा देश हैं उन सबने व्यक्ति के एक मौलिक अधिकार का हनन किया है और उसे संपूर्ण वसुधा पर स्वतंत्र विचरण करने से रोक दिया है। इसी प्रकार जल को व्यक्ति ने ही व्यक्ति के लिए प्रदूषित कर दिया है। आज के परिवेश में जल और वायु का बढ़ता प्रदूषण मानवाधिकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हमारा मानना है कि जल और वायु का बढ़ता यह प्रदूषण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, अपितु इसे मानव ने अपने विनाश के लिए स्वयं ही उत्पन्न किया है। अच्छा हो कि जल और वायु के बढ़ते प्रदूषण के प्रति भारतीय दृष्टिकोण से निपटने की तैयारी की जाए, जिसके लिए अच्छा होगा कि जल की पवित्रता को बनाये रखने के लिए उसे एक देवता मानकर कतई भी गंदा या प्रदूषित न करने का संकल्प हर व्यक्ति ले। इसी प्रकार वायु प्रदूषण से विश्व को बचाने के लिए यज्ञादि की वैज्ञानिक परम्परा को पुन: लागू किया जाए। हमारे चिंतन में मानवाधिकारों को लेकर जितनी सात्विकता होगी हम उतने ही अधिक मानवाधिकारों के लिए बनी चुनौतियों का समाधान खोजने में सफल होंगे।

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