पिछले लगभग एक माह से भारत और चीन की फौजें आमने-सामने हैं। उन्होंने एक-दूसरे की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया है बल्कि भूटान के दोकलाम नामक एक पठार को लेकर दोनों देशों के फौजियों के बीच धक्का-मुक्की और कहा-सुनी हुई है। गनीमत है कि तोपें और बंदूकें नहीं चली हैं। भारत और चीन की सीमाएं हजारों किलोमीटर में फैली हुई हैं और सैकड़ों बार दोनों देशों की फौजें जाने-अनजाने उनका उल्लंघन करती रहती हैं लेकिन उनमें मुठभेड़ की नौबत प्राय: नहीं आती। 1987 में अरुणाचल के सोमदोरोंग चू इलाके में मुठभेड़ की स्थिति बन गई थी लेकिन दोनों देशों की सरकारों ने उसे बातचीत के जरिए हल कर लिया था। भारत-चीन सीमा-विवाद पर शांतिपूर्ण मर्यादित व्यवहार कैसे किया जाता है, यह उदाहरण मैं पाकिस्तानी नेताओं, फौजियों और कूटनीतिज्ञों को अक्सर देता हूं लेकिन इस बार दोकलाम-विवाद ने दूसरा ही चित्र उपस्थित कर दिया है। 
यह दोकलाम-विवाद है, क्या? दोकलाम लगभग 250 कि.मी. का वह पठारी इलाका है, जो भूटान की सीमा में है। यह तिब्बत, भूटान और सिक्किम के त्रिभुज के कंधे पर स्थित है। यह अत्यंत सामरिक महत्व का स्थान है। इस पर चीन अपना अधिकार जता रहा है। वह वहां ऐसी सडक़ें बना रहा है, जिस पर 40-40 टन के टैंक भी चल सकें। यदि इस पठार पर चीन का कब्जा हो गया तो भारतीय सीमाओं में घुस जाना उसके लिए बाएं हाथ का खेल होगा। वह चुम्बी घाटी पार करके मिनिटों में सारे उत्तर-पूर्व के प्रांतों को भारत से काट सकता है। भूटान का कहना है कि दोकलाम में सडक़ बनाकर चीन 1988 और 1998 में हुए समझौतों का उल्लंघन कर रहा है। उन समझौतों में यह तय हुआ था कि जब तक यह सीमा-विवाद हल नहीं हो जाता, चीन यथास्थिति बनाए रखेगा। इस क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा लेकिन चीन कहता है कि 1890 में जो ब्रिटिश-चीन समझौता हुआ था, उसमें यह क्षेत्र चीन का है, ऐसा ब्रिटेन ने स्वीकार किया था। इसीलिए चीन अब इस भारतीय हस्तक्षेप को चीन की संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। यह भी कहा जाता है कि दोकलाम का पठार चीन के लिए इतने अधिक सामरिक महत्व का बन गया है कि इसके बदले वह उत्तरी भूटान के पास इससे दुगुनी जमीन पर अपना दावा छोडऩे को तैयार है।
दोकलाम पठार पर अपने कब्जे को चीन ने अपनी इज्जत का सवाल बना लिया है। वह भारत से कोई भी बात करने के लिए तब तक तैयार नहीं है, जब तक कि भारत वहां से अपनी फौजें न हटा ले। वह खुद जमा रहे और भारत हट जाए। इतना ही नहीं, उसने कैलाश-मानसरोवर की तीर्थ-यात्रा स्थगित कर दी। वर्षों से तीर्थ-यात्रा की तैयारी कर रहे भारतीयों ने यह अजीब-सा धक्का महसूस किया। चीनी सरकार के प्रवक्ताओं ने ऐसे तेजाबी बयान जारी किए हैं कि मानो दोकलाम को लेकर चीन युद्ध के लिए तैयार है। रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने सिर्फ इतना कहा था कि यह 1962 नहीं, 2017 है। इस पर चीनी प्रवक्ता ने 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध का हवाला देते हुए अत्यंत उत्तेजक और आपत्तिजनक बयान दे डाले। बयान तो भारत की तरफ से भी जारी हो रहे हैं लेकिन उनमें पूरा संयम बरता जा रहा है।
