गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज

चिन्तन वही ऊंचा और पवित्र होता है-जिसमें ‘ऋत’ और ‘सत्य’ की साधना की जाती है। भारत के महान पूर्वजों ने ‘ऋत’ और ‘सत्य’ की साधना की थी। ऋत का अभिप्राय उन नियमों से है जो प्रकृति ने बनाये हैं और जिनके कारण सृष्टि का यह सारा तामझाम एक निश्चित नियमावली और प्रक्रिया के अंतर्गत घूम रहा है। जबकि सत्य ज्ञान प्रेरक है। सत्य भी मूल स्वरूप में सदा एक सा रहता है, अपरिवत्र्तनीय रहता है। किसी भी देश, काल और परिस्थिति में अपना मूल स्वरूप बदलता नहीं है। सृष्टि का यह सारा तामझाम कैसे चल रहा है?-उसे जानना ही ज्ञान है।
प्रकृति अपने नियमों में न्यायपरक है। वह किसी का अधिकार छीनती नहीं है, अपितु सभी के अधिकारों की रक्षा करती है और सत्य इस सारी प्रक्रिया को पूर्ण करने में उसकी सहायता करता है। जब भी दो पक्षों में वाद-विवाद होता है तो प्रकृति दोषी को दण्ड और निर्दोष को उसका अधिकार दिलाना चाहती है, इस कार्य में प्रकृति की सहायता सत्य ही करता है। यही कारण है कि न्यायालयों में गवाहों से यह कहलवाया जाता है कि जो कुछ भी कहेंगे सच कहेंगे और सच के सिवा कुछ भी नहीं कहेंगे। प्रकृति के ऋत और सत्य इन दोनों के मिलन से धर्म की उत्पत्ति होती है, जिससे मानवता का कल्याण होता है।
हमारे ऋषियों ने ‘ऋत’ और ‘सत्य’ के इस अद्भुत मेल को समझा और इसी के अनुसार अपने चिन्तन को ऊंचाई और पवित्रता प्रदान की। जो ‘ऋत’ और ‘सत्य’ के इस गुप्त रहस्य को जान लेता है वही मोक्षाभिलाषी होता है। जो इस रहस्य को समझकर ‘ऋत’ और ‘सत्य’ को अपने जीवन का संकल्प बना लेता है वह मोक्षानन्द को प्राप्त कर लेता है। कृष्णजी अर्जुन को बता रहे हैं कि तू भी मुमुक्षु बन, पर यह ध्यान रख कि निठल्ला होकर मुमुक्षु मत बन और ना ही कत्र्तव्य पथ से पलायन कर। निष्कामता को जीवनव्रत बना और अपना कत्र्तव्य पूर्ण कर।
कर्म विकर्म और अकर्म का विभेद
भारतीय चिन्तन धारा की गम्भीरता का विश्व में कोई सानी नहीं है। एक-एक बिन्दु को जितनी गम्भीरता से हमारे ऋषियों ने विवेचित और समीक्षित किया है-उतना किसी अन्य देश ने नहीं किया है। भारत के इसी ज्ञान गाम्भीर्य के कारण ही वह विश्व का नेतृत्व करने योग्य बना। संसार के लोग सामान्यतया कर्म को ही देखते हैं। उन्हें कर्म के विभेदों की उतनी गहनता से जानकारी नहीं है-जितनी कि भारत के ऋषि पूर्वजों को रही है। भारत की इसी ‘ज्ञान गाम्भीर्य परम्परा’ का परिचय देते हुए श्री कृष्णजी कह रहे हैं कि कर्म और विकर्म क्या है? इनकी जानकारी लेने के चक्कर में बड़े-बड़े विद्वानों को भ्रम हो जाता है।
सत्यव्रत सिद्घान्तालंकार जी श्रीकृष्णजी के इस कर्म, विकर्म, अकर्म के रहस्य को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि-”श्रीकृष्ण के अनुसार जीवन को दो भागों में बांटा जा सकता है-‘क्रिया’ तथा ‘अक्रिया’। क्रिया का अर्थ है-कर्म, अक्रिया का अर्थ है-अकर्म। क्रिया या कर्म को श्रीकृष्णजी ने दो भागों में बांटा-कर्म और विकर्म। कर्म जीवन की वह क्रिया है जो हमें करनी चाहिए, जिसे श्रीकृष्णजी ने ‘स्वधर्म’ कहा, ‘निष्काम कर्म’ कहा। विकर्म जीवन की वह क्रिया है जो हमें नहीं करनी चाहिए। कर्म के शास्त्रकारों ने तीन भेद किये हैं-‘नित्यकर्म’ नैमित्तिक कर्म, काम्य कर्म। नित्यकर्म वे कर्म हैं जो सब देश-काल में हमें करने ही चाहिएं, जिनमें अपवाद हो ही नहीं सकता। उदाहरणार्थ माता-पिता की सेवा, शरीर रक्षा आदि-आदि। नैमित्तिक कर्म वे कर्म हैं जो समय-समय पर आवश्यकता पडऩे पर हमें करने होते हैं। उदाहरणार्थ स्नान करना, अतिथि के आ जाने पर उसका सत्कार करना। काम्य कर्म वे कर्म हैं जो हम किसी कामना के पूरा करने के लिए करते हैं। उदाहरणार्थ नौकरी पाने के लिए किसी से प्रार्थना करना।”
