ईश्वर के विषय में यह माना जाता है कि वह सृष्टि के अणु-अणु में विद्यमान है और घट-घट वासी है। उसकी दृष्टि से कोई बच नहीं सकता। अत: वह मनुष्य के प्रत्येक विचार का और प्रत्येक कार्य का स्वयं साक्षी है। जिससे उसकी न्यायव्यवस्था से कोई बच नहीं पाएगा। घट-घट वासी होने से ईश्वर हमारे हृदय के भावों तक को जानता है, और बड़ी सावधानी से हमारे भीतर के विचारों को सुनता रहता है। इसी प्रकार देश के राजा को भी चाहिए कि वह भी अपनी प्रजा का घट-घट वासी (अपने गुप्तचरों के माध्यम से सत्य असत्य का पता लगाने वाला) बन जाए तभी उसकी राज्यव्यवस्था सुचारू रूप से चल सकती है।

महर्षि दयानंद कहते हैं-”यह भी जानना कि किसी का किया हुआ पाप भोग के बिना निवृत्त नहीं होता और इनके निवारण के लिए कुछ परमेश्वर की प्रार्थना व अपना पुरूषार्थ करना भी योग्य नहीं है, किंतु यह तो है कि जो कर्मजीव वर्तमान में करता है व करेगा उसकी निवृत्ति के लिए तो परमेश्वर की प्रार्थना व उपदेश भी होता है।” (ऋ. 1-24-9 का वेदभाष्य)
संसार में दोजख या जन्नत, स्वर्ग या नरक की अपनी-अपनी परम्पराएं हर संप्रदाय या मजहब ने मानी हैं। यदि सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि उन सबका मूल भारत की कर्मफल-व्यवस्था का सिद्घांत ही है। अंतर केवल इतना है कि ‘विश्वगुरू’ भारत के पास एक हीरा (कर्मफल-व्यवस्था के रूप में प्रचलित हमारा एक सांस्कृतिक मूल्य) आज भी हीरा के रूप में सुरक्षित है और उनके पास वह कबाड़ खाने का लोहा बन गया है। आवश्यकता अपने हीरे का मूल्य पहचानने की है।
सबसे प्राचीन है-भारत का इतिहास
संसार का सबसे प्राचीन देश भारत है। हमारे यहां ब्रह्मा की आयु 100 ब्रह्म वर्ष मानी गयी है। एक ब्राह्म वर्ष 100 ब्रह्मदिन या एक कल्प के बराबर होती है। एक कल्प में 1000 चतुर्युगी होती हैं। एक चतुर्युगी 12000 देव वर्ष के बराबर की होती है। एक देववर्ष में 43,20,000 सौर वर्ष होते हैं। एक सौरवर्ष 360 दिन-रात का होता है। एक दिन-रात में 30 मुहूत्र्त होते हैं। एक मुहूत्र्त में 30 कला और 1 कला में 30 काष्ठा, एक काष्ठा में 18 निमेष और एक निमेष में 8/45 सैकंड होते हैं। ‘सूर्य सिद्घांत’ के रचयिता भास्कर मिश्र की गणना के अनुसार ब्रह्मा की आयु 4320000 3 1000 3 360 3 360=56,29,53,00,00,000 वर्ष होती है। इसके साथ ही इस सौर जगत की आयु भारतीय ज्ञान परम्परा के अनुसार 4 अरब 32 करोड़ सौर वर्ष मानी गयी है। फिर इतने ही वर्ष प्रलय काल रहता है।
‘सूर्य सिद्घांत’ के रचयिता ने सारे संसार को यह भी बताया कि इस सूर्य को बने कितने दिन हो गये हैं और अभी यह कितने समय और रहेगा? भास्कर जी का कहना है कि आकाश गंगा की आयु का आध्यकाल वर्तमान कल्प के आरम्भ के समय ही बीत चुका था।
वर्तमान कल्प के चौदह मन्वन्तरों में छठा मन्वन्तर व्यतीत होकर इस समय सातवां मन्वन्तर चल रहा हैं और उसकी भी 27 चतुर्युगी बीत चुकी है। अब जो कलयुग चल रहा है-यह 28वीं चतुर्युगी का कलयुग है। हमारे खगोल शास्त्रियों ने यह भी पता लगाया था कि यह कल्प कब से आरम्भ हुआ? उसी ज्ञान को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने सृष्टि संवत की खोज की।
हमारे खगोल शास्त्रियों की मान्यता और ‘सूर्य सिद्घांत’ के आंकलन के अनुसार इस ब्रह्म के 50 कल्प व्यतीत हो चुके हैं और यह इक्यावन वां कल्प चल रहा है। जिसके एक अरब सत्तानवें करोड़ उन्तीस लाख छियालीस हजार से अधिक वर्ष बीत चुके हैं।
भारत की इस काल गणना के समक्ष आज का कम्प्यूटर विज्ञान भी असफल हो गया है। आज के वैज्ञानिकों को कुछ-कुछ अनुमान हो रहा है कि भारत के ऋषि वैज्ञानिक जो कुछ कह गये हैं-संभवत: वही सत्य है। पश्चिम के वैज्ञानिक और विशेषत: नासा इस समय भारत के खगोल शास्त्रियों और अंतरिक्षविदों की मान्यताओं का बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन कर रहे हैं, और उन्हें इस बात पर घोर आश्चर्य हो रहा है कि भारत के महान खगोलविद् जो कुछ कह गये हैं वह पूर्णत: सत्य है।