आश्चर्य है कि अभी तक दोनों देशों के बीच कोई कूटनीतिक वार्ता तक नहीं चली है। दिल्ली और पेइचिंग, दोनों जगह दूतावास हैं और उनका उन देशों की सरकारों से इस मुद्दे पर कोई संवाद नहीं है। हमारी राष्ट्रवादी सरकार के पास ऐसे स्वतंत्र विशेषज्ञों का भी टोटा है, जो चीनी नीति—निर्माताओं से सीधे संपर्क कर सकें। पिछले सप्ताह जर्मनी के हेम्बर्ग में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग की मुलाकात भी काफी चर्चा का विषय बनी। ये दोनों नेता मिले और इस मिलन को हमारे विदेश मंत्रालय ने जबर्दस्त तूल दे दिया जबकि चीनी प्रवक्ता ने सारे प्रचार पर पोंछा लगाते हुए कह दिया कि दोनों नेताओं के बीच कोई बैठक नहीं हुई। याने औपचारिक सलाम-दुआ को ही हम ‘कई मुद्दों पर बात’ कहकर प्रचारित करते रहे। उधर पेइचिंग से गोलाबारी जमकर जारी है। चीनी अखबार और प्रवक्ता भारत पर आरोप लगा रहे हैं कि वह चीन को बदनाम करके उसकी ‘वन बेल्ट, वन रोड’ योजना को विफल करना चाहता है। मोदी और ट्रंप की मिलीभगत है कि चीन को नीचा दिखाया जाए। चीन ने मलाबार में चल रहे भारत, अमेरिका और जापान के सामूहिक सैन्य-अभ्यास पर भी छींटाकशी की है। उसके एक अखबार ने यह भी कहा है कि जैसे भूटान का बहाना बनाकर दोकलाम में भारत ने अपनी फौज अड़ा दी है, वैसे ही पाकिस्तान के निमंत्रण पर चीन भी अपनी फौज ‘आजाद कश्मीर’ में अड़ा सकता है। चीन के सरकारी अखबार 1962 के युद्ध के कई चित्र और लेख दुबारा छाप रहे हैं। चीनी विश्वविद्यालयों के कई समझदार और संतुलित विशेषज्ञ, जिन्हें मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं, वे भी भडक़ाऊ लेख लिख मार रहे हैं। समझ में नहीं आता कि दोकलाम को लेकर चीन में इतना उबाल क्यों आया हुआ है ?
जहां तक भारत का सवाल है, हमारे प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और विदेश मंत्रालय ने काफी संयम बरता है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि दोकलाम पर चीन के साथ भूटान को ही निपटने दिया जाए (हम क्यों अपनी टांग फंसाएं ?) न वह हमारा क्षेत्र है, न हमारी सीमा ! माक्र्सवादियों का यह तर्क ऊपरी तौर पर ठीक लगता है लेकिन भूटान और भारत में क्या फर्क है ? यह ठीक है कि भूटान एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है लेकिन भूटान की सुरक्षा भारत की सुरक्षा है। चीन के साथ तो भूटान के कूटनीतिक संबंध भी नहीं हैं। दोकलाम के पठार पर जो चीनी सडक़ बन रही है, वह व्यापार और परिवहन के काम आ सकती है लेकिन उसका असली उपयोग तो सामरिक है। यदि भारत को उसकी चिंता नहीं होगी तो किसको होगी ? इस समय चीन भूटान में ही नहीं, नेपाल, बांग्लादेश, बर्मा और श्रीलंका में भी सडक़ों और बंदरगाहों का जाल बिछा रहा है। जिबूती में वह सामुद्रिक अड्डा बना रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर में पहले से ही काम चल रहा है। ये वे सब क्षेत्र हैं, जिनके बारे में भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन ने 1902 के अपने एक प्रसिद्ध भाषण में कहा था कि ये सब भारत के आज्ञा-क्षेत्र में हैं। भारत की अनुमति के बिना इस क्षेत्र में किसी पंछी को पर मारने की भी इजाजत नहीं होना चाहिए। यदि भारत कह रहा है कि आप यथास्थिति बनाए रखिए तो ऐसा कहकर वह कौनसे युद्ध के ढोल बजा रहा है ? जाहिर है कि चीन की सैन्य-क्षमता भारत से ज्यादा है लेकिन भारत भी परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्र है। इसके अलावा चीन अब माओ का झगड़ालू चीन नहीं रह गया है, जो कोरिया, वियतनाम, जापान, कंपूचिया, रुस और भारत जैसे पड़ोसियों से उलझता रहे। यह तंग श्याओ पिंग और शी जिनपिंग का चीन है, महाजन देश है, व्यापारिक राष्ट्र है। वह दोकलाम को लेकर युद्ध के नगाड़े क्यों बजा रहा है ? शी को चाहिए कि मोदी के साथ वे फिर बात करें और दोकलाम का हल निकालें।

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