25 मानचित्रों में भारत के इतिहास का सच, भाग ……24

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महाराणा राज सिंह का मनोबल और औरंगजेब

महाराणा राज सिंह ने सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहे औरंगजेब को शाहजहां के विरुद्ध सहायता मांगने के उपरांत भी सहायता नहीं दी थी। महाराणा ने इस समय साहस का परिचय देते हुए रामपुरा क्षेत्रफल उल्टे अधिकार और कर लिया था। उस समय जयपुर के राजा जयसिंह और जोधपुर के राजा जसवंत सिंह का देहांत हो चुका था। उसके पश्चात औरंगजेब अपनी हिंदू प्रजा का उत्पीड़न करते हुए उस पर जजिया कर लगा रहा था। तब हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए महाराणा राज सिंह ने औरंगजेब के लिए कड़ा पत्र लिखकर उसे यह चुनौती दी थी कि उसमें यदि साहस है तो वह मुझ पर जजिया कर लगाकर दिखाए।
इसी समय महाराणा राजसिंह ने रूपगढ़ की राजकुमारी चारुमति के आवाहन पर उसका डोला लाने में सफलता प्राप्त की थी और उसे मुगल औरंगजेब केहर में जाने से बचा लिया था।
इस समय चारुमति की रक्षा करते हुए महाराणा राज सिंह के सैनिकों ने औरंगजेब की सारी सेना का सफाया कर दिया था। जोधपुर के नाबालिग राजा अजीत सिंह की रक्षा करने का संकल्प भी महाराणा राज सिंह ने लिया और दुर्गादास राठौर जैसे लोगों को साथ लेकर मुगल शासन का भरपूर विरोध किया।
इस प्रकार महाराणा राज सिंह उस समय हिंदू अस्मिता का प्रतीक बन चुके थे। तब औरंगजेब ने का बंगाल इत्यादि स्थानों से अपनी सारी सेना बुलाकर मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। औरंगजेब चित्तौड़ , मण्डल गढ़, मंदसौर आदि दुर्गों को जीतता हुआ आगे बढ़ता चला गया। औरंगजेब का विरोध करने का साहस किसी को नहीं हुआ। विजय का उत्सव मनाता हुआ औरंगजेब निश्चिंत होकर आगे बढ़ता चला गया तब राजस्थान की दक्षिणी पश्चिमी पहाड़ियों तक वह पहुंच गया। जहां महाराणा राज सिंह ने उसका तलवारों से स्वागत किया।
उस समय औरंगजेब का बेटा अकबर उसमें 50000 की सेना लेकर उदयपुर जा पहुंचा। किसी ने भी उसे रोका नहीं और वह भी निश्चिंत होकर आराम से बैठ गया। तब महाराणा राज सिंह ने अपनी देशभक्ति और कूटनीति का परिचय देते हुए अचानक मुगलों पर हमला बोल दिया। भीषण संघर्ष में महाराणा के देशभक्त सैनिकों और सेनापतियों ने मिलकर अकबर की सारी सेना का सफाया कर दिया था। ऐसी 50 – 50 हजार की शत्रुओं की सेनाओं का हमारे वीर योद्धाओं ने एक बार नहीं अनेक बार सफाया किया है। जिन्हें बड़ी चालाकी के साथ षडयंत्र पूर्वक हमारे इतिहास से हटा दिया गया है।
महाराणा राज सिंह ने इस युद्ध में अपने सेनापतियों के माध्यम से औरंगजेब के बेटे अकबर को भी गिरफ्तार करवा लिया था। तब दोनों पक्षों के मध्य हुई शांति संधि के पश्चात ही औरंगजेब के बेटे को छोड़ा गया था। इसी प्रकार राणा राज्य सिंह ने औरंगजेब पर अचानक आक्रमण कर उसे भी पराजित करने में सफलता प्राप्त की थी। औरंगजेब को भी अपना सारा गोला – बारूद, अस्त्र-शस्त्र छोड़कर भागना पड़ा था। बाद में महाराणा राजसिंह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर मुगल सेना को वहां से भी भगाया और जो क्षेत्र औरंगजेब ने जीत लिया था उसे फिर से अपने अधिकार में कर लिया। इस समय महाराणा राज सिंह का विजय रथ आगे बढ़ा और सूरत तथा मालवा को विजय करता हुआ नर्मदा और बेतवा तक चला गया। तब उज्जैन और चंदेरी तक भगवा करा दिया गया था। इसे कहते हैं इतिहास।

मेरी पुस्तक “25 मानचित्र में भारत के इतिहास का सच” से

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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