नासा वैज्ञानिकों को भारत के ऋषियों के ज्ञान-विज्ञान को स्पष्टत: और सार्वजनिक रूप से यथावत स्वीकार करने में लज्जा आती है, इसलिए सत्य से मुंह फेरकर बैठते हैं-ये लोग। भारत के ऋषियों का यह चिंतन ही वास्तव में भारत का इतिहास है। इस चिंतन को जितना आप खोजेंगे-भारत के इतिहास के पृष्ठों का सुनहरापन उतना ही हमारे सामने आता जाएगा। उनका ज्ञान हमें ‘आकाशगंगा’ में तैर रहे कितने ही अदृश्य जगतों की सैर करा देगा और बता देगा कि इस आकाशगंगा तो अनेकों सूर्य हैं और हर सूर्य का अपना सौर जगत है। उस सौर जगत पर कभी किसी पर तो कभी किसी पर सृष्टि होती रहती है।
जैसे-जैसे हम इन रहस्यों से परिचित होते जाएंगे, वैसे-वैसे ही भारत के इतिहास के रहस्यमयी स्वर्णिम पृष्ठ हमारे भीतर खुलते जाएंगे। तब हमें पता चलेगा कि भारत विश्वगुरू क्यों था और क्यों उसका यह स्वर्णिम इतिहास हमारी दृष्टि से ओझल कर दिया गया गया है? इतिहास का विकृतिकरण अलग चीज है और इतिहास को मिटा देना अलग चीज है। विकृतीकरण को तो सुधारा जा सकता है-पर मिटाये गये इतिहास को संजोना बड़ा कठिन है। इसे तो लगभग असंभव ही माना जा सकता है। ज्ञान-विज्ञान के इतने प्राचीन इतिहास की बड़ी धरोहर और उसके स्पष्ट प्रमाण भारत के अतिरिक्त अन्य किसी देश के पास नहीं हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व इतिहास की पवित्रतम धरोहर और उसके समस्त ज्ञान-विज्ञान पर भारत का पहला अधिकार है। ऐसी स्थिति ही भारत को आज भी ‘विश्वगुरू’ का सम्माननीय पद दिलाती है।
मनुस्मृति में आया है-”वह जो अत्यंत प्रसिद्घ सबका कारण नित्य, सत, असत (व्यक्त, अव्यक्त स्वरूप अर्थात प्रकृति) है, से उत्पन्न हुआ वह ब्रह्मा कहा जाता है। परमात्मा का तेज प्रकृति पर पडऩे से बना है। वैदिक और पौराणिक साहित्य में जहां व्यक्ताव्यक्त तथा सत-असत इकट्ठे आये वहां प्रकृति के दो रूपों से ही अभिप्राय होता है-साम्यावस्था में तथा असाम्यवावस्था में अर्थात परिणामी स्वरूपों में। तब एक (देव) वर्ष भर अण्डा पकता रहा। काल व्यतीत होने पर अण्डे के (हिरण्यगर्भ के अर्थात नेबूला के) दो टुकड़े हो गये। एक भाग चमकने वाला बना व दूसरा भाग पृथिवी की भांति बनाया। दोनों के मध्य में अंतरिक्ष बन गया।”
यह अण्डा 43 लाख 20 हजार वर्ष तक पकता रहा। इसी को वेद में ‘हिरण्यगर्भ:’ कहा जाता है और इसी को विदेशियों ने ‘नेबूला’ कहा है। इसी को ब्रह्म-अण्ड कहा गया है। जब यह ब्रह्म-अण्ड फटा तो जोर का धमाका हुआ, जिसे आज का विज्ञान ‘बिग बैंग थ्योरी’ या ‘महाविस्फोट का सिद्घांत’ के नाम से जानता है। विश्व के वैज्ञानिकों ने ‘बिग बैंग थ्योरी’ को तो खोज निकाला पर वह अभी भी भारत की कालगणना और इस ‘बिग बैंग थ्योरी’ से भी पूर्व की सृष्टि और उसके ज्ञान विज्ञान के विषय में पूर्णत: अनभिज्ञ है। इसके लिए उसे निश्चय ही ‘विश्वगुरू’ भारत का शरणागत होना ही पड़ेगा।
भारत से ही ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी। उसका प्रमाण यह भी है कि ब्रह्माजी के विषय में जितना भर भी ज्ञान है वह भारत में ही उपलब्ध होता है। यही कारण है कि भारतवर्ष का सर्वाधिक प्राचीन नाम ब्रह्मवत्र्त है। मनुस्मृति अ. 2 श्लोक 17वें में इस नाम का उल्लेख आया है।
भारत के ब्रह्मवत्र्त नाम होने की सार्थकता का हमें तभी पता चलता है जब हम ब्रह्मा, और उसके द्वारा किये गये सृष्टि उत्पत्ति के महान पुरूषार्थ को समझ लेते हैं। यह देश ब्रह्मा जी द्वारा रची गयी सृष्टि से प्रारंभ हुआ, तो इसका अभिप्राय यह भी है कि उस समय के समस्त भूमंडल को ही ब्रह्मवर्त कहा जाता था। यह भूमंडल वही क्षेत्र था जहां-जहां भूमि जल से निकलती गयी और जहां-जहां साथ-साथ सृष्टि होती चली गयी।
क्रमश:

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