वैदिक सम्पत्ति : इतिहास, पशुहिंसा और अश्लीलता

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गतांक से आगे……

हमारी यह बात नीचे लिखे कतिपय वाक्यों से स्पष्ट होती है। मीमांसा में लिखा है कि-
मांसपाकप्रतिषेधश्च तद्वत्। ( मीमांसा 12/12)

अर्थात् जैसे यज्ञ में पशुहिंसा मना है, वैसे मांसपाक भी मना है । उसकी दूसरी जगह 10/3/65 और 10/7/15 में लिखा है कि ‘धेनुवच्च अश्वदक्षिणा’ और ‘अपि वा दानमात्रं स्वात् भक्षशवदानभिसम्बन्धनात्’ अर्थात् गौ की तरह धोड़ा भी यज्ञ में दक्षिणा के ही लिए है अथवा केवल दान के ही लिए है। क्योंकि घोड़े के लिए कहीं भक्ष शब्द नहीं पाया। आश्वलायन कहता है कि ‘होमियं च मांसवर्जन’ प्रर्थान् हवनसामग्री में मांस वर्जित है । कात्यायन भी कहता है कि ‘आहवनीये मांसप्रतिषेधः’ अर्थात् हवनयोग्य सामग्री में मांस नहीं है। इन प्रमाणों से ज्ञात होता है कि मांस प्रचलित होनेपर भी वह सर्वस्वीकृत नहीं था ।

कुछ लोग बलि, आलम्भ, मधुपर्क और गोधनों शब्दों से भी पशुहिंसा निकालते हैं, परन्तु हम देखते हैं कि मध्यमकालीन साहित्य भी इन शब्दों का अर्थ हिसापरक नहीं करता । बलि शब्द का अर्थ मारना नहीं होता । बलिवैश्वदेव में काकबलि, श्वावलि होती है, पर कौवे और कुत्ते मारे नहीं जाते, प्रत्युत उनको उनका बलि—भाग दिया जाता है, जिससे बलि का अर्थ मारना नहीं, किन्तु भाग सिद्ध होता है। इसी तरह आलम्भ शब्द से भी हिंसा अर्थ नहीं निकलता । निघण्टु में हिसार्थक जितने शब्द हैं उनमें आलम्भ शब्द नहीं है। मीमांसा 2/3/17 की सुबोघिनी टीका में स्पष्ट लिखा हुआ है कि ‘आलम्भ: स्पर्शो भवति’ अर्थात् स्पर्श का नाम आलम्भ है । यही बात सत्य भी प्रतीत होती है। क्योंकि हम देखते हैं कि यज्ञोपवीत संस्कार के समय ‘अवास्य दक्षिण सनधि हृदयमालभते’ और विवाह-संस्कार के समय ‘दक्षिणां समधि हृदयनालभते’ आदि पारस्कर सूत्रों के अनुसार ब्रह्मचारी और कन्या के हृदय का स्पर्श होता है । इस दोनों संस्कारों में आलम्भ शब्द से स्पर्श ही किया जाता है, कोई बध नहीं किया जाता । इसी तरह पुराकाल में पशु आलम्भ अर्थात् पशुस्पर्श भी होता था। यह एक विशेष यज्ञ था। कई वर्ष तक पानी न बरसने से जब पशु भूखों मरने लगते थे, तब किसान लोग स्पर्शयज्ञ करते थे । महाभारत अनुशासनपर्व में लिखा है कि

यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षति वासवः । स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः ।।
अर्थात् यदि बारह वर्ष तक पानी न बरसेगा तो मैं स्पर्शयज्ञ करूंगा। इस स्पयज्ञ का मतलब यहीं था कि लोग अपने पशुओं को छू छूकर छोड़ देते थे और कह देते थे कि जावो जहाँ चरनेको मिले चरो। इस विवरण से हो जाता है कि आलम्भ का अर्थ मारना नहीं प्रत्युत स्पर्श है । जिस प्रकार आलम्भ से पशुहिंसा सूचित नहीं होती, उसी तरह मधुपर्क से भी हिंसा सिद्ध नहीं होती। क्योंकि लिखा है कि मधुपर्क दधिघृतमपि हितं कांस्ये कोत्येन’ अर्थात् तीन भाग दधि, एक भाग शहद और एक भाग घृत कांसे के पात्र में रखने से मधुपर्क बनता है । इसमें भी कोई हिंसा की बात सूचित नहीं होती। अव रही ‘गोनोऽतिथिः’ की बात । लोग कहते हैं कि अतिथि के लिए गौ मारी जाती थी । किन्तु मध्यमकालीन पण्डितों ने इसका भी समाधान कर रक्खा है । पाणिनि मुनि ने इसके लिए एक सूत्र ही बना दिया है। वे कहते हैं कि ‘दाशगोधनी सम्प्रदाने’ अर्थात् हुन् धातु के तीन अर्थ होते हैं-ज्ञान, गमन ओर प्राप्ति । इसलिए न पद प्राप्ति अर्थ में-दान अर्थ में ही है । अतः जिस अतिथि को गौ दी गयी हो वही गोधन है। तात्पर्य य कि पशुहिंसा से सम्बन्ध रखनेवाले प्राचीन साहित्य में जितने शब्द – जितने प्रयोग मिलते है, मध्यमकालीन वैदिक पण्डितों ने सबका तात्पर्य हिंसारहित ही निकाला है। इससे ज्ञात होता है कि पशुयज्ञ कभी भी सर्वसम्मति से स्वीकृत नहीं हुआ । यहाँ तक कि आयुर्वेद में भी आर्यों ने मांस औषधियों को अपने लिए नहीं कहा। धरक में स्पष्ट लिखा है कि-

द्विजानामोषधी सिद्ध घृतं मांसविवृद्धये । सितायुक्त प्रदातव्यं गव्येन पयसा भृशम् ।। (चरक चि०8/149)

अर्थात् पुष्टि के लिए आर्यों की औषधियां मिश्री से युक्त घी और दूध ही हैं। मांस तो ‘यक्षरक्ष पिशाचान्नम्’ अर्थात् पिशाचों का अन्न है । हमारे यहां तक के विवेचन का सार इतना ही है कि असुर राक्षस मांसाहारी थे ही। जब उन्होंने आर्यों में प्रवेश किया तब वेदों के द्वघर्थक शब्दों से मांस हवन का विधान बनाकर पशुमांस से यज्ञों को करने लगे और मांस खाने लगे । यद्यपि वेदों में इसका स्पष्टीकरण मौजूद है और उस स्पष्टीकरण को लेकर वैदिक विद्वान् आदि से लेकर अबतक कहते चले आ रहे कि

श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणां व्रीहिमयो पशुः । ( महा० अनु० )
धूर्तः प्रवर्तितं यज्ञ नैतद्वदेषु कल्प्यते । ( महा० शान्ति० )

अर्थात् हम प्राचीन काल से सुनते आ रहे हैं कि यज्ञविधान में पशुहिंसा अन्न की ही है और मांसयज्ञ का प्रचार धूर्तों ने किया है, उसका विधान वेदों में नहीं है, तथापि पाप की ओर मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इसलिए मांसयज्ञ का प्रचार आर्यों में भी हो गया। प्रचार हो गया, इसमें सन्देह नहीं, पर वह प्रचार सर्वसम्मति से स्वीकृत नहीं हुआ । सभी विद्वान कहते आ रहे हैं कि वेदों में पशुयज्ञ का विधान नहीं है । विष्णुशर्मा ने पंचतन्त्र में ठीक ही कहा है कि-

वृक्षांछित्वा पशून् हत्वा कृत्वा रुबिरकर्दमम् । यद्यं वं गम्यते स्वर्गे नरके केन गम्यते ।।
अर्थात् जंगलों के काटनेवाले, पशुओं को मारनेवाले और मनुष्यों की बलि देनेवाले यदि स्वर्ग को जाएँगे, तो भला नरक को कौन जायगा ? इसलिए सर्वतन्त्र सिद्धान्त यही है कि वेदों में पशुयज्ञ नहीं है ।
क्रमशः

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