जाति नहीं गुणवान का सर्वदा हो सम्मान

बिखरे मोती-भाग 176

गतांक से आगे….

अहंता भगवान में लग जाने पर चित्त स्वत: स्वाभाविक भगवान में लग जाता है-जैसे शिष्य बन जाने पर ‘मैं गुरू का हूं।’ इस प्रकार अहंता गुरू में लग जाने पर गुरू की यादें सर्वदा चित्त में बनी रहती हैं। वैसे देखा जाए तो गुरू के साथ शिष्य स्वयं संबंध जोड़ता है, जबकि परमात्मा के साथ इस आत्मा का संबंध स्वत: सिद्घ और नित्य है। जीव द्वारा केवल संसार के साथ संबंध जोडऩे से ही परमात्मा के साथ जीव के नित्य संबंध की विस्मृति हुई है। अत: उस विस्मृति को मिटाने के लिए भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं : ‘हे पार्थ! निरंतर मेरे में चित्तवाला हो जा, तभी तुझे मेरा सामीप्य मिल सकेगा, अर्थात शरणागति मिल सकेगी।’ शरणागति के संदर्भ में भगवान कृष्ण गीता के अठारहवें अध्याय के 66वें श्लोक में अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं-‘सर्वधर्मान्परित्यज मामेकं शरणं ब्रज’ अर्थात हे कुंतीनंदन! संपूर्ण धर्मों का आश्रय धर्म के निर्णय का विचार छोडक़र अर्थात क्या करना है और क्या नही करना है-इसको छोडक़र केवल एक मेरी शरण में आ जा, इसी में तेरा कल्याण है। इस उच्चतम और उत्कृष्टतम स्थिति में जब साधक पहुंचता है तो मनोविकार पीछे छूट जाते हैं, आत्मानिर्विकार हो जाती है, मन और माया से संबंध टूट जाता है। ज्योति परमज्योति में विलीन हो जाती है और परमात्मा ही आत्मा की प्रेरक शक्ति बन जाती है। अत: साध्य मिलने पर साधन की आवश्यकता स्वत: ही समाप्त हो जाती है।

जातिवाद के जहर पर करारी चोट :-

जाति नहीं गुणवान का

सर्वदा हो सम्मान।

श्रेष्ठता को नेतृत्व मिलै,

विकास का होय विहान ।। 1103 ।।

व्याख्या :-

भारत के संविधान निर्माताओं ने राष्ट्र के समन्वित और बहुमुखी विकास को दृष्टिगत रखते हुए कतिपय जातियों को सूचीबद्घ किया था, उनका कोटा निर्धारित किया गया था, जो जातियां सदियों से दबी कुचली और उपेक्षित रहीं अन्याय और शोषण का शिकार रहीं, अशिक्षा अन्याय अभाव, दरिद्रता, बेरोजगारी, बेगारी, छुआछूत इत्यादि विषमताओं के कारण वास्तव में इनकी दशा राष्ट्र और समाज में शोचनीय थी। जो कि स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र के चेहरे पर एक बदनुमा दाग था। इस दाग का निराकरण करने के लिए और इन जातियों को राष्ट्र के विकास में सहभागी बनाने के लिए संविधान में इनका कोटा निर्धारित किया गया ताकि विकास की किरण इनके आंगन तक भी पहुंचे। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारा समाज सवर्ण जाति और पिछड़ी जातियों के खेमे में बंट गया। राजनेताओं ने ‘वोटबैंक’ बनाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिये। नेता जाति के आधार पर चुने जाने लगे। नेताओं ने कर्मचारियों और अधिकारियों का चयन जाति के आधार पर करना शुरू कर दिया। योग्यता और गुण की उपेक्षा होने लगी। फलस्वरूप आज समाज में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के अजगर ने भारतीय लोकतंत्र को निगलना शुरू कर दिया, सामाजिक समरसता का हृास हो रहा है, जिससे प्रत्येक नागरिक त्रस्त है। काश ! ऐसा हो कि गुणवान व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म, संप्रदाय अथवा जाति का हो उसे सम्मान और यथेष्ठ स्थान मिलना चाहिए। ध्यान रहे, लक्ष्मी (समृद्घि) का निवास ज्ञान और मर्यादा (अनुशासन) के मध्य होता है। अर्थात गुणवान व्यक्तियों का ही नेतृत्व होना चाहिए तथा अपनी-अपनी मर्यादा का पालन होना चाहिए। यह सूत्र हमारे ऋषियों ने दिया था, यदि इसका अनुकरण राष्ट्रीय जीवन में किया जाए तो निश्चित ही नूतन विकास की एक बयार आएगी जो स्वर्णिम प्रभात को अपने साथ लाएगी।

क्रमश:

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