कर्म, विकर्म के फेर में पड़ा हुआ संसार।
अकर्म जहां पर आ गया वहीं गहन अंधकार।।
कर्म, विकर्म, अकर्म में यह अन्तर है। श्रीकृष्ण जी ने संसार के लोगों के लिए स्पष्ट किया कि नित्य कर्म तो करने ही होते हैं। इन नित्य कर्मों में माता-पिता की सेवा भी हमारे यहां सम्मिलित थी। जिसने माता-पिता को प्रात:काल चरण स्पर्श नहीं किया या उनके खान-पान, रहन सहन, व सुख-सुविधा का पूरा ध्यान नहीं रखा -वह स्वयं को पापी और अधर्म मानता था। माता-पिता के उपकारों का बदला देना और पूर्ण श्रद्घाभाव से उनकी सेवा-सुश्रूषा करना हमारे यहां धर्म का कार्य माना जाता था। धर्म का कार्य जिसे माना जाता था उसका न करना विधि के और नीति के विरूद्घ होने से पाप माना जाता था। सम्पूर्ण संसार को आज अपनी अध्यात्मावस्था पर चिन्तन-मनन करने की आवश्यकता है।
अधम उसे कहते हैं जो किसी के उपकारों का बदला देते समय नजरें बचाता है या अपने कत्र्तव्य से मुंह फेर लेता है। ऐसे व्यक्ति को आज की भाषा में नीच कहा जाता है। नीचता का प्रदर्शन करना पाप को गले लगाना है। आजकल वृद्घ माता-पिता यदि संसार में उपेक्षा का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं तो इसके लिए उनकी संतानों का नीचाचरण ही उत्तरदायी है। संसार को गीता के कर्म विषय को समझना चाहिए और उसके ‘नित्यभाग’ नामक विभाग पर चिन्तन करते हुए वृद्घ माता-पिता के प्रति अपने कत्र्तव्य को समझना चाहिए। संसार में वास्तविक शान्ति लाने के लिए बड़ों की शुभकामनाएं प्राप्त करनी आवश्यक हैं।
कर्म विकर्म और अकर्म से भ्रम कैसे उत्पन्न हो जाता है? इस पर विचार करने की आवश्यकता है। सत्यव्रत सिद्घान्तालंकार जी आगे लिखते हैं-”एक व्यक्ति ईश्वर भक्ति का नित्य कर्म करता हुआ सन्ध्या में बैठा है। उसके सामने कोई गोवध करने लगा। उस समय वह यदि चुपचाप बैठा रहा तो उसका ईश्वर भक्ति रूपी कर्म विकर्म हो जाता है। इसी प्रकार अगर कोई नौकरी पाने के लिए किसी अफसर के पास प्रार्थना पत्र लेकर जाता है और अफसर के पूछताछ करने पर कोई उत्तर नहीं देता है तो उसका काम्य कर्म अकर्म हो जाता है।”
हमारे हिन्दू समाज में शौचादि को भी नित्य कर्म माना गया है। इससे शरीर की शुद्घि -शुचि होने से यह कार्य नित्य कर्म में सम्मिलित किया गया है। शरीर की शुद्घि से शरीर रक्षा का भी कार्य होता है। वैसे भी हम यह नित्य ही देखते हैं कि यदि पेट साफ न हो तो हम रूग्ण हो जाते हैं, जिससे शरीर की शक्ति का श्रेय होता है और हमारी रोगनाशक क्षमता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार शरीर की शुद्घि आवश्यक है-उसी प्रकार आत्म शुद्घि आवश्यक है। आत्मशुद्घि के लिए संध्या को आवश्यक माना गया। यही कारण है कि संध्यादि को भी नित्यकर्म मंक सम्मिलित किया गया है। आत्मशुद्घि सबसे उत्तम है, इससे विचार शुद्घि होती है और व्यक्ति को आत्मा के आलोक में कार्य करते रहने का अभ्यास होने लगता है। आत्मा के आलोक में निष्पादित होने वाले कर्म बहुत ही पवित्र होते हैं। उनके निष्पादन से हमारा जीवन तो शुद्घ बुद्घ पवित्र बनता ही है सारे संसार का परिवेश भी आनन्ददायक बनता है। क्रमश:

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